कल रात प्रभु राम मेरे सपने में फिर आए। इस बार काफी अरसे बाद आए। जब भी वे व्यथित या क्रोधित होते हैं, मेरे सपने में आ जाते हैं। पता नहीं वे मेरे ही सपने में क्यों आते हैं, जबकि वे जानते है कि मैं पक्का नास्तिक हूँ और उनका भक्त तो कतई नहीं हूँ। भक्त न होने के कई कारण हैं मगर बताऊँगा नहीं क्योंकि भक्त नाराज़ हो जाएंगे।
शायद इसलिए आ जाते होंगे क्योंकि मैंने उनसे कभी कुछ मांगा नहीं। या फिर उस जन्म में शंबूक रहा होऊंगा और शंबूक हत्या का अपराधबोध उन्हें मेरे सपनों में खींच लाता हो।
बहरहाल, वे आए और दुखी मन से मेरे सामने बैठ गए।
कुछ देर मैं उनके बोलने का इंतज़ार करता रहा, मगर जब वे चुप ही रहे तो मैंने पूछा- क्या हुआ प्रभो...क्या ग़ज़ा पट्टी से आ रहे हैं जो इतने दुखी हैं। लेकिन इस्राइल से आप और अपेक्षा भी क्या कर सकते हैं। वह तो 75 साल से यही ख़ूनी होली खेल रहा है।
उन्होंने मेरी ओर देखा और सिर झुका लिया। उनकी इस क्रिया का मतलब था कि वे न तो ग़ज़ा पट्टी गए थे और न ही उसकी वज़ह से नाराज़ थे। वैसे भी वे गज़ा पट्टी क्यों जाते। वो दूसरे भगवानों की टेरिटरी है। अब वे अपने इलाक़े का ध्यान रखें जो कि उनकी ज़िम्मेदारी है कि ग़ज़ा पट्टी और वेनेज़ुएला के चक्कर में पड़ें।
मैंने एक और कयास लगाया। अरे जाने दीजिए मोदी जी को। अगर वे राजधर्म भूल गए हैं या उसके पाठ उन्होंने पढ़े ही नहीं तो आप क्या कर सकते हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक वे यही करते आए हैं- हिंदू-मुसलमान। आप भी कुछ दख़ल देते नहीं इसलिए वे सुधरते नहीं। ऐसे में चीज़ें तो ऐसे ही चलेंगी न....
प्रभु राम के चेहरे पर खिन्नता के भाव और गहरे हो गए। माथे की सलवटें गाढ़ी हो गईँ। उन्होंने गहरी साँस भरी और सिर से मुकुट उतारकर बगल में रख दिया।
कुछ क्षण उनके चेहरे पर भाव आते-जाते रहे। फिर वे थकी हुई आवाज़ में बोले- ये क्या हो रहा है वत्स...राम के नाम को कितना बदनाम किया जाएगा....राम के नाम पर कितनी लूट मचाई जाएगी।
मेरी समझ में नहीं आया कि प्रभु राम क्या कह रहे हैं....राम के नाम पर लूट तो सैकड़ों सालों से चली आ रही है। पंडे-पुराहित तो जाने कब से लूट रहे हैं। इसमें नई बात क्या है।
मैं जब प्रश्नाकुल मुद्रा में उनकी ओर देख रहा था तो वे समझ गए। उन्होंने तुरंत कहा- मैं अयोध्या मंदिर में दान चोरी की बात कर रहा हूँ।
बात तुरंत मेरी समझ में आ गई, पर मैं चुप रहा।
वे आगे बोले- देखो वत्स, मुझे ये जानकर बहुत धक्का पहुँचा है कि मेरे नाम पर एक ग़लत आंदोलन चलाकर मेरे भक्तों को भ्रमित किया गया। फिर मेरे नाम पर छल-छद्म से मंदिर बनाया गया और मेरे नाम पर ही वहाँ ऐसे लोगों को बैठाया गया जो अब इस तरह के पाप कर्मों में लिप्त हैं।
मैंने कहा- देखिए भगवन्....आपको इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहिए। करने दीजिए घोटाला....रौरव नरक में सड़ेंगे सब। आप तो आराम से वहाँ बिराजो। श्रद्धालुओं की बातें सुनो, उनके लिए कुछ कर सकते हो तो करो, बाक़ी सब भूल जाओ।

