शहर के सबसे पुराने पार्क के एक अँधेरे, सीलन भरे कोने में उस रात असामान्य हलचल थी। टूटी बेंचों के नीचे, नाली के किनारे, झाड़ियों की ओट में—हज़ारों कॉकरोच जमा थे। हवा में बेचैनी थी। एंटीना आपस में टकरा रहे थे। खुसुर-पुसुर चल रही थी।
“आख़िर अचानक इमर्जेंसी आम सभा क्यों बुलाई गई है?”
“कोई बड़ा संकट है क्या?”
“कल तक तो प्रधान सेवक विदेश यात्रा पर थे…”
“हाँ, और वहाँ भी उन्होंने कहा था कि दुनिया में सबसे अनुशासित और प्राचीन सभ्यता कॉकरोचों की ही है…”
एक पड़ोसी मोहल्ले से आया कॉकरोच बोला—
“मैंने ख़ुद सुना है। साहेब बहुत चिंतित थे। कह रहे थे—‘बुरा वक़्त आने वाला है। आलस छोड़ो। अँधेरे में रहने की तैयारी करो।’”
इतने में अचानक शोर उठा—
“कॉकरोच! कॉकरोच!!”
“महान कॉकरोच सभ्यता अमर रहे!”
सब कॉकरोच एकदम से पिछली दो टाँगों पर खड़े हो गए। एंटीना झुक गए। जितनी फूल सकती थी, छाती फुला ली गई। कुछ भावुक कॉकरोचों की आँखों से कीटनाशक-प्रतिरोधी आँसू भी टपक पड़े।
प्रधानसेवक के साथ आए चमचे कॉकरोच ने अपने पंख फड़फड़ाकर शांति बनाए रखने की अपील की—
“शांत रहिए… अनुशासन रखिए… साहेब अभी राष्ट्र को संबोधित करेंगे…”
फिर उसने आवाज़ भारी करते हुए कहा—
“विश्व के सबसे लोकप्रिय कॉकरोच… करोड़ों अंडों की आशा… अँधेरे के अवतार… आदरणीय प्रधानसेवक जी!”
तालियों की जगह हज़ारों एंटीना हवा में लहराने लगे।
प्रधानसेवक उठे। पहले उन्होंने दूर तक ऐसे देखा जैसे क्षितिज तक कॉकरोचों का समुद्र उमड़ आया हो, जबकि सामने मुश्किल से पाँच-सात सौ कॉकरोच थे। मगर यह उनकी पुरानी शैली थी—पहले कल्पना में भीड़ देखो, फिर उसे इतिहास घोषित कर दो।
उन्होंने एंटीना हिलाकर अभिवादन किया और गंभीर स्वर में बोले— “भाइयों और बहनों… तथा नालियों में रहने वाले मेरे प्यारे बच्चों…”
सभा भावुक हो उठी।
“मैं आज आपके सामने एक बहुत बड़े संकट की सूचना लेकर आया हूँ। पहले मुझे लगा था कि यह छोटा-मोटा संकट होगा। लेकिन बाद में पता चला कि यह भारी से भी भारी वाला संकट है…”
सभा में सन्नाटा।
उन्होंने धीरे से पूछा—
“आप में से कितनों ने सुना है कि मनुष्य जाति इन दिनों ज़ोर-ज़ोर से ‘कॉकरोच… कॉकरोच…’ कर रही है?”
भीड़ से आवाज़ आई—
“हमने! हमने!!”
“बहुत बढ़िया!” साहेब बोले। “इसका मतलब है कि हमारा समाज जागरूक है। हम सब जानते हैं कि मनुष्य हमारी चर्चा तभी करता है जब वह हमें मारना चाहता है। जब उसे लगता है कि उससे सवाल पूछे जा रहे हैं, तब वह नए-नए कीटनाशकों की बात करने लगता है।”
इतने में पीछे से एक दुबला-पतला कॉकरोच चिल्लाया—
“मैंने कुछ और भी सुना है!”
साहेब का चेहरा थोड़ा सख़्त हो गया। उन्हें भाषण के दौरान व्यवधान पसंद नहीं था। उन्होंने चमचों की ओर देखकर पूछा—
“इन सज्जन को क्या तकलीफ़ है भाई?”
