उलटबांसी कॉलम में वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार का यह व्यंग्य व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, गोदी मीडिया, नीट लीक और लगातार बदलते राजनीतिक बयानों पर भक्तों के असमंजस को चुटीले अंदाज में पेश कर रहा है।
देखिए परधानमंत्री जी, इ तो भक्तों के साथ बहुतै अन्याय है। आपके भोले-भाले भक्तगण चौबीस घंटे आपकी सेवा में रत रहते हैं और आप हैं कि उनको चकरघिन्नी बनाए रखते हैं।
सीधे-सपाट शब्दों में कहें तो आपकी सरकार अउर आपका मीडिया बार-बार लाइन बदल देता है, इससे भक्त सब कन्फुजिया जाता है।
का है न कि भक्त का माइंड एकदम सीधा-सादा होता है, बिल्कुल स्ट्रेट। उसमें जो बात एक बार घुस गई, बस घुस गई। फिर ऊ उसी हिसाब से काम करने लगता है। लेकिन आपका लोग आज कुछ समझाता है अउर कल उसका उल्टा करने लगता है। अब भक्त बेचारा समझे तो समझे का?
हमको तो लगता है कि आपको भक्तों के मानसिक स्वास्थ्य की भी चिंता करनी चाहिए। आखिर हर आदमी आपकी तरह एंटायर पोलिटिकल साइंस में एमए थोड़े न किए रहता है कि रोज़-रोज़ की उलटबांसियाँ समझ जाए।
अब देखिए कि हमको व्हाट्सऐप पर बताया जाता है कि फलाँ आंदोलनकारी विदेशी एजेंट हैं।
अब भला हम इ कैसे बर्दाश्त कर लें कि विदेशी ताक़तें हमारी सरकार गिराने की साज़िश करें अउर हम चुप्पे बैठे रहें?
बस फिर भक्त सब जुट जाते हैं। दिन-रात मैसेज ठेलने लगता है। जहाँ चार आदमी दिखते हैं, वहीं समझाने लगता है कि फलाँ आंदोलन के पीछे विदेशी ताक़तें हैं। उधर चैनल वाले भी वही बात बोलते रहते हैं। तब हमको पूरा भरोसा हो जाता है कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी अउर न्यूज़ चैनल यूनिवर्सिटी का सिलेबस एक्कै है।
हमको लगने लगता है कि अब सरकार इन विदेशी एजेंटों की ऐसी-तैसी करेगी। लेकिन तभी आप अचानक पल्टी मार जाते हो, उनसे बातचीत करने लगते हो। बातचीत भी ऐसी-वैसी नहीं, बाकायदा उनकी माँगें सुनने लगते हो। फिर उनकी कई शर्तें भी मान लेते हो।
अउर तो अउर आधरतिया आए के उनको फ्रैंड्स कहने लगते हो। उन चीनी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी को कैमरा में मुँह गड़ाकर फैंड्स आप ही न कह रहे थे जी। जब आप खुदै फ्रैंड्स कहने लगोगे तो हम कन्फुजियाएंगे नहीं? बताइए, चुप काहे को हैं?
अब हमरी समझ में यही बात नहीं आती। अगर ऊ देशद्रोही थे तो उनसे बात काहे करते हो? अउर अगर उनसे बात करते हो, उनकी बात मानते हो, तो फिर ऊ देशद्रोही कैसे हुए? देशद्रोही से बातचीत होती है कि जेल भेजा जाता है?
बस यहीं से हमारा माथा घूम गया।
मोहल्ले वाले हमसे पूछने लगते हैं—“का बे, कल तक तो तू उनको विदेशी एजेंट बता रहा था, अब सरकार इनके साथ बैठकर चाय-पानी काहे कर रही है, मोदी जी फ्रैंड्स काहे कह रहे हैं?”
