प्रधानमंत्री बहुत परेशान हैं। परेशानी की वजह देश की कोई समस्या नहीं है। महँगाई, बेरोज़गारी, चीन की घुसपैठ, पाकिस्तान की बदमाशी, ट्रम्प की धमकी—ये सब तो सरकार के रोज़मर्रा के काम हैं। इनसे निपटने के लिए मंत्रिमंडल है, मंत्रालय हैं, सलाहकार हैं, प्रवक्ता हैं और सबसे बढ़कर गोदी मीडिया है। परेशानी है गंभीर है और इन सबसे बड़ी है। परेशानी है- छप्पन इंच का सीना।
प्रधानमंत्री ने कभी बड़े गर्व से बताया था कि उनका सीना छप्पन इंच का है। उस समय लोगों ने तालियाँ बजाई थीं। तालियाँ इतनी जोर से बजी थीं कि उन्हें लगा होगा कि सीना सचमुच छप्पन इंच का हो गया है। अब वही जनता पूछ रही है कि छप्पन इंच कहाँ है?
कोई संकट आए, कोई चुनौती आए, कोई दुश्मन आँख दिखाए, लोग रट लगाना शुरू कर देते हैं—छप्पन इंच का सीना कहाँ है? ट्रम्प ने मज़ाक उड़ाया, चीन ने घुसपैठ कर दी, पाकिस्तान ने आँख दिखा दी, बस पूछने लगते हैं छप्पन इंची के बारे में। ऐसा लगता है कि देश की सारी समस्याओं का समाधान प्रधानमंत्री के सीने में ही बंद है। विदेश नीति का ताला भी उसी से खुलेगा, अर्थव्यवस्था की चाबी भी उसी में है और राष्ट्रीय सुरक्षा का पासवर्ड भी वहीं है।
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जिस देश में नेता का सीना नीति से बड़ा हो जाए, वहाँ संकट आते ही नीति नहीं, सीना खोजा जाता है।
अब देखिए कि प्रधानमंत्री का सीना न हुआ कोई मनोरंजक खिलौना हो गया। झुनझुना हो गया, खँजड़ियाँ हो गईं कि लगे बजाने। विपक्ष बजाता है, पत्रकार बजाते हैं, सोशल मीडिया बजाता है। अब तो जेन ज़ी भी अपने अंदाज़ में बजा रही है। प्रधानमंत्री ने सोचा था कि छप्पन इंच का सीना चुनाव में काम आएगा। उन्हें क्या पता था कि एक दिन यही सीना राजनीतिक ढोल बन जाएगा और देश की आधी आबादी उस पर अपनी हथेलियाँ चलाने लगेगी।
इस नाश पिटी जेन ज़ी ने तो हद ही कर दी। गाना बना डाला—‘छप्पन इंच का छोटा बंदर।’
दुनिया जानती है कि छप्पन इंच का बंदर छोटा नहीं हो सकता। तकरीबन पाँच फीट का होगा। मगर ज़ुर्रत देखिए कि उसे बाल नरेंद्र से भी जोड़ रहे हैं। सड़क-चौराहों पर गा रहे हैं, नाच रहे हैं, अभिनय कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के राजनीतिक व्यक्तित्व को बंदर की शक्ल में बदल रहे हैं।
प्रधानमंत्री को यह समझ में नहीं आ रहा कि बंदर छोटा है या सीना छोटा है। उन्हें तो यह भी समझ में नहीं आ रहा कि बंदर के साथ उनका नाम जोड़ने में जेन ज़ी ने इतनी दिलचस्पी क्यों दिखाई। आखिर उन्होंने बंदर बनने का कोई प्रशिक्षण तो नहीं लिया था। वे तो विश्वगुरु बनने निकले थे।
