हमारे मोहल्ले में एक बुज़ुर्ग हैं शर्मा जी। उन्हें आप हर सुबह खाक़ी हाफ़ पैंट में देख सकते हैं। राबड़ी देवी की फटकार के बाद संघ फुल पैंट वाला हो गया, मगर वे आज भी हाफ़ पैंट में ही हैं।
एक बार मैंने पूछ लिया, “अब तो संघ भी फुल पैंट में आ गया, आप कब अपग्रेड हो रहे हैं?”
वे बोले, “फुल पैंट में नमस्ते सदा वत्सले वाली फील नहीं आती, भाई जी। ऐसा लगता है जैसे आंग्ल संस्कृति ने टांगों से पकड़ लिया हो।”
मैंने कहना चाहा कि मन तो बरसों से मोबाइल, इंटरनेट, व्हाट्सऐप और आधुनिक राजनीति की आंग्ल उपजों में डुबकियाँ लगा रहा है, लेकिन बेचारा फुल पैंट ही संस्कृति-विनाश का अपराधी बना हुआ है। मगर मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा।
आजकल शाखा-वीर जिस अकड़ के साथ चलते हैं, उससे हिंदू भी कम नहीं डरते। मेरी तो ख़ैर कोई औक़ात ही नहीं है।
मैंने देखा है कि कुछ लोग कपड़े नहीं पहनते, विचार पहनते हैं। विचार पुराने पड़ जाएँ तो भी चलेगा, कपड़े पुराने नहीं पड़ने चाहिए। संघ ने पैंट बदल ली थी, मगर इन बुज़ुर्ग ने नहीं बदली। शायद उन्हें डर था कि कहीं पैंट बदलते ही विचार भी न बदल जाएँ। हमारे यहाँ बहुत से लोग अपने विचारों को टांगों से बाँधकर रखते हैं।
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मोहल्ले में उन्हें लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ होती रहती हैं। लोग अपने बच्चों को उनसे ऐसे दूर रखते हैं जैसे वे कोई चलती-फिरती व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी हों। वहाँ एक बार दाख़िला मिल जाए तो डिग्री तो मिल जाती है, मगर बुद्धि का दाख़िला रद्द हो जाता है।
बच्चों को दूर रखने एक और वज़ह भी है। वे ब्रह्मचर्य की बात बहुत करते हैं, जो कि जानकार लोगों को बहुत ख़तरनाक़ विचार लगता है। मुझे भी कभी-कभी उन्हें देखकर न जाने क्यों मध्यप्रदेश वाले राघव जी की याद आ जाती है।
शर्मा जी अपना समस्त ज्ञान, दर्शन, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, जीवविज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान तक व्हाट्सऐप से प्राप्त करते हैं। किसी और स्रोत से ज्ञान प्राप्त करके प्रदूषित होने से उन्होंने स्वयं को सफलतापूर्वक बचा रखा है।
अपने चारों ओर उन्होंने एक वैचारिक लौह-पर्दा खड़ा कर रखा है ताकि कोई तथ्य, कोई प्रमाण, कोई किताब उन पर हमला न कर सके, वे उतने ही भोले, निष्कलुष और निर्मल बने रहें जितने उस दिन थे जब पहली बार शाखा में ध्वज-प्रणाम किया था।
उनका दिमाग़ एक ऐसे कमरे की तरह था जिसकी खिड़कियाँ वर्षों पहले बंद कर दी गई थीं। वहाँ हवा नहीं आती थी, केवल फ़ॉरवर्ड आते थे। वे तथ्य नहीं पढ़ते थे, तथ्यों के बारे में राय पढ़ते थे। धीरे-धीरे राय ही उनके लिए तथ्य बन जाती थी।

आजकल ज्ञान प्राप्त करना कठिन नहीं है। कठिन काम है ज्ञान से बचना। वे यह कठिन काम बड़ी लगन और सफलता से कर रहे थे।