अब आप ही बताइए कि हम का जवाब दें? राजनीति आपकी है, फ़ज़ीहत हमारी हो रही है।
अब ई नीट वाला मामला ही देख लीजिए। पहिले हमको समझाया गया कि परीक्षा में धांधली, पेपर लीक अउर शिक्षा व्यवस्था की गड़बड़ी का मुद्दा तो बस बहाना है। असल मकसद सरकार को बदनाम करना है। आंदोलनकारी छात्र नहीं, प्रशिक्षित षड़यंत्रकारी हैं। उनके पीछे विदेशी ताक़तें हैं।
हमने भी पूरा मन लगाकर यही बात फैलायी। जिस लड़के ने पूछा कि पेपर लीक कैसे हुआ, हम उससे पूछने लगे कि पहिले ई बताओ कि तुम्हारा संबंध डीप स्टेट से कब से है।
जो लड़की परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायत कर रही थी, हमको उसमें जॉर्ज सोरोस की छाया दिखने लगी।
हमको लगा कि अब सरकार इन आंदोलनकारियों को ऐसा सबक सिखाएगी कि अगली बार कोई छात्र उत्तर पुस्तिका से पहले आंदोलन का पोस्टर न खोले। लेकिन कुछ दिन बाद अचानक पता चला कि शिक्षा मंत्री जी ही विदा हो गए।
अब इ बताइए परधानमंत्री जी, अगर आंदोलन विदेशी साज़िश था तो मंत्री जी काहे गए?
विदेशी एजेंट सफल हो गए का? या फिर आंदोलनकारी सही थे?
अगर ऊ सही थे तो हम गलत हुए। और अगर हम सही थे तो मंत्री जी गलत हुए।
सरकार तो ख़ैर कभी गलत होइए नहीं सकती।
बस यही गणित हमसे हल नहीं हो पा रहा है। हम तो इंटर में गणित छोड़ दिए थे। लगता है अब राजनीतिक गणित भी छोड़ना पड़ेगा।
सच बताएं परधानमंत्री जी, आपके सरकार के रंग-ढंग हमरे समझै में नहीं आते। आप इतना उलट-पुलट करते हैं कि माथा भन्ना जाता है। हम तो एंटायर पोलिटिकल साइंस में एमए नहीं किए हैं आपके जैसे। किए होते तो शायद समझ जाते कि आज जिसे राष्ट्रद्रोह बताना है, कल उसे राष्ट्रहित कैसे बता दिया जाता है।
हाँ, एक बात माननी पड़ेगी। बारह साल में आपने बड़ा चमत्कार किया है। पहले लोग बीमारी, बेरोज़गारी, महँगाई, भ्रष्टाचार जैसी छोटी-मोटी चीज़ों की बात करते थे। अब पूरा देश विदेशी साज़िशों पर शोध कर रहा है।
आज हालत इ है कि किसी के घर का बल्ब फुँक जाए तो शक होता है कि कहीं डीप स्टेट का हाथ तो नहीं। नल में पानी न आए तो लगता है सीआईए सक्रिय हो गई। पड़ोसी का कुत्ता रात में भौंक दे तो मोसाद की भूमिका की जाँच जरूरी हो जाती है।
हम तो सोचते हैं परधानमंत्री जी कि अगर सब कुछ विदेशी ताक़तें ही कर रही हैं तो हम भारतीय आखिर कर क्या रहे हैं?