राजनीति में सबसे बड़ी दुर्घटना तब होती है, जब जनता नेता के बनाए प्रतीक को नेता के खिलाफ इस्तेमाल करने लगती है।
प्रधानमंत्री का कभी-कभी मन करने लगता है कि अभी जंतर-मंतर पर जाएँ और हनुमान जी की तरह कपड़े फाड़कर दिखा दें कि यह है छप्पन इंच का सीना। एक बार दिखा देंगे तो सबकी बोलती बंद हो जाएगी। मगर फिर रुक जाते हैं। घबरा जाते हैं कि अगर किसी ने इंची टेप निकाल लिया तो क्या होगा।
सीना दिखाने और सीना नपवाने में फर्क होता है। दिखाने में कैमरा काम आता है, नपवाने में इंची टेप।
सीना दिखाने और सीना नपवाने में फर्क होता है। दिखाने में कैमरा काम आता है, नपवाने में इंची टेप। कैमरा सरकार का हो तो सीना जितना चाहे बड़ा दिखाई दे सकता है। इंची टेप किसी सरकारी प्रवक्ता की तरह व्यवहार नहीं करता। वह न तो राष्ट्रहित समझता है, न चुनावी जरूरत। उसे केवल माप लेना आता है।

प्रधानमंत्री ने महसूस किया कि छप्पन इंच का दावा अब उनके लिए राजनीतिक संपत्ति नहीं, राजनीतिक देनदारी बन गया है। दावा करते समय उन्होंने सोचा होगा कि यह उनकी ताकत का प्रमाण है। अब वही प्रमाण जनता मांग रही है।

राजनीतिक दावों की उम्र भाषण तक होती है, लेकिन उनका हिसाब जनता लंबे समय तक रखती है।
आखिरकार उन्होंने गृहमंत्री और सुरक्षा सलाहकार को मीटिंग के लिए बुला लिया। दोनों गंभीर मुद्रा में पहुँचे। प्रधानमंत्री ने समस्या सामने रखी और कहा, “अब बहुत हो गया। इस छप्पन इंच को रोकना होगा। सोचो, कैसे रोका जा सकता है।”
गृहमंत्री को ऐसे कामों का अनुभव था। वे हर समस्या का समाधान कानून और पुलिस में खोजते हैं। उन्हें लगता है कि देश में अगर कोई चीज़ ठीक नहीं चल रही तो कानून की एक नई धारा बनाकर उसे ठीक किया जा सकता है। कानून से सड़क बन सकती है, कानून से पुल बन सकता है, कानून से विपक्ष भी शांत हो सकता है। कम से कम कोशिश तो की ही जा सकती है।
उन्होंने तुरंत कहा, “प्रधानमंत्री जी, सबसे आसान तरीका है कि छप्पन इंच शब्दों को ही बैन कर देते हैं। कहीं भी कोई सार्वजनिक स्तर पर या सोशल मीडिया पर छप्पन इंच का ज़िक्र करेगा तो उसे जेल जाना होगा। जेल में पुलिस बाक़ी का काम कर ही देगी।” प्रधानमंत्री ने उनकी तरफ देखा। सुझाव में उन्हें एक परिचित आत्मविश्वास दिखाई दिया। गृहमंत्री के पास हर सवाल का जवाब था- कानून। सवाल चाहे सीने का हो, चुनाव का हो या लोकतंत्र का।
गृहमंत्री ने आगे कहा, “इससे दो फायदे होंगे। एक तो कोई छप्पन इंच नहीं बोलेगा, दूसरे विपक्ष को भी पता चल जाएगा कि सरकार की छाती पर चढ़कर राजनीति करना आसान नहीं है।”
प्रधानमंत्री ने पूछा, “लेकिन अगर लोग फिर भी बोलते रहे?”
