व्यंग्य (इमेज एआई जेनरेटेड)
बीजेपी नेता विक्टर ह्यूगो के इस कथन को अक्सर दोहराते हैं कि धरती पर कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका वक़्त आ गया हो।
ज़ाहिर है, उन्होंने ह्यूगो को पढ़ा नहीं होगा। शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि वह कौन था, किस देश का था और क्या बेचता था। उन्हें इन सब बातों से कोई मतलब भी नहीं है। उनके पास तो यह जुमला व्हाट्सऐप पर कहीं से तैरता हुआ आया होगा और उन्होंने उसे लपककर अपने वैचारिक खाते में जमा कर लिया होगा। आजकल विचारों के लिए किताबें पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती। एक अच्छा-सा फॉरवर्ड हो तो आदमी रातोंरात विचारक बन सकता है।
यही वजह है कि वे ह्यूगो के इस कथन के आगे सोच ही नहीं पाते। उनके ज्ञान की सीमा व्हाट्सऐप फॉरवर्ड पर जाकर समाप्त हो जाती है। वरना वे यह भी सोचते कि धरती पर कोई भी शक्ति उस विचार को आगे नहीं बढ़ा सकती जिसका वक़्त ख़त्म हो गया हो। विचारों का भी एक जीवनकाल होता है। वे पैदा होते हैं, जवान होते हैं, अपना प्रभाव जमाते हैं और फिर एक दिन इतिहास के हवाले हो जाते हैं। सत्ता की ताक़त उन्हें कुछ समय तक ज़िंदा रखने का भ्रम पैदा कर सकती है, लेकिन विचारों को वेंटिलेटर पर रखकर हमेशा नहीं बचाया जा सकता।
संघ परिवार के साथ इस समय शायद यही समस्या है। उसे लग रहा है कि उसके विचारों का वक़्त हमेशा के लिए आ गया है, जबकि इतिहास उसे बता रहा है कि हर विचार का एक वक़्त होता है और हर वक़्त का अंत भी। विचारों के आने की घोषणा करना आसान है, उनके चले जाने की आहट सुनना मुश्किल। इसीलिए रिजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन के ज़िक्र भर से वे भड़कने लगते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता मिली है तो छोड़ने के लिए थोड़े ही मिली है। सत्ता कोई रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म तो है नहीं कि गाड़ी आई, कुछ देर रुकी और फिर आगे बढ़ गई। उनके लिए तो यह स्थायी निवास है।
वैसे भी रामराज्य की उनकी कल्पना में राम एक बार राजा बन गए तो फिर कभी चुनाव नहीं हुआ। न विपक्ष की ज़रूरत पड़ी, न सत्ता परिवर्तन की। लोकतंत्र की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इसमें राजा को भी एक दिन जाना पड़ता है। और फिर कोई कह दे कि उनका तो बाप भी जाएगा, तो वे कैसे बर्दाश्त करें! प्रधानमंत्री मोदी उनके लिए भगवान राम न सही, मगर सत्ता के राम तो हैं ही। लेकिन लगता है कि उन्हें मोदी के अजैविक या नान बायोलॉजिकल होने में संदेह है। जिनके माँ-बाप नहीं होते और जो ख़ुद बापों के भी बाप होते हैं, उनके बाप के जाने की बात कहने पर उन्हें क्यों उखड़ना चाहिए?
असल में उनके लिए मोदी जी के जाने का मतलब सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री का जाना नहीं, बल्कि उनके पूरे राजनीतिक संसार का उजड़ जाना है। ऊपर से विपक्ष के नेता कह रहे हैं कि वे क्या, उनके बाप भी जाएंगे। यह तो सरासर नाइंसाफ़ी है!
