मोहन भागवत ने अमेरिका में कहा कि हिंदू जागेगा तो विश्व जागेगा। फिर कनाडा और ब्रिटेन में भी यही दोहराया। भारत में तो वे यह बात कहते ही रहते हैं, मगर उनका दुर्भाग्य और देश का सौभाग्य कि कोई सुनता नहीं है। हताश होकर उन्होंने सोचा होगा कि अमेरिका में कहने से शायद वज़न बढ़ जाए। लेकिन वे हिंदुओं को ठीक से जानते नहीं हैं। वे हिमालय की चोटी पर खड़े होकर कहेंगे तो भी वे नहीं सुनेंगे।
 
जो भी हो, उनके इस आव्हान से विश्व में उत्साह का संचार ज़रूर हुआ होगा। वे सदियों से इसी प्रतीक्षा में बैठे हैं कि कोई आए और उन्हें बताए कि उनके जागने का रिमोट कंट्रोल वास्तव में हिंदुओं के हाथ में है।

दुनिया वाले अब तक यह भ्रम पाले हुए थे कि वे जागे हुए हैं और जागने की वज़ह से ही उन्होंने बिजली, टेलीफोन, इंटरनेट, अंतरिक्ष यान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी चीज़ें बनाकर दुनिया को आगे बढ़ाया है। भागवत ने उनका भ्रम तोड़ दिया। असली बात यह है कि वे सब सोए हुए हैं। उनके जागरण का स्विच नागपुर में रखा है।
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अगर दूसरे कोण से देखें तो भागवत के बयान का एक मतलब ये भी है कि हिंदू नहीं जागेगा तो विश्व भी नहीं जागेगा। ये घमंडोक्ति है। ज़्यादातर ब्राह्मण इस घमंडोक्ति में बात करते हैं। भले ही इनके उखाड़े से कुछ न उखड़े मगर बात ऐसे करेंगे कि हिमालय इनकी छोटी उंगली पर टिका हो।

मगर भागवत जी को अपने कथन में थोड़ी शंका भी दिखाई देती है। इसीलिए उन्होंने "तो" शब्द लगाया है। "हिंदू जागेगा तो विश्व जागेगा।" यानी अभी मामला निश्चित नहीं है। जैसे डॉक्टर कहे कि दवा खाओगे तो ठीक हो जाओगे। इससे यह संभावना भी निकलती है कि दवा खाकर भी ठीक न हो। इसलिए भागवत जी का कथन आध्यात्मिक कम और गणितीय अधिक है।

भागवत को अपने आप से एक प्रश्न पूछना चाहिए। प्रश्न यह है कि हिंदू जाग क्यों नहीं रहा? उनके पुरखे वर्षों से जगा रहे हैं। शाखाएँ लग रही हैं। भाषण हो रहे हैं। यात्राएँ निकल रही हैं। इतिहास को बार-बार जगाया जा रहा है। मगर हिंदू है कि करवट बदलकर फिर सो जाता है। इससे लगता है कि समस्या अलार्म घड़ी में नहीं, हिंदुओं की नींद में है।

हो सकता है हिंदुओं को विश्व के जागने में कोई ख़तरा दिखाई देता हो। वे सोचते हों कि अगर दुनिया जाग गई तो सवाल पूछने लगेगी। फिर हर बात का प्रमाण माँगेगी, इतिहास की जगह इतिहासकारों को पढ़ेगी। यह ख़तरनाक स्थिति है। इसलिए सोए रहना ही बेहतर है।

या हो सकता है हिंदू व्यावहारिक हो गया हो। वह सोचता हो कि दुनिया को जगाने का ठेका हमने तो नहीं ले रखा है। जिसे जागना है, वह अपना अलार्म लगाए और नहीं तो चुपचाप सोता रहे। बस हमारी नींद में खलल न डाले, हमसे कोई उम्मीद न रखे।

बात भी सही है। आख़िर विश्व को हिंदुओं पर इतना निर्भर क्यों होना चाहिए? चीन वाले अपने हिसाब से जाग लें। जापान वाले अपना अलार्म सेट कर लें। यूरोप वाले मोबाइल में रिमाइंडर लगा लें। यह कैसी आत्मनिर्भरता है कि दुनिया के जागने के लिए भी हिंदू का जागना जरूरी है? विश्व के अलग-अलग टाइम ज़ोन के हिसाब से हिंदू जागेगा तो सोएगा कब?