“तो सज़ा बढ़ा देंगे।”
गृहमंत्री इससे भी कठोर कार्रवाई चाहते थे। उनके मन में ज़ुबान काटने की सज़ा भी थी। उनका तर्क था कि जब ज़ुबान ही नहीं रहेगी तो छप्पन इंच का सवाल भी नहीं रहेगा। लेकिन उन्हें लगा कि लोकतंत्र अभी उस स्थिति में नहीं पहुँचा है जहाँ ऐसी सज़ा दी जा सके। उस स्टेज तक पहुंचने के लिए और काम करना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री ने सुझाव ठुकरा दिया। इसलिए नहीं कि उन्हें पसंद नहीं आया, बल्कि इसलिए कि इससे संयुक्त राष्ट्र तक बात जा सकती थी। अमेरिका और यूरोपीय देश मानवाधिकार के नाम पर निंदा-भर्त्सना कर सकते थे। विदेशी मीडिया लोकतंत्र पर हमला बता देता। विपक्ष संसद में हंगामा करता। मामला छप्पन इंच से निकलकर मानवाधिकार तक पहुँच जाता।
प्रधानमंत्री ने सोचा कि इतना बड़ा सीना लेकर भी अगर मानवाधिकार के सामने झुकना पड़े तो फिर सीने का फायदा क्या?
सत्ता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से उतनी परेशानी नहीं होती, जितनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लोकप्रिय हो जाने से होती है।
सुरक्षा सलाहकार अपनी अनूठी बुद्धि के लिए जाने जाते हैं। वे हर समस्या में साजिश देखते हैं और हर साजिश में किसी विदेशी हाथ की तलाश करते हैं। उन्हें लगता है कि कोई भी सवाल अपने आप पैदा नहीं होता। सवाल के पीछे कोई संगठन होगा, संगठन के पीछे कोई फंडिंग होगी और फंडिंग के पीछे कोई देश होगा।
प्रधानमंत्री ने सोचा कि इतना बड़ा सीना लेकर भी अगर मानवाधिकार के सामने झुकना पड़े तो फिर सीने का फायदा क्या?
सत्ता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से उतनी परेशानी नहीं होती, जितनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लोकप्रिय हो जाने से होती है।
सुरक्षा सलाहकार अपनी अनूठी बुद्धि के लिए जाने जाते हैं। वे हर समस्या में साजिश देखते हैं और हर साजिश में किसी विदेशी हाथ की तलाश करते हैं। उन्हें लगता है कि कोई भी सवाल अपने आप पैदा नहीं होता। सवाल के पीछे कोई संगठन होगा, संगठन के पीछे कोई फंडिंग होगी और फंडिंग के पीछे कोई देश होगा।
उन्होंने सलाह दी, “प्रधानमंत्री जी, छप्पन इंची का ताना मारने वाले आंदोलनजीवियों, पत्रकारों, व्यंग्यकारों और जेन ज़ी के पीछे ख़ुफ़िया एजेंसियाँ लगा देते हैं। उनकी जानकारी इकट्ठी करके फिर सीबीआई, इनकम टैक्स, ईडी वगैरह लगा देंगे। संदेश चला जाएगा कि छप्पन इंच बोलने का मतलब है जान मुश्किल में डालना।”

प्रधानमंत्री ने उन्हें प्रशंसा की नज़रों से देखा। सुझाव उन्हें पसंद आया। उन्हें लगा कि सुरक्षा सलाहकार ने समस्या की जड़ पकड़ ली है। छप्पन इंच का सवाल अब राष्ट्र की सुरक्षा का सवाल बन सकता है। और जब कोई सवाल राष्ट्र की सुरक्षा का सवाल बन जाता है तो उसका जवाब देने की ज़रूरत नहीं रहती। एजेंसियाँ अपने आप जवाब देने लगती हैं।

सुरक्षा सलाहकार ने आगे कहा, “हम पता लगा लेंगे कि गाना किसने बनाया, किसने फैलाया, किसने शेयर किया और किसने सुनकर हँसी उड़ाई। जरूरत पड़ी तो उन लोगों की भी जाँच होगी, जो गाना सुनकर हँसे।”
प्रधानमंत्री ने पूछा, “हँसने वालों की भी?”