फिर हमारे नेताओं की एक समस्या यह भी है कि वे जो कहना चाहते हैं, उसे साफ़-साफ़ नहीं कहते। या तो जान-बूझकर भ्रम बनाए रखते हैं या फिर भ्रम पैदा करना ही उनकी राजनीतिक शैली है। सीधी बात कह देने से राजनीति में बौद्धिकता का प्रदर्शन कैसे होगा? अस्पष्टता नेताओं की सबसे सुरक्षित शरणस्थली है। बात का मतलब कुछ भी निकले, नेता के पास सफ़ाई देने का विकल्प हमेशा बचा रहता है।
इसीलिए जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मोदी का बाप भी जाएगा, तो बीजेपी नेताओं को बाप-बाप करने का एक और अवसर मिल गया। अब बाप भी कोई सामान्य आदमी का नहीं था, प्रधानमंत्री मोदी का था। लिहाज़ा भाजपाइयों का भड़कना स्वाभाविक था। आखिर वफ़ादारी साबित करने के लिए कभी-कभी बाप तक को मैदान में उतारना पड़ता है।
हालाँकि भक्तों को थोड़ा धीरज रखना चाहिए था। मोदी जी के जन्मदाता पिता तो कब के परलोक सिधार चुके हैं। अब कोई उन्हें कहाँ भेज सकता है? लेकिन बात अपने बाप की होती तो शायद इतनी बेचैनी नहीं होती। मामला मोदी जी के बाप का था, इसलिए चुप रहना वफ़ादारी के खिलाफ़ जाता। राजनीति में अवसर पहचानना बहुत ज़रूरी है। कोई अवसर मिले और कार्यकर्ता उसका इस्तेमाल न करे, तो फिर उसकी निष्ठा पर सवाल उठना लाज़िमी है।
लेकिन इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी भी है। खड़गे ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे किस बाप की बात कर रहे हैं क्योंकि वे भी जानते हैं कि मोदी जी के जन्मदाता पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। ज़ाहिर है, उनका इशारा किसी दूसरे बाप की ओर रहा होगा। मगर अंधभक्तों की दिक़्क़त यह है कि वे हर बात का अर्थ अपने हिसाब से निकालते हैं। उनके लिए राजनीति में प्रतीकों का अर्थ समझना उतना ज़रूरी नहीं, जितना प्रतीकों पर आहत होना है।
हिंदू धर्म के इन ठेकेदारों को हिंदू धर्मग्रंथों का थोड़ा अध्ययन करना चाहिए था। अगर उन्होंने शास्त्रों में कभी झाँका होता तो शायद इस विवाद को लेकर इतनी हाय-तौबा नहीं मचाते। शास्त्रों में पाँच प्रकार के पिताओं का उल्लेख मिलता है। अगर हिंदुत्व की पाठशाला में सिर्फ़ नारे लगाने के बजाय थोड़ा पढ़ने-लिखने पर भी ध्यान दिया जाता तो वे समझ सकते थे कि खड़गे किस बाप की बात कर रहे होंगे। चलिए उन्हें बता देते हैं कि ये पाँच प्रकार के पिता कौन हैं-
जनिता चोपनेता च, यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता, पंचैते पितरः स्मृताः॥
अर्थात् पाँच प्रकार के पिता होते हैं। पहला जन्म देने वाला, दूसरा उपनयन संस्कार कराने वाला, तीसरा विद्या देने वाला, चौथा अन्नदाता और पाँचवाँ भय से रक्षा करने वाला। यानी पिता होने के लिए जैविक संबंध होना ज़रूरी नहीं। जीवन में कई लोग ऐसे होते हैं जिनके उपकार या संरक्षण के कारण उन्हें पिता का दर्जा दिया जाता है।
खड़गे राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। लंबा अनुभव है, संसदीय राजनीति की बारीकियाँ भी जानते हैं। इसलिए यह मानना मुश्किल है कि उन्होंने उस पिता के बारे में कहा होगा जो अब इस दुनिया में है ही नहीं। उन्होंने ज़रूर पाँच में से किसी दूसरे पिता की ओर इशारा किया होगा। अब हमें पता लगाना है कि वह कौन है।
पहली संभावना तो जन्मदाता पिता की ही थी, लेकिन वह ख़ारिज हो चुकी है। दूसरी संभावना उपनयन संस्कार कराने वाले पिता की है। मोदी जी तेली समुदाय से आते हैं। ऐसे में उनका उपनयन या जनेऊ संस्कार हुआ होगा, इसकी संभावना कम ही लगती है। लिहाज़ा इस पिता पर भी ज़्यादा समय बर्बाद करने की ज़रूरत नहीं।
तीसरे पिता हैं विद्या देने वाले। यानी गुरु। यह मामला थोड़ा पेचीदा है। मोदी जी ख़ुद अपने शैक्षणिक जीवन के बारे में जो कुछ बता चुके हैं, उसके आधार पर उनके औपचारिक गुरु की तलाश करना आसान नहीं। हाल में एक सज्जन ने ख़ुद को उनका गुरु बताया भी था, लेकिन उम्र के फ़ासले ने गुरु-शिष्य संबंध के गणित को कुछ उलझा दिया। वैसे उम्र का फ़ासला गुरु होने में बाधक नहीं होता, लेकिन इस मामले में राजनीतिक दावों की अपनी उम्र होती है।
हाँ, जिन राजनीतिक विद्याओं में मोदी जी पारंगत माने जाते हैं, उनकी पाठशाला आरएसएस रही है। संगठन, प्रचार, विचारधारा और राजनीतिक तिकड़मों की शिक्षा उन्हें वहीं से मिली है। इस लिहाज़ से आरएसएस को उनका वैचारिक गुरु या तीसरा पिता कहा जा सकता है। खड़गे अगर आरएसएस को राजनीतिक रूप से चुनौती देने की बात कर रहे थे, तो संभव है कि उनका इशारा इसी पिता की ओर रहा हो। वैसे भी गुरु का सम्मान करने का एक तरीक़ा यह भी है कि उसकी विचारधारा को सत्ता से विदा कर दिया जाए।
लेकिन अभी दो पिता और बाक़ी हैं। चौथे हैं अन्नदाता। इस कसौटी पर गौतम अडानी का नाम अपने आप ज़ेहन में आता है। विपक्ष लंबे समय से मोदी सरकार और अडानी समूह के संबंधों पर सवाल उठाता रहा है। कांग्रेस भी इस रिश्ते को लेकर कई बार राजनीतिक आरोप लगा चुकी है। ऐसे में अगर खड़गे का इशारा अन्नदाता की ओर था तो फिर किं आश्चर्यम्!