प्रभु राम ने मेरी ओर क्रोधित नज़रों से देखा और बोले- क्या तुमने मुझे अपनी सरकार समझ रखा है कि वोट ले लो, सरकार बनाकर मौज़ करो, विदेश यात्राएं करो और जनता को भूल जाओ।

नहीं भगवन, मैं तो ये कह रहा था कि ज़्यादा टेंशन मत लो.....
वे बोले- टेंशन क्यों न लूँ.....मेरा तो काम ही यही है.....मैं जगत का पालनहार अगर अपने ही भक्तों से मुँह मोड़ लूंगा तो कैसे चलेगा.....इन लोगों ने मेरे भक्तों के साथ विश्वासघात किया है.....उनके चंदे की चोरी की है....उनके दान को लूटा है.....मेरे मंदिर के निर्माण के लिए जो स्वर्ण आभूषण और शिलाएं दी गई थीं, वे तक ग़ायब कर दी हैं।
लेकिन आपके भक्तों को छलने का काम तो ये लोग बरसों से कर रहे हैं। आख़िर राम मंदिर की लूटपाट से ही आप इतने उद्वेलित क्यों हैं....
तुम्हारी बात ठीक है वत्स मगर मैं थोड़ा लोभ में पड़ गया था। मुझे लगा था कि मेरी जन्मस्थली में मेरा एक आवास है, वहाँ तो शुचिता और पवित्रता होगी ही।
आप बेकार में एक ऐसे मंदिर का मोह पाल रहे हैं, जिसके अभियान में, निर्माण में ही अपवित्रता भरी हुई है। आप बताइए कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला न्याय करने वाला था? सब जानते हैं कि उसने तथ्यों को दरकिनार करके मंदिर-पक्ष के हक़ में फ़ैसला सुनाया था, जो कि दूसरे पक्ष के साथ अन्याय था।
तुम्हारा कहना सही है, मगर मैंने सोचा था कि चलो मामला सुलट रहा है, सुलट जाने दो।
ये तो कोई बात नहीं हुई। आपने जानते-बूझते अन्याय को स्वीकार कर लिया।
तुम सही कह रहे हो। तुमको याद है कि मैं उस समय तुम्हारे सपनों में आया था और कितना उद्विग्न था। मैं तो अयोध्या त्यागने के लिए ही तैयार था। मगर मैंने मन मसोसकर फ़ैसले को मान लिय़ा था। मुझे लगा था कि इस पूरे मामले का यहीँ पटाक्षेप हो जाएगा।
चलिए मान लिया। मगर उसके बाद मंदिर के नाम पर ज़मीन का घोटाला भी किया गया। दो करोड़ की ज़मीन 18 करोड़ में खरीदी गई।
अरे ये तो मानवीय स्वभाव है, माया सबको लुभाती है। थोड़ा हेरफ़ेर तो ये करेंगे ही, ये मानकर मैं चुप रह गया।

लेकिन आपने तो तब भी कुछ नहीं किया था जब चुनाव में फ़ायदा उठाने के मक़सद से आधे-अधूरे राम मंदिर का उद्घाटन किया गया था। पूरे कार्यक्रम में आपसे ज़्यादा प्रधानमंत्री दिखलाई दिए थे। हाँ, ये तो बहुत अखरने वाली बात थी। ऐसा लग रहा था कि मेरा नहीं, प्रधानमंत्री का मंदिर बना है और उसी की पूजा हो रही है।

चुनाव में यहाँ तक कहा गया था कि जो राम को लाए हैं उनको सत्ता में लाना है। बड़े-बड़े बैनरों में प्रधानमंत्री आपको उँगली पकड़कर लाते दिखाए गए थे।
हाँ, इसी निर्लज्ज अभियान से कुपित होकर मैंने इन्हें बहुमत से पीछे धकेल दिया था। इनकी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए ही मैंने यूपी में इनका सफ़ाया करवा दिया था। मेरे कान में फुसफुसाते हुए वे बोले-तुम्हें बता दूँ कि इन्होंने मुझसे चार सौ सीटें मांगी थीं, मगर मैंने दंडित करने के लिए 150 सीटें ही दी थीं। लेकिन बाक़ी की सीटें इन्होंने छल-कपट से जीत लीं।
और अब जीतने के बाद मंदिर को लूटा जा रहा है। करोड़ों रुपए का घपला किया जा रहा है।
हाँ, यही मेरे वर्तमान दुख का कारण है।

