शीर्षक पढ़कर आपको झटका लगा होगा। किसी को भी लगेगा। मगर उनको नहीं लगेगा, जो अमेरिकी आदेश पर चलना राष्ट्रीय कर्तव्य मानते हैं। जिन्हें लगता है कि अमेरिका भले ही फादरलैंड न हो मगर ट्रम्प तो जगत पापा हैं ही। बल्कि वे तो और भी उत्साहित हो गए होंगे कि अरे ये तो वही हो रहा है जो हम चाह रहे थे।
कुछ लोगों के लिए आत्मनिर्भरता का अर्थ होता है- किसी बड़े मालिक पर निर्भर होने की स्वतंत्रता।
कुछ नकचढ़ों और अमेरिका विरोधियों को आग़ लग गई होगी, मगर जिनकी ज़ुबान पर इंडिया और दिल में अमेरिका रहता है वे तो उछल ही पड़े होंगे। उन्हें लगा होगा कि अब हम भी अमेरिकी बन जाएंगे। सैम अंकल हमारे अपने हो जाएंगे। जैसे महारानी एलिज़बेथ थी वैसे ट्रम्प होंगे। हमें अंग्रेज़ों से कोई कष्ट नहीं था, ट्रम्प से भी नहीं होगा।
वैसे तो भारत कभी अमेरिका जैसा धनवान बनने से रहा। मोदी सरकार के रहते तो ये असंभव ही हो चुका था। 2047 की डेट लगा दी है, लेकिन कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
डेढ़ साल पहले जब ट्रम्प ने कनाडा से इक्यानवाँ राज्य बनने के लिए कहा था तो उसने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। उस समय बहुत से भारतीयों को लगा था कि उन्हें ये सुनहरा अवसर मिला होता तो वे क़तई न छोड़ते। उन्होंने कनाडाई प्रधानमंत्री को उनकी कमअक्ली को जमकर कोसा भी था।
गुलामी की सबसे विकसित अवस्था वह है, जब आदमी उसे अवसर समझने लगे। बहुत सारे भारतीय उसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
बहरहाल, अब ठीक है। दरअसल, ये सरकार की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। डेढ़ साल से उसकी लगातार फ़ज़ीहत हो रही थी। ख़ास तौर पर प्रधानमंत्री की बेइज़्ज़ती तो जैसे दिन की एक बड़ी ख़बर होती ही होती थी। अंधभक्तों को तो इस बेइज़्ज़ती से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था, क्योंकि अंग्रेज़ों के ज़माने से वे इस तरह की बेइज्ज़ती के अभ्यस्त थे। वे उन्हें ऊंची नस्ल के जीव मानते थे और ये भी उनका परम विश्वास था कि भगवान ने उन्हें दूसरी जातियों का अपमान करने का हक़ दे रखा है।
लेकिन शेष भारतीय अपमानित थे और दुखी भी। आख़िरकार प्रधानमंत्री का अपमान देश का अपमान होता है। वे प्रधानमंत्री पर क्रोधित भी होते थे कि वे जवाब क्यों नहीं देते, आत्म सम्मान की रक्षा क्यों नहीं करते। मगर प्रधानमंत्री पता नहीं किस मिट्टी के बने थे कि उन्हें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता था।
लेकिन अंधभक्त अब समझ गए हैं कि प्रधानमंत्री ये अपमान उनके लिए झेल रहे थे। वे तो मिशन अमेरिका 51 में लगे हुए थे। अब जब इतना बड़ा मिशन हाथ में लिया हो तो छोटी-मोटी बातों को अनदेखा करना ही पड़ता है।
ग़लत नहीं कहा गया है कि धैर्य का फल मीठा होता है। ये तो अपमान का फल भी मीठा होने की बात हो गई। महान सभ्यताओं में कई बार अपमान को दूरदर्शिता और चुप्पी को रणनीति घोषित किया गया है।
वैसे प्रधानमंत्री ने देश हित के मामले में कभी निजी प्रतिष्ठा को आड़े नहीं आने दिया। चाहे गलवान हो, ऑपरेशन सिंदूर हो या फिर रूस और ईरान से तेल ख़रीदने का मामला। उनके सामने बड़ा लक्ष्य था। वे केवल पक्षी की आँख देख रहे थे। अर्जुन की तरह उन्हें वृक्ष और आसपास की चीज़ें दिखलाई ही नहीं दे रही थीं।
कहीं से उन्हें ये ख़बर भी मिल गई थी कि जनरल असीम मुनीर भी ट्रम्प को पटा रहे हैं कि पाकिस्तान को वे 51 वाँ राज्य घोषित कर दें। इसके बाद उन्होंने प्रयास और तेज़ कर दिए थे। हरदीप पुरी और अजीत डोभाल को इस काम में लगा दिया गया था।