“जी। हँसी भी एक तरह की प्रतिक्रिया है। आजकल लोग बिना अनुमति के हँसने लगे हैं। यह राष्ट्रीय अनुशासन के लिए ठीक नहीं है।”
प्रधानमंत्री को यह बात बहुत पसंद आई। उन्हें लगा कि अब हँसी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
लेकिन सुरक्षा सलाहकार से निजी खुन्नस रखने वाले गृहमंत्री ने भाँजी मार दी। “हम कितनों के पीछे जासूस छोड़ेंगे? अगर पूरा देश ही छप्पन इंच का नारा लगाने लगेगा तो जेलें भर जाएंगी। अदालतों में याचिकाओं के अंबार लग जाएंगे। मानवाधिकारवादी और अधिक शोर मचाने लगेंगे। फिर हमें उन पर भी कार्रवाई करनी पड़ेगी। इस तरह तो सरकार का पूरा समय छप्पन इंच में ही निकल जाएगा।”

प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री की बात पर विचार किया। उन्हें पहली बार लगा कि छप्पन इंच का सवाल प्रशासनिक क्षमता से भी बड़ा है। देश में इतने लोग हैं,इतने सवाल हैं, इतनी हँसी है। सबको पकड़ना आसान नहीं है। तानाशाही की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे हर नागरिक को संदिग्ध बनाने के लिए बहुत बड़ी पुलिस चाहिए और हर नागरिक को चुप कराने के लिए उससे भी बड़ा डर।

इतने में सूचना आई कि स्वास्थ्य मंत्री पधारे हैं। प्रधानमंत्री ने सोचा, क्यों न उनकी भी राय ले लें। आख़िर मामला सीने का है। स्वास्थ्य मंत्री को बुलवा लिया गया और समस्या तश्तरी में रखकर उनके सामने परोस दी गई।
कुछ क्षण चुप रहने और इस बीच तीन बार बाल खुजाने के बाद स्वास्थ्य मंत्री बोले, “देखिए, मुझे लगता है कि समस्या उतनी बड़ी नहीं है, जितनी हम समझ रहे हैं। देश यही जानना चाहता है न कि सीना छप्पन इंच का है या नहीं। इसका सीधा-सा समाधान है। हम एक प्रसिद्ध डॉक्टर से सीना नपवाकर अधिसूचना जारी कर देते हैं। देश भर को पता चल जाएगा कि सीना छप्पन इंच का ही है।”
प्रधानमंत्री को सुझाव अच्छा लगा। उन्हें लगा कि अब मामला वैज्ञानिक तरीके से हल हो जाएगा। आखिर विज्ञान का जमाना है। हर चीज़ का माप हो सकता है। विकास का माप, गरीबी का माप, बेरोज़गारी का माप, लोकतंत्र का माप और अब सीने का माप।
लेकिन प्रधानमंत्री ने शंका प्रकट की। “हो सकता है कि 2014 के मुकाबले आज सीना कुछ कम हो गया हो।”
स्वास्थ्य मंत्री ने आश्वस्त किया, “इसका टेंशन आप मत लीजिए। जब चुनाव का नतीजा हम पलटवा सकते हैं तो क्या छत्तीस को छप्पन इंच नहीं बनवा सकते? चुनाव आयोग की तरह डॉक्टर हमारा होगा। उससे जो कहा जाएगा, करेगा। चिकित्सा विज्ञान में बहुत प्रगति हुई है।”
गृहमंत्री ने तुरंत जोड़ा, “और हमारा गोदी मीडिया कब काम आएगा? दिन-रात वह आपके सीने का नाप देता रहेगा। जिन भक्तों के मन में संदेह रहा होगा, वह दूर हो जाएगा। चैनलों पर विशेषज्ञ बैठेंगे। बताएंगे कि छप्पन इंच का सीना आत्मविश्वास का प्रतीक है। जो लोग इसे कम बताते हैं, वे राष्ट्र की शक्ति को कम करके आँक रहे हैं।”
सुरक्षा सलाहकार अपने सुझाव के खारिज होने से थोड़ा दुखी थे, लेकिन उन्हें इस बात की खुशी थी कि गृहमंत्री का सुझाव भी फेल हो गया। इसलिए उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री के सुझाव की भूरि-भूरि प्रशंसा कर डाली।
प्रधानमंत्री को लगा कि अब समस्या का समाधान हो गया है। डॉक्टर सीना नापेगा, मीडिया उसका प्रचार करेगा और भक्त उसकी पुष्टि करेंगे। जनता के सामने एक प्रमाणपत्र होगा। प्रमाणपत्र में छप्पन इंच लिखा होगा। उसके नीचे हस्ताक्षर होंगे। हस्ताक्षर के नीचे सरकारी मुहर होगी। कोई पूछेगा तो प्रमाणपत्र दिखा दिया जाएगा।
हमारे यहाँ सच वही नहीं होता जो है, सच वह होता है जिसके पक्ष में सरकारी प्रमाणपत्र जारी हो जाए।
प्रधानमंत्री ने पूछा, “लेकिन अगर जनता फिर भी सवाल करे?”
