व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में हालात बेहद तनावपूर्ण थे। जे.डी. वांस, मार्को रूबिओ, विटकॉफ और जैरेड कुशनर के चेहरों से रंग उड़े हुए थे। ऐसा तनाव हर उस लोकतांत्रिक देश के सिचुएशन रूम में होता है जिसका प्रधान लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर तानाशाह की तरह काम करना चाहता है। ऐसा तनाव तब भी होता है जब चुनाव परिणाम आने पर उसे पता चलता है कि जनता अभी पूरी तरह मरी नहीं है।
कमरे के बाहर लाल बत्ती जल-बुझ रही थी और कमरे के अंदर वही आतंक पसरा था जो इमर्जेंसी वार्ड के बाहर खड़े मित्रों-रिश्तेदारों के चेहरों पर दिखाई देता है।
दरअसल, ट्रम्प आपे से बाहर थे। आधे घंटे से लगातार बोले जा रहे थे। बोले क्या जा रहे थे, डाँटे जा रहे थे।
लोकतंत्र में क्रोध नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार है। जनता केवल महँगाई, बेरोज़गारी और मंदिर न बनने पर नाराज़ हो सकती है, लेकिन नेता किसी भी बात पर क्रुद्ध हो सकते हैं। यहाँ तक कि कोई पुरस्कार न मिलने पर भी।
“आई एम फेड अप विद यू, वांस। यू आर यूज़लेस। एंड यू मार्को... विटकॉफ... कुशनर... दिस इज़ हाउ वी विल मेक अमेरिका ग्रेट अगेन?”
वांस ने साहस जुटाया- डियर प्रेसीडेंट, ये तो बताइए हुआ क्या है?
“हुआ क्या है? यू आर आस्किंग मी हुआ क्या है? इस प्लेनेट पर मेरे साथ इतनी बड़ी ज्यादती हो रही है और तुम पूछ रहे हो हुआ क्या है? क्या मैंने मूर्खों को मंत्री बना रखा है?”
अब किसी की हिम्मत नहीं थी कुछ पूछने की। जो पूछता, वही नालायक घोषित कर दिया जाता।
कुशनर ने पानी का गिलास बढ़ा दिया। उसे इवांका ने बताया था कि जब भी डैडी गुस्से में हों तो तर्क नहीं, पानी पेश करना चाहिए।
चमत्कार हुआ। ट्रम्प ने गिलास एक साँस में खाली किया और थोड़ा शांत हुए। वैसे ही जैसे किसी दोस्त को पोर्ट, एयरपोर्ट या पॉवर प्लांट का ठेका देने के बाद किसी देश का प्रधान होता होगा।
“सीआईए ने बताया है कि एक थर्ड वर्ल्ड कंट्री के प्रधानमंत्री को 34 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। और मैं सुपर पॉवर अमेरिका का राष्ट्रपति होकर भी दो-तीन पुरस्कारों पर अटका हूँ। व्हाई?”
वांस और रूबिओ ने एक-दूसरे की ओर देखा।
“सर, यह कैसे हो सकता है? दुनिया सुपरपावर को छोड़कर किसी थर्ड वर्ल्ड लीडर को इतना सम्मान कैसे दे सकती है?”
“आई डोंट नो। फाइंड आउट!”
तभी कुशनर बोला—डैड, व्हाई डोंट यू आस्क हिम डायरेक्टली? यदि न बताएं तो अडानी और एप्स्टीन फाइल्स का ज़िक्र भर कर दीजिएगा।
ट्रम्प की आँखें चमक उठीं। “गुड एडवाइस!”
उन्होंने प्रशंसा से कुशनर को देखा और तिरस्कार से बाकी सबको।
“कनेक्ट मी टू मोडी।”
रूबिओ ने हिचकते हुए कहा— “सर, पता नहीं वे अभी उपलब्ध हों या नहीं...”