राजनीति में अन्नदाता का महत्व बहुत बड़ा होता है। अन्नदाता सिर्फ़ पेट नहीं भरता, कई बार राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी खाद-पानी देता है। हालाँकि यह रिश्ता कितना वास्तविक है और कितना राजनीतिक आरोप, इसका फैसला तथ्यों और जाँच से ही होना चाहिए। व्यंग्य का काम तो इस रिश्ते पर उठते सवालों की ओर इशारा करना है।
अब बचते हैं पाँचवें और आख़िरी पिता—भयत्राता। यानी वह जो भय से मुक्ति दिलाता है। इसके लिए पहले यह समझना होगा कि भय किस बात का है और उससे मुक्ति कौन दिलाता है।
मोदी जी की राजनीति में सबसे बड़ा भय सत्ता का जाना है। सत्ता में रहते हुए सत्ता खोने का भय शायद सबसे स्थायी साथी होता है। कुर्सी पर बैठे आदमी को कुर्सी जितनी सुरक्षा देती है, उसके जाने का ख़याल उतना ही असुरक्षित भी करता है। कुर्सी है तो सब कुछ है, कुर्सी नहीं तो क्या होगा? विपक्ष में बैठना पड़ेगा, सवालों के जवाब देने पड़ेंगे, आलोचनाएँ सुननी पड़ेंगी और क्या पता जेल भी जाना पड़ जाए।
ऐसे में भय से मुक्ति दिलाने वाला कौन हुआ? ज़ाहिर है, कुर्सी! वही कुर्सी जो भय पैदा भी करती है और उससे बचने का एकमात्र उपाय भी बनी रहती है। सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह आदमी को जितना ताक़तवर बनाती है, उसके जाने का डर उसे उतना ही बेचैन करता है।
अब इस पाँचवें पिता का रिश्ता सीधे रिजीम चेंज से जुड़ जाता है। अगर सत्ता बदलती है तो कुर्सी जाती है, कुर्सी जाती है तो भयत्राता भी चला जाता है। इसलिए रिजीम चेंज की बात सुनकर इतनी बेचैनी समझ में आती है। सवाल सिर्फ़ प्रधानमंत्री के पद का नहीं, उस पूरी व्यवस्था का है जिसमें सत्ता, संरक्षण, संसाधन और राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
तो खड़गे के बयान की गुत्थी कुछ-कुछ सुलझती दिखाई देती है। हो सकता है उनका इशारा आरएसएस की ओर रहा हो, अडानी की ओर रहा हो या फिर उस कुर्सी की ओर, जो भय से मुक्ति भी देती है और सत्ता से बेदख़ली का डर भी पैदा करती है। यह भी हो सकता है कि वे एक साथ तीनों पिताओं की विदाई की बात कर रहे हों।
वैसे एक बात तय है। लोकतंत्र में कोई भी बाप स्थायी नहीं होता। न जन्मदाता, न गुरु, न अन्नदाता और न भयत्राता। और कुर्सी तो बिल्कुल भी नहीं। सत्ता को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए, लोकतंत्र के लिए उतना ही अच्छा है।
आख़िरकार, लोकतंत्र में बाप चाहे जितने हों, सबका बाप तो जनता होती है। और जब जनता विदाई पर उतर आए तो फिर कोई बाप किसी को बचा नहीं सकता।