मेरे लिए अच्छी बात यह है कि इसी वजह से वे मेरे बारे में ज़्यादा नहीं जानते। इसलिए कई बार शाखा में आने का निमंत्रण भी दे चुके हैं। मैंने हर बार यही कहकर टाल दिया कि उस समय मुझे जिम जाना होता है।
वैसे वे मेरे लिए एक अच्छे इनफ़ॉर्मर भी हैं। उनसे पता चलता रहता है कि इस समय संघ परिवार किन मुद्दों को लेकर उद्वेलित है, कौन-सी आकांक्षाएँ पाल रहा है और भागवत, मोदी, योगी, चुनाव तथा हिंदू राष्ट्र के बारे में क्या योजनाएं बना रहे है।
उनसे बात निकलवाने का सबसे कारगर तरीका है—उल्टी बात करना।
अगर आप मोदी जी की तारीफ़ कर दें तो वे मोदी जी की आलोचना शुरू कर देंगे और अगर आलोचना कर दें तो उनकी महानता सिद्ध करने में लग जाएँगे। इससे उन्हें अपनी तर्क शक्ति का प्रदर्शन करने का अवसर मिलता है। प्रदर्शन से उन्हें वही सुख मिलता है जो मोर को अपने पंख फैलाने से मिलता होगा।
वे चर्चा की शुरुआत एक ही वाक्य से करते हैं— “नहीं, आपकी धारणा ग़लत है।”
इसके बाद वे व्हाट्सऐप वाली मर्यादाएँ तोड़ देते हैं और मोदी से लेकर भागवत, गोलवलकर तक सबको ग़लत साबित करने में जुट जाते हैं।
उनकी इसी प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए एक दिन मैंने कहा— “आरएसएस ने अच्छा किया जो रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया। ये कांग्रेसी बेकार में हो-हल्ला मचा रहे हैं।”
उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने पृथ्वी को गोल के बजाय चपटी बता दिया हो।
बोले, “यही तो संघ ने ग़लती की। कांग्रेस को मौक़ा दे दिया। अब देखिए, कैसे गरज-गरजकर सवाल पूछ रहे हैं। संघ की निष्ठा और प्रतिष्ठा पर उंगली उठा रहे हैं।”
मैंने कहा, “अरे कांग्रेसियों को छोड़िए। उन्हें तो संघ पर हमला करने के बहाने चाहिए।”
“मान लिया,” वे बोले, “लेकिन आप बहाने क्यों दे रहे हो? अगर गुरु जी ने उसी समय पंजीकरण करवा लिया होता तो आज किसी की हिम्मत नहीं होती सवाल उठाने की।”
“लेकिन भागवत जी तो कह रहे हैं कि कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।”
इस प्रश्न पर वे थोड़ा उत्तेजित हो गए।

बोले, “क्या आप लश्कर-ए-तैयबा हो? हिजबुल मुजाहिदीन हो? कोई आतंकवादी संगठन हो? नक्सली भी नहीं हो। वे रजिस्ट्रेशन नहीं करवाएँ तो समझ में आता है। उनका तो कानून में विश्वास ही नहीं है। लेकिन आप तो कानून मानते हो न? फिर करवा लो रजिस्ट्रेशन। सारा पचड़ा ख़त्म।”