विटकॉफ बीच में कूद पड़ा—“ही शुड बी अवेलेबल 24×7 फॉर द प्रेसीडेंट ऑफ अमेरिका।”
रूबिओ चुप हो गया।
कुछ ही देर में हॉटलाइन जुड़ गई।
दूसरी ओर से आवाज़ आई— हैलो माई डियर डोलांड! कैसे याद किया? आपने जो-जो कहा था, मैंने सब कर दिया है। पाकिस्तान से बातचीत के लिए लोग लगा दिए हैं। पीयूष गोयल ट्रेड डील को फाइनल टच दे रहा है...
“ओह थैंक यू, मोडी! यू आर अ ग्रेट लीडर। यू आर ब्यूटीफुल। यू आर एन एंजेल।”
उधर से हल्की खी-खी सुनाई दी।
ट्रम्प जारी रहे— तुमने मीडिया मैनेज कर लिया। इलेक्शन कमीशन मैनेज कर लिए। आपोजिशन को भी मैनेज कर रहे हो। यहां तक कि जुडिसिअरी भी मैनेज करने में कामयाब हो गए। तुम तो विश्वगुरु निकले।
उधर से फिर वही खी-खी।
“अब मुझे तुमसे एक सलाह चाहिए।”
“जी सर, आदेश कीजिए।”
“मुझे सिर्फ़ यह बताओ कि तुम्हें इतने पुरस्कार कैसे मिल जाते हैं?”
कुछ क्षण चुप्पी रही।
फिर उधर से धीमी आवाज़ आई— आप स्पीकर फोन पर तो नहीं हैं न?
“नो, नो। आई एम अलोन। बोलो।”
“देखिए, शुरू-शुरू में मैं भी नोबेल पुरस्कार चाहता था। कोशिश भी की। पाकिस्तान गया। यूक्रेन वार रुकवाने की कोशिश की। लेकिन जब समझ गया कि नोबेल तो मिलने से रहा, तब रणनीति बदल दी।”
“हाऊ?”
“मैंने टीम से कहा—क्वालिटी नहीं क्वांटिटी पर ध्यान दो। देश की जनता को बहलाना है और नेहरू से आगे निकलना है बस। एक नहीं, दस नहीं, जितने मिल सकें उतने पुरस्कार जुटाओ। अभी मेरा लक्ष्य 2029 तक सेंचुरी लगाने का है।”
“ग्रेट स्ट्रेटजी!”
ट्रम्प उत्साहित हो उठे। “मेरा भी सपना नोबेल था, मुझे भी ओबामा को पटखनी देनी थी। लेकिन दस वार रुकवाने और इतना धमकाने के बाद भी दिया नहीं।”
वार रुकवाने के नाम पर दूसरी तरफ कुछ क्षणों का मौन छा गया।
फिर ट्रम्प ने पूछा— लेकिन ये देश तुम्हें पुरस्कार देता कैसे है?
“सी माई डियर ट्रम्प, यह गिव एंड टेक का मामला है। छोटे देशों से कहा जाता है कि प्रधानमंत्री आएँगे, एक पुरस्कार रख लीजिए। बदले में कुछ सहयोग, कुछ निवेश, कुछ आश्वासन। कई बार तो पुरस्कार का नाम भी हमें ही सुझाना पड़ता है और ट्रॉफी का डिज़ाइन भी।”
“वंडरफुल!” लेकिन तुमको तो बड़ी कंट्री ने भी अवार्ड दिया है न.....