आंदोलन विदेशी करा रहे हैं, विपक्ष विदेशी चला रहा है, पत्रकारों से विदेशी लिखवा रहे हैं, विश्वविद्यालय विदेशी बिगाड़ रहे हैं, किसान विदेशी भड़का रहे हैं, छात्र विदेशी बहका रहे हैं।
हमको तो डर है कि कहीं अगली जनगणना में देश को पता न चल जाए कि देश में एक सौ चालीस करोड़ विदेशी ताक़तें रहती हैं और उनके बीच कुछ भारतीय भी बचे हुए हैं।
ऐसा लगने लगा है कि भारत अब भारतीयों से कम अउर विदेशी एजेंसियों से ज़्यादा चल रहा है।
जब भी कोई विपक्षी नेता सरकार की आलोचना करता है, तुरंत घोषणा हो जाती है कि विदेशी ताक़तें सक्रिय हैं। कांग्रेस बोले तो सोरोस पीछे है। कोई छात्र बोले तो चीन पीछे है। कोई किसान बोले तो पाकिस्तान-खालिस्तान पीछे है। कोई पत्रकार सवाल पूछ दे तो डीप स्टेट पीछे है।
अब हमको तो लगने लगा है कि विदेशी ताक़तों के पास इतना समय ही नहीं होगा जितना हमारे चैनलों के पास है।
गज़ब बात ई है कि साज़िश में हमेशा कांग्रेस का नाम आता है। बाकी पार्टियों का नहीं। शायद इसलिए कि यह मान लिया गया है कि विदेशी एजेंसियाँ भी निवेश वहीं करती हैं जहाँ कुछ संभावना दिखे।
हमरे लिए सबसे बड़ी मुश्किल टीवी वाले पैदा करते हैं। हम रात में जिसको देशद्रोही मानकर सोते हैं, सुबह उठते-उठते उसका दर्जा बदल चुका होता है।
कभी कोई किसान देशद्रोही निकलता है, फिर देशभक्त हो जाता है। कभी कोई नेता देशभक्त होता है, फिर देशद्रोही हो जाता है। कभी कोई खिलाड़ी देश का नाम ऊँचा करने वाला होता है, फिर किसी दूसरे चैनल पर वही विदेशी एजेंट बताया जाने लगता है।
अब हम भक्त लोग नौकरी-चाकरी छोड़कर चौबीसों घंटा टीवी कैसे देखते रहें कि किसका स्टेटस बदल गया है।
पहले जमाने में लोग राशिफल देखते थे। अब हम लोग प्राइम टाइम देखते हैं कि आज किसको राष्ट्रविरोधी घोषित किया गया है।
आपकी मानें तो राहुल गाँधी विदेशी षड़यंत्रकारियों से मिलने विदेश जाते हैं। अब इसमें गोदी मीडिया का अलग से जिक्र करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि ऊ तो बीजेपी आईटी सेल का आउटसोर्सिंग विभाग बन चुका है। दोनों की भाषा, दोनों के विशेषण, दोनों के निष्कर्ष- सब एक्कै होते हैं।
लेकिन परधानमंत्री जी, एक बात हमको और कन्फुजियाती है।
कुछ लोग आपके बारे में भी तरह-तरह की बात करते हैं। कोई कहता है कि आपको सीआईए ने पीएम बनवाया। कोई कहता है कि आप अमरीका में ट्रेनिंग लेने गए थे। कोई कहता है कि इस्राइल से आपका कुछ विशेष प्रकार का कनेक्शन है। कोई कहता है कि वाशिंगटन की अनुमति के बिना दिल्ली में पत्ता नहीं हिलता।
अब हम इन बातों पर विश्वास नहीं करते। आखिर हम भक्त हैं, विपक्षी नहीं। लेकिन प्रश्न तो उठता है कि जब ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स, एनआईए, पुलिस, प्रशासन, मीडिया, ट्रोल सेना—सब आपके पास मौजूद है, तब फिर विदेशी एजेंसियों की जरूरत काहे पड़ जाएगी?
विपक्षी पार्टियाँ तो कहती हैं कि आपने इन्हीं संस्थाओं के सहारे उनका जीना हराम कर रखा है। अगर यह बात सच है, तो फिर सीआईए अउर मोसाद से अतिरिक्त सेवा लेने की क्या जरूरत?