माना जाता है कि आरएसएस नेताओं के अमेरिकी दौरे इसी सिलसिले में हुए थे और मोहन भागवत ने प्रवासी भारतीयों से जो कर्मभूमि के प्रति समर्पित रहने की बात की थी उसका भी मक़सद यही था।
सचाई ये भी है कि कनाडा के मना करने से ट्रम्प बुरी तरह आहत थे। ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की उनकी चाह भी पूरी नहीं हो रही थी। फिर भी वे चाहते थे कि किसी तरह अमेरिकी साम्राज्य का विस्तार हो। ऐसे में भारत जैसा विशाल देश अमेरिका का हिस्सा बन जाए बल्ले-बल्ले हो जाए।
वे इसमें कई फ़ायदे देख रहे थे। अव्वल तो ये कि मिड टर्म पोल जीतना आसान हो जाएगा। भारत में बीजेपी तो रिपब्लिकन पार्टी की एक्सटेंशन ही है, मगर डेमोक्रेटिक पार्टी का कोई आधार नहीं है। पंचान्नवे करोड़ मतदाताओं में पचास फ़ीसदी जुड़ जाएंगे तो खेल हमेशा के लिए पलट जाएगा।
फिर भारत की खनिज संपदा पर भी उनकी नज़र थी। हालाँकि उन्हें पता था कि अँग्रेज बहुत कुछ पहले ही लूटकर ले गए हैं, मगर फिर भी अभी बहुत कुछ लूटने के लिए बचा हुआ है। दुनिया का अनुभव बताता है कि लूट में कभी “पर्याप्त” जैसी कोई चीज़ नहीं होती। अडानी-अंबानी इसमें उनकी मदद के लिए सहर्ष तैयार थे, क्योंकि वे भी अमेरिका के सहयोग से अपना लूटने के लिए बेक़रार थे।
साम्राज्यवादी भूख और शेयर बाज़ार की भूख में एक समानता है—दोनों कभी तृप्त नहीं होते। और सबसे बड़ा फ़ायदा तो उन्हें भू-सामरिक मामले में दिखा। भारत अमेरिका का हिस्सा बना नहीं कि चीन की हवा टाइट हो जाएगी। एक तो भारत में सैन्य अड्डे बनाकर पूरे क्षेत्र में अमेरिका का दबदबा कायम कर देंगे, दूसरे, भारत के सस्ते लेबर से वे चीन की मैन्यूफैक्चरिंग का भी भट्ठा बैठा देंगे। गिरमिटियों के तरह उनका भी आयात-निर्यात किया जा सकेगा।
इस तरह भारतीय प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति दोनों के लिए ये विन विन सिचुएशन थी। दोनों में तुरंत सहमति बन गई। हालाँकि समझौते के पूरे ब्यौरे नहीं आए हैं, लेकिन अमेरिकी अख़बारों ने व्हाइट हाऊस के सूत्रों के हवाले से बताया है कि हो सकता है कि भारतीय प्रधानमंत्री की स्थिति अमेरिका के अन्य राज्यों के गवर्नर की तरह होगी, लेकिन उसे कहा प्रधानमंत्री ही जाएगा, ताकि भारतीयों की भावनाएं आहत न हों।
ये तो सर्वविदित है ही कि पद बदलने से लोग ज़्यादा नाराज़ होते हैं, अधिकार बदलने से कम। इसके अलावा, रक्षा, विदेश नीति, संचार और आर्थिक नीतियाँ भी वाशिंगटन देखेगा। करेंसी के मामले में भी बातचीत चल रही है। भारत चाहता है कि रुपए की जगह डॉलर ले ले। इससे एक लाभ तो ये होगा कि रुपए के गिरने से होने वाली बदनामी रुक जाएगी। दूसरे गाँधी जी से भी मुक्ति मिल जाएगी। डॉलर में तो गाँधी जी की तस्वीर होगी नहीं।
भारत की सवर्ण जातियाँ इससे खुश हैं। उन्हें लग रहा है कि अब संविधान भी बदल जाएगा और आरक्षण भी ख़त्म हो जाएगा। ट्रम्प जिस तरह से अमेरिका में गोरों का वर्चस्व चाहते हैं, वैसे ही भारत में वे सवर्णों के वर्चस्व को स्थापित करने में मदद करेंगे क्योंकि वे हमेशा से विदेशी सत्ता के प्रति वफ़ादार रहते आए हैं।
ब्राम्हणों ने तो श्लोक भी ढूँढ़ने शुरू कर दिए हैं जिनमें बताया जाएगा कि अमेरिका पहले जंबू द्वीप का ही हिस्सा था और वहाँ फलाँ राजा का राज था। किसी ऋषि के श्राप की वज़ह से राजा का पतन हुआ और अमेरिका भी छिटक के दूर चला गया।
कुछ विद्वानों ने दावा किया है कि महाभारत में अर्जुन वास्तव में विस्कांसिन स्टेट गए थे, जिसे बाद के पुराणकारों ने विराटनगर लिख दिया।
