भारतीय राजनीति के लिए यह एक शुभ समाचार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बदल रहे हैं। इंस्ट्राग्राम पर वीडियो बनाने के बाद अब वे रैम्प पर वॉक कर रहे हैं। यह कोई साधारण घटना नहीं है। पचहत्तर पार का आदमी जब रैम्प पर उतरता है तो वह केवल रैम्प पर नहीं उतरता, वह इतिहास में उतरता है। जवान लड़कों को जिम में वर्षों की मेहनत के बाद जो आत्मविश्वास मिलता है, वह हमारे प्रधानमंत्री ने एक वॉक में हासिल कर लिया।
जो लोग इसे मामूली घटना समझ रहे हैं, वे राजनीति को नहीं समझते। राजनीति में रैम्प और रास्ते दोनों प्रतीक होते हैं। कोई सड़क पर चलता है, कोई रथ पर, कोई लिमोज़ीन में और कोई रैम्प पर। प्रश्न यह नहीं है कि नेता कहाँ चल रहा है; प्रश्न यह है कि वह किस दिशा में चल रहा है, किसलिए चल रहा है।
मुझे लगता है कि यह परिवर्तन की शुरुआत भर है। आज रैम्प है, कल जिम होगा। परसों प्रोटीन शेक होगा। फिर किसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से सूचना आएगी कि योग अब पुरानी तकनीक हो चुकी है और राष्ट्रनिर्माण के लिए बाइसेप्स आवश्यक हैं।
उसके बाद देशभक्ति की नई परिभाषा जारी होगी—"जो राष्ट्र को प्रेम करता है, वह कम से कम आठ किलो डम्बल तो उठाता ही है।"
उत्साहित होकर देश भर में जिम खोलने के लिए वे बजट में पाँच हज़ार करोड़ का प्रावधान कर देंगे। हिंदू ब्रिगेड के तमाम लंपट, शोहदे अनुदान लेकर जिम खोलेंगे। देश में जिम क्रांति आ जाएगी। हर जिम में प्रधानमंत्री के बॉडी बिल्डर टाइप एआई से बने पोस्टर लगेंगे, जिससे जेन ज़ी प्रेरणा ले सकेगी।
ज़ाहिर है कि विकास विरोधी जेन ज़ी इसे "चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं" कहकर मीम बना रही है। कुछ लोग उन्हें 56 इंच का नकलची बंदर भी कह रहे हैं। मगर वे बुरा नहीं मानते। जवानी में वे भी इस तरह की शरारतें करते थे। बुड्ढों का मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे कि साठ के बाद इनको रिटायर कर देना चाहिए। बाद में उन्हें एहसास हुआ कि राजनीति के फल तो साठ के बाद ही लगते हैं, इसलिए जब तक काया साथ दे फलाहार करते रहना चाहिए।
प्रधानमंत्री को तो इस बात का भी भय नहीं होगा कि कहीं ज़्यादा वेट उठा लिया तो रीढ़ की हड्डी न खिसक जाए। वह तो इतनी लचीली बन गई है कि ट्रम्प की लगातार धमकियों से भी उस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। या क्या पता, वह हो ही न इसलिए कोई ख़तरा भी न हो।
फिर एक दिन हम उन्हें जींस और टी-शर्ट में संसद की सीढ़ियाँ चढ़ते देखेंगे। सफ़ेद दाढ़ी भी राष्ट्रहित में त्यागी जा सकती है। बालों का रंग भी बदल सकता है। आखिर परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जो बदलता नहीं, वह विपक्ष में बैठता है।
राजनीति में सिद्धांत जूतों की तरह होते हैं। यात्रा लंबी हो जाए तो आदमी उन्हें बदल लेता है, मगर दावा यही करता है कि वह उसी रास्ते पर चल रहा है।
मोदी जी एंटायर पोलिटिकल साइंस में एमए हैं। राजनीतिक सिद्धांतों को उन्होंने केवल पढ़ा नहीं है, बल्कि उन्हें जिया है। उनका जीवन ही राजनीति शास्त्र की खुली पाठ्य पुस्तक है। उन्होंने अपने जीवन से साबित किया है कि मनुष्य सब कुछ बदल सकता है—पेशा, पहनावा, भाषा, मित्र, शत्रु, नारे, गठबंधन और आवश्यकता पड़ने पर इतिहास भी।
चाय बेचने वाले से लेकर दस लाख के सूट तक की यात्रा कोई सामान्य यात्रा नहीं थी। यह परिवर्तनवाद का महाकाव्य था। जिस देश में लोग दशकों तक अपनी आदतें नहीं बदल पाते, जहाँ घर में शौचालय होने के बावजूद लोग दिशा-मैदान के लिए जाना पसंद करते हैं, वहाँ एक व्यक्ति ने अपनी छवि को इतनी बार बदला कि विरोधी भी भ्रमित हो गए कि वे आलोचना किस संस्करण की करें।
राजनीति में आदमी अपनी आत्मकथा नहीं लिखता, अपनी जीवनी बार-बार संशोधित करता है।
राजनीति स्वयं परिवर्तन का विश्वविद्यालय है। यहाँ सुबह का राष्ट्रवादी शाम को देशद्रोही हो सकता है और शाम का सेकुलर अगले चुनाव तक सनातनी। यहाँ दल बदलना विचार परिवर्तन कहलाता है और विचार बदलना राष्ट्रहित।
