प्रधानमंत्री हर रोज़ होने वाली जगहँसाई से तंग आ गए हैं। दिन-रात उन्हें यही ताने सुनने को मिल रहे हैं कि प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते, पत्रकारों के सवालों के जवाब देने से डरते हैं, सवाल के नाम पर ही भाग खड़े होते हैं। बिना स्क्रिप्ट के कुछ बोल नहीं सकते।
लोकतंत्र में कुछ सवाल बरसाती मेंढकों की तरह होते हैं। आप उन्हें जितना दबाइए, वे उतनी ही टर्र-टर्र करते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस का सवाल भी ऐसा ही निकला। पहले दो-चार पत्रकार पूछते थे। फिर विपक्ष पूछने लगा। फिर विदेशी अख़बारों ने लिखना शुरू कर दिया।
अब हालत यह है कि प्रधानमंत्री को लगता है कि अगर वे मंदिर में भगवान के सामने भी खड़े हों तो मूर्ति भी पूछ बैठेगी—"वत्स, प्रेस कॉन्फ्रेंस कब करोगे?"
जब तक यह चर्चा देश के भीतर थी, तब तक वे संभाल लेते थे। देश में तो बहुत कुछ संभाला जा सकता है। यहाँ इतिहास संभाला जा सकता है, आँकड़े संभाले जा सकते हैं, मीडिया संभाला जा सकता है, विपक्ष संभाला जा सकता है। लेकिन जब विदेश यात्राओं के दौरान भी यही सवाल सुनाई देने लगा तो उन्हें पहली बार चिंता हुई।
उन्हें लगा कि यदि यही हाल रहा तो कहीं ऐसा न हो कि विदेश यात्राओं का आनंद ही जाता रहे। आख़िर प्रधानमंत्री होने के सुखों में विदेश यात्रा भी एक लोकतांत्रिक मौलिक अधिकार की तरह शामिल हो चुकी थी।
सबसे ज़्यादा चिढ़ उन्हें विपक्ष के नेता से थी। वह आदमी जैसे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए ही पैदा हुआ था। जब देखो तब पत्रकारों से घिरा रहता। कभी भारत में, कभी अमेरिका में, कभी संसद के बाहर। कभी चार्ट लेकर आ जाता, कभी पीपीटी लेकर। ऐसे बोलता जैसे सवालों से उसका कोई पुराना प्रेम-संबंध हो।
प्रधानमंत्री को लगता था कि यह सब जानबूझकर किया जा रहा है। वे अपने अनुभव से जानते हैं कि कुछ लोग अपनी सफलता से कम, दूसरों की कमियों को उजागर करके ज़्यादा लोकप्रिय होते हैं।
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बारह साल में उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, लेकिन ये निगोड़ा बारह साल में बारह सौ बार कर चुका है। यह उन्हें वैसा ही लगता था जैसे कोई आदमी रोज़ कुश्ती लड़कर उस पड़ोसी को चिढ़ाए जो अखाड़े में उतरने से घबराता हो।
लेकिन असली झटका पीएम को तब लगा जब उन्होंने एक दिन अपने सुरक्षा कर्मियों को आपस में बातचीत करते सुन लिया।
एक सुरक्षाकर्मी बोल रहा था, "भौत बहद्दुर बणा फिरे है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की हिम्मत ना है, देश क्या ख़ाक बचावेगा।"
सत्ता बहुत कुछ सह लेती है, लेकिन उपहास नहीं सह पाती। तानाशाह को गोली से उतना डर नहीं लगता जितना हँसी से लगता है।
उस दिन के बाद प्रधानमंत्री की मानसिक शांति समाप्त हो गई। उन्हें लगने लगा कि पूरा देश उनकी पीठ पीछे यही बात कर रहा है। वे किसी उद्योगपति से मिलते तो लगता वह मन ही मन प्रेस कॉन्फ्रेंस गिन रहा है। किसी विदेशी नेता से हाथ मिलाते तो लगता उसकी मुस्कान में भी वही प्रश्न छिपा है। यहाँ तक कि पार्टी के नेताओं की चुप्पी भी उन्हें संदिग्ध लगने लगी।
चापलूस मंडली ने उन्हें समझाने की भरपूर कोशिश की। "सर, आप व्यर्थ चिंता करते हैं। "मीडिया आपकी जेब में है। जो दो-चार लोग सवाल पूछते हैं, वे वैसे भी राष्ट्रविरोधी हैं। न मानेँगे तो ईडी है, सीबीआई है, इनकम टैक्स है।"

चापलूस का काम शासक को सच्चाई बताना नहीं होता। वह सच्चाई और शासक के बीच पर्दा डालता है। कई बार पर्दा इतना मोटा हो जाता है कि शासक को अपना चेहरा भी दिखाई नहीं देता।

कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री को राहत मिलती। उन्हें लगता, चुनाव आयोग है। एजेंसियाँ हैं। अडानी-अंबानी हैं। आईटी सेल है। गोदी मीडिया है। भक्तों की विशाल सेना है। फिर डर कैसा? लेकिन मन के भीतर बैठा हुआ चोर किसी एजेंसी से नहीं डरता।
आदमी पूरी दुनिया को धोखा दे सकता है, अपने अंतःकरण को नहीं। अंतःकरण बड़ा जिद्दी जीव है। वह रात को बिस्तर पर लेटते ही विपक्ष का नेता बन जाता है।
वह बार-बार प्रधानमंत्री को उकसाने लगता- कर डालो प्रेस कॉन्फ्रेंस। दिखा दो कि तुम कितने ज्ञानी हो। मीडिया को घर में घुसकर मारते हो, एक बार सामने बैठकर भी मारकर दिखाओ। करो सर्जिकल स्ट्राइक।"
धीरे-धीरे यह विचार उनके भीतर वीर रस की तरह उमड़ने लगा। उन्हें लगने लगा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस भी एक युद्ध है और वे इसके अर्जुन हैं। फ़र्क बस इतना था कि इस युद्ध में सामने मिसाइलें नहीं, सवाल थे। और सवाल बड़ी खतरनाक चीज़ होते हैं। वे सीमा पार से नहीं आते, सीधे दिमाग़ के भीतर घुसते हैं।
इसी उधेड़बुन में दिन गुज़र रहे थे। रातें और भी कठिन थीं। नींद आती तो सपने आते। कभी विपक्षी नेता हँसता दिखाई देता। कभी पत्रकार माइक लेकर पीछे भागते दिखाई देते। कभी उन्हें लगता कि उनका चपरासी उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा है। कभी रसोइया। कभी सुरक्षाकर्मी। यहाँ तक कि घर में पल रहे मोर भी उन्हें व्यंग्य करते प्रतीत होते। गायों की रंभाहट में भी उन्हें सुनाई देता—"प्रेस कॉन्फ्रेंस... प्रेस कॉन्फ्रेंस..."
सत्ता का सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है जब आदमी को हर आवाज़ में आलोचना सुनाई देने लगे।
आख़िरकार उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सलाहकारों को बुलाया। जेम्स बॉन्ड 007 स्तर के लोग बुलाए गए। गोपनीय बैठकें हुईं। फ़ाइलें बनीं। रिपोर्टें तैयार हुईं। जोखिम का आकलन हुआ।
किसी ने सुझाव दिया कि रिकॉर्डेड इंटरव्यू दे दीजिए। किसी ने कहा, पहले सवाल मंज़ूर करवा लीजिए।
किसी ने कहा, पत्रकारों की सूची जाँच लीजिए। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस कर लीजिए। सभी डरे हुए थे। डर पत्रकारों से नहीं था। डर इस बात से था कि पत्रकार क्या पूछ लेंगे और उससे भी बड़ा डर यह था कि प्रधानमंत्री क्या बोल देंगे। व्हाइट हाउस वाली घटना के बाद यह भय और बढ़ गया था।
उधर सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ पहले से आई हुई थी। प्रधानमंत्री ने एक मीम देखा। फिर दूसरा। फिर तीसरा। फिर उन्हें लगा कि पूरा देश मीम बन गया है।
सत्ता जब व्यंग्य का विषय बन जाती है तो उसके सलाहकार सबसे पहले हास्य कलाकारों से डरने लगते हैं।
एक रात वे इन्हीं विचारों में डूबे हुए थे कि उन्हें झपकी आ गई। और फिर शुरू हुआ वह सपना जो किसी हॉरर फ़िल्म से कम नहीं था। उन्होंने देखा कि वे अधिकारियों को आदेश दे रहे हैं- "हम खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे।"
अधिकारियों के चेहरे ऐसे हो गए जैसे किसी ने उनसे कहा हो कि अब चुनाव निष्पक्ष कराइए।
लेकिन आदेश जा चुका था। देश-दुनिया के मीडिया संस्थानों को निमंत्रण भेज दिया गया। समाचार चैनलों ने इसे ऐतिहासिक बताया। अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने विशेष लेख लिखे। यूट्यूबरों ने लाइव काउंट डाउन शुरू कर दिया। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र की वापसी बता रहे थे।