हमरा तो मानना है कि आत्मनिर्भर भारत में षड़यंत्र भी आत्मनिर्भर होना चाहिए।
लेकिन विपक्षी लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि सरकार वाशिंगटन से चलती है। ट्रम्प जो कहे, वही होता है। ऊ कहे रूस से तेल खरीदो तो तेल खरीदो। ऊ कहे रूस से तेल मत खरीदो तो मत खरीदो। ऊ कहे इधर देखो तो इधर देखो, ऊ कहे उधर देखो तो उधर देखो।
अब सच क्या है, झूठ क्या है, इ हम नहीं जानते।
लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि विदेशी ताक़तें बहुत परिश्रमी होती हैं। सुबह विपक्ष को निर्देश देती हैं, दोपहर में विश्वविद्यालयों को भड़काती हैं, शाम को पत्रकारों को स्क्रिप्ट भेजती हैं, रात में सरकारें गिराती हैं। बीच में समय बच जाए तो शेयर बाज़ार भी हिला देती हैं।
ऐसी कर्मठ विदेशी ताक़तों को भारत सरकार को पद्म पुरस्कार दे देना चाहिए।
अब एक और समस्या है। नेता लोग बयान बदल लेते हैं। मंत्री लोग पुरानी बात भूल जाते हैं। एंकर लोग पुराने वीडियो डिलीट कर देते हैं। लेकिन भक्त बेचारा क्या करे?
उसने तो मोहल्ले में, रिश्तेदारी में, व्हाट्सऐप ग्रुप में, बस अड्डे पर, शादी-ब्याह में, यहाँ तक कि तेरहवीं में भी लोगों से लड़ाई कर रखी होती है। सरकार समझौता कर लेती है, मगर भक्त कहाँ जाकर मुँह छिपाए।
इसलिए हम सरकार से हाथ जोड़कर निवेदन करते हैं कि भक्तों के हित में एक नई व्यवस्था लागू की जाए। जैसे मौसम विभाग आँधी-पानी का अलर्ट जारी करता है, वैसे ही सरकार को "राष्ट्रद्रोह अलर्ट" जारी करना चाहिए।
सुबह आठ बजे सूचना आ जाया करे- “जिन व्यक्तियों को कल तक देशद्रोही बताया गया था, उन्हें आज से देशभक्त माना जाए। कृपया पुराने पोस्ट डिलीट कर दें।”
या फिर- “फलाँ नेता पर लगाए गए सभी आरोप अगले आदेश तक स्थगित किए जाते हैं क्योंकि उनसे गठबंधन की संभावना बन रही है।”
या- “जिन विदेशी ताक़तों को कल तक भारत का दुश्मन बताया गया था, आज उनसे व्यापारिक बातचीत चल रही है। भक्तगण कृपया अपनी गालियाँ वापस ले लें।”
इससे हम लोगों को बड़ी सुविधा हो जाएगी। वरना हालत इ हो गई है कि हर तीन महीने में अपना पूरा वैचारिक सॉफ्टवेयर अपडेट करना पड़ता है।
इस समय आपके राज में सबसे असुरक्षित प्राणी अगर कोई है तो लुप्तप्राय बाघ नहीं, बेरोज़गार नौजवान नहीं, किसान नहीं, बल्कि समर्पित भक्त है।
बेचारा पूरी निष्ठा से सरकार की हर बात मानता है, हर लड़ाई लड़ता है, हर नैरेटिव फैलाता है, हर रिश्तेदारी खराब करता है, और फिर एक दिन पता चलता है कि सरकार खुद अपनी पुरानी बात से समझौता कर चुकी है।
सच मानिए परधानमंत्री जी, हम बहुतै कन्फुजिया गए हैं।
पहले हमको बताया गया था कि विदेशी ताक़तें देश चलाना चाहती हैं। फिर धीरे-धीरे ऐसा माहौल बना कि लगने लगा, कहीं चलाने तो नहीं लगीं? यही सोचकर हम घबरा जाते हैं।
लेकिन फिर हम अपने मन को समझा लेते हैं। कहते हैं- नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। हमरे परधानमंत्री जी पक्के देशभक्त हैं। अगर उन्होंने विदेशी ताक़तों को सरकार चलाने का ठेका दिया भी होगा, तो देशहित में ही दिया होगा। देशहित से बड़ा आखिर कुछ होता है का?
बस एक निवेदन है आपसे, अगली बार ठेका देने से पहिले भक्तों को सूचना दे दीजिएगा, ताकि हम भक्त अपना राष्ट्रवाद अपडेट कर सकें।"