एक संघी विद्वान ने प्रमाण दिया कि वाशिंगटन का असली नाम "वशिष्ठग्राम" था, जिसे विदेशी इतिहासकारों ने बिगाड़ दिया। दूसरे विद्वान ने बताया कि न्यूयॉर्क का उल्लेख महाभारत में "नवयक्षपुर" के रूप में मिलता है। इस तरह उनका अखंड भारत का प्रोजेक्ट अमेरिकी महाद्वीप तक फैल जाएगा।
इस महादेश में जब इतिहास साथ नहीं देता तो मिथक उसकी जगह तैनात कर दिया जाता है। फिर वह हक़ीक़त से जंग लड़ता है। उच्च और मध्यवर्ग की खुशियों का तो ठिकाना ही नहीं है। उन्हें लग रहा है कि अब वीज़ा, ग्रीन कार्ड वगैरा का लफड़ा ख़त्म हो जाएगा। डोंकी मारकर जाने वाले गुजराती, पंजाबी भी खुश हैं। वे ख़्वाब देखने लगे हैं कि अब बिना कोई ख़तरा उठाए अमेरिका जा सकेंगे।
इनमें से कितनी बातें सच होंगी ये तो समझौता के सामने आने के बाद ही पता चलेगा। लेकिन गोदी मीडिया के ऐंकरों के लिए अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए इतनी ही जानकारी काफी थी, इसलिए वे टूल किट के आने से पहले ही शुरू हो गए।
रात आठ बजे एक चश्मुद्दीन एंकर चीख़ रहा था- मित्रों! सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका का 51वाँ राज्य क्यों बना। सवाल यह है कि अभी तक क्यों नहीं बना था? नेहरू जी ने क्या किया? नेहरू गाँधी परिवार क्यों असफल रहा?
स्टूडियो में बैठे एक प्रवक्ता ने बताया कि इस दिशा में काम कई वर्षों से चल रहा था। प्रधानमंत्री जी दूरदर्शी हैं। जब लोग चीन, पाकिस्तान और महँगाई में उलझे थे, तब वे अमेरिका की ओर देख रहे थे।
दूरदर्शी नेता वही होता है जो इतनी दूर देखे कि अपने पैरों के नीचे की ज़मीन दिखाई देना बंद हो जाए। गोदी मीडिया की इस घोषणा के बाद देश भर में उत्सव का माहौल है। दिल्ली के एक युवक ने अपनी गर्लफ्रेंड को मैसेज किया- अब मैं भी अमेरिकी बनने वाला हूँ। हालाँकि वह पिछले पच्चीस वर्षों से दिल्ली के उत्तम नगर में ही रह रहा है।
प्रायवेट यूनिवर्सिटियों और कोचिंग संस्थानों ने भी तेजी दिखाई है। एक प्रसिद्ध संस्थान ने यूपीएससी की जगह यूएसपीएससी बैच शुरू करने की घोषणा कर दी है। पहले ही दिन पाँच लाख छात्रों ने रजिस्ट्रेशन करवा लिया। संस्थान के निदेशक ने कहा- हम बच्चों को भारतीय प्रशासनिक सेवा नहीं, अमेरिकी प्रशासनिक सेवा का सपना दिखाते हैं। सफलता की पहली शर्त यही है कि आप अपने देश से थोड़ा असंतुष्ट रहें।
कुछ सपने इतने विदेशी होते हैं कि पासपोर्ट से पहले आत्मा का वीज़ा लगवाना पड़ता है। इस बीच कई परिवारों ने अपने बच्चों के नाम बदलने शुरू कर दिए हैं। अनुराग एंटनी बन गया, मोहन माइकल और फेंकू ने स्वयं को फ्रेड्रिक घोषित कर दिया है। सरकार ने कहा है कि यह सांस्कृतिक मेल-मिलाप का हिस्सा है।
पराधीनता का सबसे आधुनिक छल सांस्कृतिक आदान-प्रदान कहलाता है। देश भर में लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि राष्ट्रगान "जन गण मन" के बाद क्या गाया जाए, वंदेमातरम या "गॉड ब्लेस अमेरिका"। वे वंदेमातरम को छोड़ने के लिए तैयार लग रहे हैं। सरकार ने इस विवाद को समाप्त करते हुए स्पष्ट किया है कि पहले वाला सम्मान के लिए, दूसरा भविष्य के लिए।
ये भी अफवाह है कि लालकिले पर अमेरिकी झंडा नहीं फहराया जाएगा क्योंकि इससे भारतीय भावनाएँ आहत हो सकती हैं। इसलिए दोनों झंडों को मिलाकर एक नया झंडा बनाया गया है। इसमें बीच में अशोक चक्र की जगह डॉलर का निशान होगा।
आइए अब सब मिलकर कहिए- गर्व से कहो हम अमेरिकी हैं, गॉड ब्लेस अमेरिका।