लेकिन गोदी मीडिया और अंधभक्तों का बुरा हाल था। उन्हें लग रहा था कि प्रधानमंत्री को ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहिए। वे प्रधानमंत्री की क्षमताओं से कम, उनके पुराने प्रदर्शन से अधिक परिचित थे। उन्हें मालूम था कि यदि दाँव उल्टा पड़ गया तो डैमेज कंट्रोल भी उन्हें ही करना होगा। और झूठ का सबसे कठिन काम नया झूठ गढ़ना नहीं, पुराने झूठ को बचाना होता है।

आख़िर वह ऐतिहासिक दिन आ गया। विज्ञान भवन खचाखच भरा हुआ था। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया मौजूद था। यूट्यूबर मौजूद थे। वे पत्रकार भी मौजूद थे जिनकी रग़ों में मोदी-विरोध को लोग रक्त समूह समझते थे। प्रधानमंत्री ने प्रवेश किया। चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की। मुस्कान आई भी, लेकिन तुरंत इस्तीफ़ा देकर चली गई।

उन्होंने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। उन्हें लगा जैसे हाथों का वज़न अचानक एक-एक मन बढ़ गया है।
वे मंच की ओर बढ़े। डर इतना बढ़ गया कि वे मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। लेकिन भय बड़ा नास्तिक होता है। उसे किसी चालीसा पर भरोसा नहीं होता। जितना वे साहस बटोरते, उतना ही दिल काँपता। उन्हें महसूस हुआ कि शानदार कपड़ों के भीतर पसीने की धाराएँ गंगा-जमुना की तरह बह रही हैं।
किसी तरह वे कुर्सी तक पहुँचे। अधिकारियों ने उनके सामने फ़ाइलों का ढेर लगा दिया। इन फ़ाइलों में सभी संभावित सवालों के जवाब तैयार थे।
भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी प्रतिभा यही है कि वह हर प्रश्न का उत्तर पहले से तैयार रखता है—सिवाय उस प्रश्न के जो पूछा जाने वाला हो।
तभी उनके कानों में सवाल गूँजने लगे—
क्या जंतर-मंतर पर पुलिस बर्बरता के लिए गृहमंत्री इस्तीफ़ा देंगे?
क्या इस देश में कभी निष्पक्ष चुनाव होंगे?
अयोध्या में चढ़ावा चोरी को लेकर लोग आप पर भी उंगलियाँ उठा रहे हैं?
इतने बेरोज़गार सड़कों पर हैं, उन्हें रोज़गार देने की योजना कहाँ है?
शिक्षा की हालत खस्ता है, उसका क्या होगा?
अडानी से आपके संबंध क्या हैं? क्या अमेरिका में आपने उन्हें बचाया?
अल्पसंख्यकों पर किए जा रहे अत्याचारों पर आप क्या कहेंगे?
ट्रम्प की टिप्पणियों पर आपकी चुप्पी क्यों है?
अर्थव्यवस्था का क्या हाल है?
भारत प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नीचे क्यों जा रहा है?
अस्सी करोड़ लोग मुफ़्त राशन पर क्यों निर्भर हैं?
किसान नाराज़ क्यों हैं? मज़दूर नाराज़ क्यों हैं? छात्र क्यों नाराज़ हैं?
क्या आप इस्तीफ़ा देंगे?
सवाल बढ़ते गए। फिर और बढ़ते गए। फिर वे सवाल नहीं रहे, शोर बन गए। उन्हें लगा कि पूरा हॉल चिल्ला रहा है—
"जवाब दो! जवाब दो! जवाब दो!"
लोकतंत्र में जनता आख़िरकार सिर्फ़ एक चीज़ माँगती है—जवाबदेही। इसलिए हर निरंकुश शासक को प्रश्नचिह्न से एलर्जी होती है।
अचानक अफ़रा-तफ़री मच गई।
किसी ने चिल्लाकर कहा— "प्रधानमंत्री की तबीयत ख़राब है!"
स्ट्रेचर मँगाया गया। उन्हें लिटाकर एम्बुलेंस में डाला गया।
डॉक्टर भागते हुए आए। किसी ने कहा— तुरंत एम्स ले चलो!
सायरन बज रहा था। लेकिन उनके कानों में अभी भी वही आवाज़ गूँज रही थी—
"जवाब दो...जवाब दो...जवाब दो..."
उन्हें दिखाई दिया कि सवाल पूछने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
पहले हज़ार। फिर लाख। फिर करोड़। फिर पूरा देश।
एक सौ चालीस करोड़ लोगों की आँखें और हर निगाह में सिर्फ़ एक प्रश्न।
वे घूर रही थीं। इंतज़ार कर रही थीं। जवाब माँग रही थीं।