स्वास्थ्य मंत्री बोले, “तो जनता को समझाना होगा कि सीना केवल शरीर का माप नहीं है। यह आत्मविश्वास का माप है।”
गृहमंत्री ने कहा, “और जो नहीं समझेगा, उसे कानून समझा देगा।”
सुरक्षा सलाहकार ने कहा, “और जो कानून से भी नहीं समझेगा, उसके पीछे एजेंसियाँ लग जाएंगी।”
प्रधानमंत्री ने तीनों को देखा। उन्हें लगा कि देश चलाने के लिए अब सीने की जरूरत नहीं है। सीने का प्रमाणपत्र, मीडिया का प्रचार और एजेंसियों का डर काफी है।
आप पूछ सकते हैं कि किसी प्रधानमंत्री का सीना छप्पन इंची क्यों होना चाहिए? वह अगर थोड़ा कम-ज्यादा हो तो उससे क्या फर्क पड़ता है? प्रधानमंत्री के सभी अंग सही-सलामत हों और खास तौर पर ऊपरी माला ठीक हो, इतना काफी होना चाहिए। कोई उसे अखाड़े में उतरना है या किसी हॉलीवुड-बॉलीवुड फिल्म में बाहुबली का रोल करना है?

देश चलाने के लिए सीने की चौड़ाई से ज्यादा दिमाग की गहराई चाहिए। लेकिन दिमाग की गहराई नापने का कोई आसान यंत्र नहीं है। सीने की चौड़ाई नापने के लिए इंची टेप काफी है। इसलिए राजनीति में इंची टेप का महत्व दिमाग से ज्यादा हो गया है।

जिस देश में नेतृत्व की परीक्षा सीने से होती हो, वहाँ बुद्धि का छोटा होना भी राष्ट्रहित में छिपाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने आखिरकार एक समाधान ढूँढ़ लिया था। उन्होंने तय किया कि अब छप्पन इंच को केवल एक शारीरिक माप नहीं रहने दिया जाएगा। उसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनाया जाएगा। एक अभियान चलेगा—‘छप्पन इंच, मजबूत भारत।’
हर चैनल पर छप्पन इंच का महत्व बताया जाएगा। स्कूलों में बच्चों को समझाया जाएगा कि छप्पन इंच केवल सीने की चौड़ाई नहीं, आत्मविश्वास की ऊँचाई है। सरकारी विज्ञापनों में सीने के साथ विकास की तस्वीरें दिखाई जाएँगी। भक्तों को बताया जाएगा कि छप्पन इंच पर सवाल उठाना राष्ट्र की भावनाओं पर सवाल उठाना है।
लेकिन अभियान शुरू होता इसके पहले जेन जी ने एक और वीडियो वायरल कर दिया है-
...56 इंच की खुल गई पोल, साहेब का हो गया डब्बा गोल...