मैंने सहानुभूति के साथ कहा-दुखी मत होइए, बल्कि ऐसे मंदिर के मोह से मुक्त होइए प्रभो। आप ये देखिए कि पूरे देश में आपकी जय जयकार हो रही है। आपके भक्त उन विधर्मियों से भी जय श्रीराम बुलवा रहे हैं जो बोलना नहीं चाहते। जो नहीं बोलते, वे उनकी खाल खींच लेते हैं, उनकी जान तक ले लेते हैं।

तुम मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहे हो....
नहीं भगवन्, मेरी इतनी औकात कहाँ है....मैं तो बस आपसे कह रहा था कि राम मंदिर ही आपकी अयोध्या नहीं है। पूरे भारत पर ग़ौर कीजिए, कैसी-कैसी लूट मची हुई है। धन्ना सेठ दिन रात लूट रहे हैं, अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं और ग़रीब जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। लेकिन आप उनका आर्तनाद सुन ही नहीं रहे हैं इसलिए उनका विश्वास भी आप पर कमज़ोर होता जा रहा है।
तुम ठीक कहते हो वत्स। पृथ्वीलोक ही जब मेरा निवास है तो एक मंदिर का मोह क्या करना। लेकिन लाखों-लाख भक्त वहाँ आ रहे हैं उनको कैसे निराश करूँ।
ये कोई बड़ी समस्या नहीं है। इसका भी समाधान निकाला जा सकता है।
कैसे...
आप एक काम कीजिए। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम लागू कीजिए। ये बीच के दलालों को हटाइए। भक्तों के घर जाकर दर्शन दीजिए और उनकी समस्याएं सुनकर हाथों-हाथ निवारण कीजिए। इससे भक्त इन पाखंडियों और सत्तालोलुपों से छले भी नहीं जाएंगे और उनका आप पर भरोसा भी बना रहेगा।
फिर तो सारे मंदिर खाली हो जाएंगे। ये पंडे-पुरोहित मेरे ख़िलाफ़ अभियान छेड़ देंगे। कहीं ऐसा न हो कि साज़िश करके कोई नया भगवान ही खड़ा कर दें और उसे मेरे से ज़्यादा ताक़तवर घोषित कर दें।
आपकी आशंका सौ फ़ीसदी सही है प्रभो। ये यही करते आए हैं और करेंगे। लेकिन आप तो सर्वशक्तिमान हैं। आपको इससे क्यों घबराना चाहिए....आप तो अपने तीरों से इनके शरीर छलनी कर सकते हो.....इनकी मति फेर सकते हो।
ठीक है। मैं अब ऐसा ही करूँगा। मैं अब अयोध्या के मंदिर में रहूँगा ही नहीं। अब मैं भक्तों के मन में वास करूँगा।
मैं प्रभो राम को प्रणाम करता इसके पहले ही वे अंतर्ध्यान हो गए। मैं उनसे ये निवेदन भी करना चाहता था कि बड़ा दिल दिखाइए और जो आपके भक्त नहीं हैं उनको भी डीबीटी स्कीम का लाभ दीजिए, मगर तब तक वे जा चुके थे। ख़ैर अगली बार आएंगे तो कहूँगा।
बहरहाल, नींद खुलने के बाद से सोच रहा हूँ कि अगर भगवान राम ने सचमुच ऐसा कर दिया तो हमारा ये महान भारत कितना सुखी और संपन्न हो जाएगा। लेकिन मन में खटका बना हुआ है कि क्या राम मंदिर का मोह छोड़ पाएंगे, क्या वे पंडे-पुरोहितों और नेताओं के चंगुल से निकल पाएंगे?