हमारे यहाँ भागवत जैसे नेताओं को हिंदुओं की हालत देखकर कम दुख होता है और उनकी नींद देखकर अधिक। हर नेता हिंदुओं को जगाना चाहता है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि कोई उसे धर्म के नाम पर, कोई जाति के बहाने और कोई चुनाव के लिए जगाना चाहता है। हिंदू बेचारा जागते-जागते इतना थक गया है कि अब उसे सिर्फ सोने में ही मुक्ति दिखाई देती है। वास्तव में सत्ता को सबसे अधिक डर जागे हुए हिंदू से नहीं, गलत कारणों से जागे हुए हिंदू से होता है।
भागवत जी जिस जागरण की बात कर रहे हैं, उसका नमूना हम पिछले कुछ वर्षों से देख रहे हैं। जागरण के बाद आदमी अस्पताल, स्कूल, रोज़गार और महँगाई पर कम बोलता है, वह पाँच सौ साल पुराने विवादों पर अधिक बोलता है। उसे अपने गाँव की टूटी सड़क दिखाई नहीं देती, मगर किसी बादशाह की चार सौ साल पुरानी गलती साफ़ दिखाई देने लगती है। यह बड़ा अद्भुत जागरण है। इसमें आँखें खुलती हैं, मगर दृष्टि बंद हो जाती है।

धर्म जब राजनीति का मोबाइल ऐप बन जाता है, तब श्रद्धा नोटिफिकेशन में बदल जाती है।

भागवत जी को शायद इसीलिए चिंता है कि हिंदू अभी पूरा नहीं जागा। जो अधजगा है, वह ट्विटर पर गाली दे रहा है, यूट्यूब पर राष्ट्र बचा रहा है, व्हाट्सऐप पर इतिहास लिख रहा है और मोहल्ले में किसी न किसी को देशद्रोही घोषित कर रहा है।

जागरण का यह प्रारम्भिक चरण है। पूर्ण जागरण तब होगा जब हिंदू अपने जीवन की हर असफलता का कारण किसी मुगल, मिशनरी, मार्क्सवादी या मुसलमान में खोज लेगा। जब वर्तमान से लड़ने की हिम्मत नहीं बचती, तब इतिहास से लड़ने का साहस पैदा हो जाता है।

लेकिन भागवत जी का यह सिद्धांत नया भी नहीं है। हमारे देश में दुनिया को सुधारने और जगाने का ठेका बहुत पहले से कुछ लोगों ने ले रखा है। मुझे मथुरा की युग निर्माण योजना याद आती है। बरसों से उनकी टोली देश की हर खाली दीवार पर लिख रही है—"हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा।"

जब मैं छोटा था तब भी यह नारा पढ़ता था। अब बूढ़ा हो रहा हूँ, तब भी पढ़ रहा हूँ। कई दीवारें टूट गईं, कई मकान गिर गए, कई सरकारें बदल गईं, मगर जग के सुधरने का प्रोजेक्ट अभी तक पूरा नहीं हुआ। कारण साफ़ है। हिंदू सुधरे ही नहीं। जग बेचारा सुधरने के लिए आज भी हिंदुओं के सुधरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

शायद विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और नोबेल समिति की हर बैठक में पहला सवाल यही पूछा जाता होगा कि "हिंदू सुधरे कि नहीं?" और जब जवाब मिलता होगा कि "अभी नहीं", तो बैठक स्थगित कर दी जाती होगी। भागवत जी ने उसी सिद्धांत को नया संस्करण देकर प्रस्तुत किया है।

पहले कहा जाता था—"हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा।" अब कहा जा रहा है—"हिंदू जागेगा, विश्व जागेगा।" नारा बदल गया है, पर दुनिया अब भी हमारी प्रतीक्षा में खड़ी है।