राजनीति में आदमी पार्टी नहीं बदलता, उसका हृदय बदल जाता है। वह कल तक जिस विचारधारा को देश के लिए घातक बता रहा था, आज उसी के साथ मंच साझा कर रहा होता है। यह लोकतंत्र का चमत्कार नहीं, लक्ष्य परिवर्तन का चमत्कार है।
हमारे यहाँ विचारधारा वह रेलगाड़ी है जिसमें नेता हमेशा खिड़की वाली सीट पर बैठता है। स्टेशन बदलते ही उसे लगता है कि मंज़िल भी बदल गई।
प्रधानमंत्री हमेशा से परिवर्तन के पक्षधर रहे हैं। उन्होंने इस देश को सिखाया है कि कोई व्यक्ति स्थायी रूप से भ्रष्ट नहीं होता। वह केवल विपक्ष में होता है। जैसे ही वह सत्तापक्ष में आता है, उसके भीतर छिपा राष्ट्रभक्त जाग उठता है। वह सदाचारी हो जाता है। यह परिवर्तन सत्ता से ही संभव है।
सत्ता गंगा से भी बड़ी नदी है। उसमें डुबकी लगाते ही पाप नहीं, आरोप धुल जाते हैं। यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा आध्यात्मिक चमत्कार है, जिसका श्रेय केवल और केवल प्रधानमंत्री को जाता है।
इसीलिए प्रधानमंत्री ने कभी भ्रष्टाचारियों और अपराधियों से घृणा नहीं की। वे उनमें संभावनाएँ देखते हैं। जहाँ सामान्य मनुष्य अपराधी देखता है, वहाँ वे भविष्य का सहयोगी देखते हैं। जहाँ जनता घोटाला देखती है, वहाँ वे चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया देखते हैं।
कुछ नासमझ लोग पूछते हैं कि यह हृदय परिवर्तन चुनाव के पहले ही क्यों होता है? किसी सरकार को गिराने या बनाने के समय ही क्यों होता है? यह प्रश्न वैसा ही है जैसे कोई किसान से पूछे कि फसल कटाई के मौसम में ही क्यों पकती है।
लोग यह नहीं समझते कि परिवर्तन अचानक नहीं आता। उसके पीछे एक लंबी साधना होती है। कहीं ईडी साधना कर रही होती है, कहीं सीबीआई तपस्या कर रही होती है, कहीं आयकर विभाग आत्मशुद्धि का अभियान चला रहा होता है।
जब सारी संस्थाएँ मिलकर किसी आत्मा को निर्मल कर देती हैं, तब वह व्यक्ति सत्ता के पवित्र सरोवर में स्नान करके बाहर निकलता है। जनता उसे दल-बदलू समझती है, अवसरवादी और भ्रष्ट समझती है, जबकि वास्तव में वह आध्यात्मिक रूप से पुनर्जन्म ले चुका होता है।
भारतीय राजनीति में मोक्ष प्राप्ति के दो ही रास्ते हैं—या तो हिमालय चले जाइए, या फिर सही समय पर सही पार्टी में।
अब देश की नई पीढ़ी—जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा—परिवर्तन चाहती है। वे चाहती हैं कि प्रधानमंत्री युवाओं को समझें, उनसे संवाद करें। अब यह तभी संभव है कि वे युवा दिखें, और युवा दिखने के लिए जो कुछ करना पड़े, वह किया जाए। आखिर लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है। यदि युवा रील देखते हैं तो नेता रील बनाते हैं। यदि युवा मीम बनाते हैं तो नेता मीम का विषय बन जाते हैं।
पहले नेता जनता के बीच जाकर लोकप्रिय होते थे, अब एल्गोरिद्म के महासागर में तैरकर युवा होते हैं।
भले ही कोई भरोसा न करे मगर सचाई ये है कि प्रधानमंत्री युवाओं से बहुत प्रेम करते हैं। वे उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। वे उनके साथ सेल्फ़ी ले सकते हैं, पॉडकास्ट कर सकते हैं, रैम्प पर चल सकते हैं, मीम बन सकते हैं और गालियाँ भी माफ़ कर सकते हैं। ज़रूरत पड़ने पर पेलेट गन और एके-47 भी चलवा सकते हैं।
कौन जाने, युवाओं को खुश करने के लिए कल को वे घोषणा कर दें कि अब राष्ट्र के विकास की गति जीडीपी से नहीं, इंस्टाग्राम एंगेजमेंट से मापी जाएगी।
मैं तो बस यह सोच रहा हूँ कि यदि परिवर्तन की यह यात्रा ऐसे ही चलती रही तो किसी दिन हमें यह समाचार भी मिल सकता है कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष को भी लोकतंत्र का आवश्यक अंग मान लिया है और अब नेता प्रतिपक्ष से सलाह-मशवरा किए बिना कोई क़दम नहीं उठाएँगे।
उस दिन देश में छुट्टी घोषित कर देनी चाहिए, क्योंकि उस दिन केवल प्रधानमंत्री का नहीं, भारतीय राजनीति का हृदय परिवर्तन हो जाएगा।