मैंने कहा, “लेकिन रजिस्ट्रेशन करवाने से बहुत-सी झंझटें खड़ी हो जाएँगी। पाई-पाई का हिसाब देना पड़ेगा। पैसा कहाँ से आया, कहाँ गया—सब बताना होगा। हिंदू राष्ट्र निर्माण के जो गोपनीय कार्य चल रहे हैं, वे प्रभावित हो सकते हैं।”
हिंदू राष्ट्र का नाम सुनते ही वे कुछ चिंतित हुए। फिर रहस्य खोलने वाले अंदाज़ में बोले—
“क्या सारे एनजीओ अपना सही हिसाब देते हैं? क्या सब वही करते हैं जो बताते हैं? और मान लीजिए लश्कर-ए-तैयबा रजिस्ट्रेशन करवा भी ले, तो क्या अपने काम बदल देगा?”
“लेकिन यह तो ग़लतबयानी हुई।”
“इसमें सही-ग़लत कुछ नहीं होता,” उन्होंने कहा, “पूरा सिस्टम ऐसे ही चलता है।”
मैं उनकी बात सुन रहा था और मुझे लग रहा था कि इस देश में कानून का सबसे बड़ा सम्मान वही लोग करते हैं जो उसे अपने ऊपर लागू नहीं होने देना चाहते। कानून उनके लिए मंदिर की घंटी की तरह है—दूर से बजती रहे तो श्रद्धा आती है, पास आ जाए तो सिर दर्द होने लगता है।
वे आगे बोले—
“ये बताइए कि गुरु जी ने नेहरू और पटेल से वादा किया था या नहीं कि राजनीति से दूर रहेंगे? संघ का संविधान बनाकर दिया था या नहीं? मगर क्या ऐसा हुआ? कुछ नहीं हुआ। उन्होंने वही किया जो हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए ज़रूरी था। चार साल के भीतर जनसंघ बना लिया। आज वही जनसंघ देश पर राज कर रहा है।”
“आपकी बात में दम तो है।”
वे और उत्साहित हो गए।
“देखिए,” उन्होंने कहा, “भारत का संविधान स्वीकार करने के बावजूद हम बावन साल तक नागपुर में तिरंगा नहीं फहराते थे। हमारे मन में तिरंगे के लिए कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी। आज भी भगवा ध्वज से ऊपर कोई ध्वज नहीं है। लेकिन राजनीति में केवल श्रद्धा से काम नहीं चलता। कभी-कभी तिरंगा भी साथ रखना पड़ता है।”
मैंने उनके सुर में सुर मिलाया।

“हाँ, आप लोग आज़ादी की लड़ाई को भी नहीं मानते, धर्मनिरपेक्षता को भी नहीं, समाजवाद को भी नहीं और भाईचारे को भी नहीं।”

वे बोले, “देखिए, संघ का मानना है कि साध्य महत्वपूर्ण है, साधन नहीं। हमारा उद्देश्य क्या है? भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना। निचली जातियों, विधर्मियों और औरतों को उनको मर्यादा में रखना। उसके लिए जो भी ज़रूरी हो, किया जाना चाहिए।”
मुझे लगा आज तो ज्ञान का बाँध टूट गया है।
मैंने पूछा, “लगता है संघ में इस विषय पर कोई गंभीर मंथन चल रहा है?”
यह प्रश्न सुनते ही वे अचानक सतर्क हो गए। समझदारी बघारने के उत्साह में वे काफ़ी कुछ बोल चुके थे। अब उन्हें ख़तरे की हल्की-सी आहट सुनाई दे गई थी।
वे झटके से उठ खड़े हुए।
“चलूँ भाई जी,” उन्होंने कहा, “आज ऊपर से कोई आए हुए हैं बौद्धिक के लिए।”
मैं समझ गया कि अब वे व्हाट्सऐप पर बौद्धिक ग्रहण करेंगे और ऊपर से प्राप्त ताज़ा ज्ञान के आधार पर रजिस्ट्रेशन पर अपनी नई राय बनाएँगे।
मुझे उन पर दया आई। आदमी बूढ़ा होने पर अपने अनुभवों से चलता है। ये उन दुर्लभ लोगों में हैं जो बुढ़ापे में भी अपने अनुभवों से नहीं, निर्देशों से चलते हैं।
वे चले गए।
जाते समय उनकी हाफ़ पैंट हवा में फड़फड़ा रही थी। मुझे लगा, वह कपड़ा नहीं, एक विचार था—जो समय के साथ बदलने से इंकार करता है और फिर उसी जड़ता को अपनी सबसे बड़ी वैचारिक दृढ़ता मान बैठता है।