दुनिया की हालत बड़ी दयनीय है। वह स्वयं कुछ कर ही नहीं सकती। उसे जागने के लिए हिंदू चाहिए, सुधरने के लिए हिंदू चाहिए, विश्वगुरु बनने के लिए हिंदू चाहिए। लगता है भू-लोक ने अपना पूरा ठेका इन सुधारकों या बिगाड़कों को दे रखा है।

लेकिन समस्या यह है कि जिसे विश्व जगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह सुबह नौ बजे तक चादर ताने पड़ा रहता है। और अगर गलती से जाग भी जाए तो पहले मोबाइल खोलता है, फिर किसी को गाली देता है, फिर किसी प्राचीन इमारत या मस्जिद से बदला लेता है, फिर शाम तक राष्ट्र बचा लेता है। विश्व बेचारा फिर अगले दिन का इंतज़ार करता है।
व्यंग्य/उलटबाँसी से
विडंबना ये है कि जो आदमी अपना कमरा साफ़ नहीं कर सकता, वह दुनिया साफ़ करने का अभियान चला रहा है।

मुझे लगता है दुनिया हिंदुओं के न जागने से बहुत लाभ में है। वह आविष्कार कर रही है, शोध कर रही है, नई तकनीकें ईजाद कर रही है। अगर वह भी हमारे जागरण मॉडल पर चल पड़ी तो वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं की जगह टीवी डिबेटें ले लेंगी और विश्वविद्यालयों में शोध की जगह भावनाएँ जमा की जाएँगी।

कल्पना कीजिए कि अगर विश्व सचमुच हिंदू जागरण से जाग जाए तो क्या होगा। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव आएगा कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है या नहीं तो इसका निर्णय वैज्ञानिक नहीं, आस्थावान एंकर करेंगे। नोबेल पुरस्कार के दावेदारों को यह प्रमाण देना होगा कि उसने कम-से-कम दस ऐतिहासिक इमारतों को हिंदुओं की घोषित किया है।

विश्वविद्यालयों में प्रवेश परीक्षा की जगह आस्था परीक्षा होगी और तब दुनिया को पता चलेगा कि विकास दर से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चीज़ है—आहत भावनाओं की दर।

जिस समाज में भावना तथ्य से बड़ी हो जाती है, वहाँ झूठ सबसे सुरक्षित चीज़ बन जाता है।

लेकिन भागवत जी की समस्या भी समझी जा सकती है। संगठन का पूरा कारोबार ही जागरण पर टिका है। अगर जनता कह दे कि भाई हम जाग गए, अब हमें नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य और संविधान पर बात करनी है तो आधे मंच खाली हो जाएँगे क्योंकि जनता जब सचमुच जागती है तो वह सबसे पहले अपने नेताओं से सवाल पूछती है। और नेता जनता को वहीं तक जगाना चाहता है जहाँ तक सवाल न शुरू होते हों।
हिंदुत्व की राजनीति का आदर्श हिंदू वह है जो न पूरी तरह सोया हो, न पूरी तरह जागा हो; बस इतना जागा हो कि नारा लगा सके और इतना सोया हो कि हिसाब न माँग सके।

इसलिए मैं विश्व शांति के हित में कहना चाहता हूँ कि भागवत जी कृपया सावधानी बरतें। दुनिया पहले ही युद्धों, जलवायु संकट और आर्थिक असमानता से परेशान है। उस पर यदि जागरण की यह महामारी भी फैल गई तो पृथ्वी को फिर से पाषाण युग में लौटने से कोई नहीं रोक पाएगा।

जो समाज हर सुबह अपने अतीत के साथ उठता है, वह अक्सर अपना भविष्य सोकर गँवा देता है। इसलिए भागवत जी, कृपया हिंदुओं की निद्रा भंग न करें। दुनिया अभी जैसे-तैसे चल रही है। कहीं ऐसा न हो कि हिंदू जाग जाए और विश्व को फिर से सोना पड़ जाए।