यस, यस...कई मिले हैं। उनसे अवार्ड लेने के लिए कुछ हथियार ख़रीदने पड़ते हैं या पॉलिसी में चेंजेस करने पड़ते हैं।
ध्यान रखिए मि. ट्रम्प -“राजनीति में अब उपलब्धियाँ नहीं गिनी जातीं, पुरस्कार गिने जाते हैं। लोग अब विकिपीडिया का अवार्ड सेक्शन ज़्यादा पढ़ते हैं।”
लेखक को लगता है यह नया युग है। यहाँ उपलब्धियों की गुणवत्ता नहीं, उनकी गिनती काम आती है। इतिहास में अब यह नहीं पूछा जाता कि आपने क्या किया, यह पूछा जाता है कि आपके नाम के आगे कितने विशेषण और पीछे कितने पुरस्कार लिखे हैं।
व्यंग्यकार होने के नाते मैं बता दूँ कि पुरस्कार दो तरह के होते हैं। एक वे जिन्हें पाने के लिए आदमी जीवन भर काम करता है। दूसरे वे जिन्हें पाने के लिए नेटवर्क बनाता है। आधुनिक युग में दूसरा रास्ता अधिक वैज्ञानिक माना जाता है।
थैंक यू मोदी कहकर ट्रम्प ने फोन काट दिया।
ट्रम्प ने कमरे में उपस्थित लोगों की ओर देखा।
“मोडी इज़ अ वंडरफुल मैन। इवन इंटरनेशनल अवार्ड्स ही कैन फिक्स!”
मार्को रूबिओ ने सावधानी से कहा— “लेकिन सर, आपके लिए यह इतना आसान नहीं होगा।”
“व्हाई?”
“क्योंकि वे बारह साल से दुनिया घूम रहे हैं। कभी इस देश, कभी उस देश। भारत में कम, पुरस्कार देने वाले देशों में ज़्यादा।”
ट्रम्प का चेहरा उतर गया-“और मेरे पास समय भी कम है...”
कुशनर तुरंत बोला— “मेरे पास एक आइडिया है।”
“बताओ।”
“सारे देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों को किडनेप करके व्हाइट हाउस ले आते हैं और एक ही सप्ताह में आप सारे सम्मान ले लीजिए।”
“नो! नो!” बाकी सब एक साथ चिल्लाए। “अमेरिका लोकतांत्रिक देश है। ऐसा नहीं कर सकता।”
विटकॉफ ने दूसरा सुझाव दिया— तो फिर हर महीने पाँच देशों के प्रमुखों को व्हाइट हाउस बुलाकर उनसे सम्मान दिलवाइए। दो-ढाई साल में सेंचुरी बन जाएगी।
सबने उसकी ओर प्रशंसा से देखा। विटकॉफ यहीं नहीं रुका- “और जिन देशों ने अभी तक मोदी को पुरस्कार नहीं दिया है, उन्हें बता दीजिए कि अगर उन्होंने पुरस्कार दिया तो टैरिफ 25 प्रतिशत बढ़ जाएगा। इससे उनकी सेंचुरी भी रुक जाएगी।”
कमरे में तालियाँ गूँज उठीं।
ट्रम्प ने मेज़ पर हाथ मारा— “आज से मिशन 100 शुरू किया जाए!”
अगले दिन सीआईए को नया काम सौंपा गया—दुनिया के उन देशों की सूची तैयार करना जिन्होंने अभी तक किसी को कोई पुरस्कार नहीं दिया था।
दरअसल, अमेरिका रिजीम चेंज के पुराने काम से ऊब चुका था। उसका नया लक्ष्य है—पुरस्कारों पर कब्ज़ा।
उधर भारत में एक चैनल ने ब्रेकिंग न्यूज़ चलाई—
“विश्वगुरु मॉडल से प्रेरित होकर अमेरिका भी सम्मान-आत्मनिर्भर बनने की राह पर।”
यह ख़बर सुनकर कई छोटे देशों के राष्ट्रपति घबरा गए। उन्हें डर लगा कि कहीं अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल विकास परियोजना नहीं, ट्रॉफी का डिज़ाइन लेकर न पहुँच जाए।
निषकर्ष: अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मित्रता स्थायी नहीं होती, हित स्थायी होते हैं। पुरस्कार तो केवल हितों के गले में डाली जाने वाली फूलमाला है।