चमचे आगे बढ़े ही थे कि साहेब ने अचानक हाथ से रोक दिया। शायद उन्हें लगा—लोकतंत्र का अभिनय ज़रूरी है।
“हाँ-हाँ, बोलिए,” उन्होंने उदार मुस्कान के साथ कहा, “हम सुनने में विश्वास करते हैं।”
कॉकरोच बोला—
“मैंने अपने घर मालिक को मोबाइल पर वीडियो देखते सुना। कोई काले कोट वाले आदमी ने कुछ बोला है, जिससे पूरी मानव जाति भड़क गई है। उसे लग रहा है कि उसने उन्हें ‘कॉकरोच’ कहकर अपमानित कर दिया है। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आया कि कॉकरोच कहना अपमानजनक कैसे हो सकता है?”
सभा में सहमति की आवाज़ें उठीं।
एक दूसरा कॉकरोच तुरंत बोला—
“हाँ! और वो काले कोट वाला कह रहा था कि कॉकरोच सिस्टम पर हमला करते हैं। लेकिन हम तो जो बचा-खुचा मिलता है, वही खाकर अँधेरे में पड़े रहते हैं। हमने तो कभी किसी सिस्टम पर हमला नहीं किया। हाँ, सिस्टम ने हम पर बहुत बार चप्पल से हमला ज़रूर किया है।”
हल्की हँसी फैल गई।
प्रधान कॉकरोच पहले तो झुंझलाए, मगर जब देखा कि बाक़ी कॉकरोच ध्यान से सुन रहे हैं, तो उन्होंने रणनीति बदल ली।
“बोलिए… बोलिए… और क्या सुना है आपने?” उन्होंने लोकतांत्रिक चेहरा ओढ़ते हुए कहा।
तीसरा कॉकरोच बोला—
“मैंने सुना है कि ‘कॉकरोच सेवक संघ’ नाम का कोई संगठन बन गया है। वो देश भर के कॉकरोचों को एकजुट करने की बात कर रहा है। उसका कोई गीत भी वायरल है—‘अँधेरे से निकलेंगे, नाली पे चलेंगे…’”
भीड़ में कुछ युवा कॉकरोच झूमने लगे।
तभी चौथा कॉकरोच बोला—
“मैंने अपने मालिक के लड़के की नोटबुक पर कॉकरोचों की तस्वीरें देखीं। वो अपने बाप से पूछ रहा था—‘क्या हम भी कॉकरोच हैं?’”
सभा में उत्सुकता फैल गई।
“फिर क्या बोला उसका बाप?” कई आवाज़ें एक साथ उठीं।
कॉकरोच ने गहरी साँस ली—
“उसने कहा—‘हाँ बेटा, हम सब कॉकरोच हैं। हमें अँधेरे में रहने की आदत हो गई है। हम अपने हक़ के लिए लड़ते नहीं। जो बचा-खुचा दे दिया जाता है, उसे खाकर ज़िंदगी काट लेते हैं। हमें रोशनी से डर लगता है।’”
सभा में अचानक सन्नाटा छा गया।
एक बूढ़ा कॉकरोच बुदबुदाया—
“तो क्या मनुष्य भी कॉकरोचों की कोई प्रजाति है?”
इस दार्शनिक प्रश्न से सभा कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गई।
तभी बड़े घर से आया एक चमकदार कॉकरोच बोला— “नहीं-नहीं! मेरे घर में तो सब काले कोट वाले का समर्थन कर रहे थे। कह रहे थे—उसने ठीक कहा है। इन कॉकरोचों पर पेस्टीसाइड डालकर ख़त्म कर देना चाहिए। ये देश में अशांति फैलाते हैं। कभी रोज़गार माँगते हैं, कभी शिक्षा, कभी अधिकार!”
एक तिलकधारी मकान से आया कॉकरोच बोला— “हाँ! मेरा मालिक भी बहुत गुस्से में था। कह रहा था—ये कॉकरोच हिंदू राष्ट्र के रास्ते का सबसे बड़ा काँटा हैं। इन अंबेडकरवादी और अर्बन कॉकरोचों का सफाया कर देना चाहिए।”
वह थोड़ा रुका, फिर मासूमियत से बोला—
“लेकिन हमारे तो ग्रामीण रिश्तेदार भी हैं… उनके सफ़ाए की बात क्यों नहीं की गई?”
सभा में हल्की बेचैनी फैल गई।
एक भ्रष्ट अफ़सर के घर से आया मोटा कॉकरोच बोला— “मेरा साहेब भी परेशान था। फोन पर कह रहा था—‘जी सर… जी सर… कोई कानून बनाइए। ये कॉकरोच हर समय भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार करते रहते हैं।’ फिर उसने कहा—‘पेस्टीसाइड का ठेका मोडानी को दे देंगे।’”
सभा में फुसफुसाहट हुई— “मोडानी?”
“अरे वही… जो हर आपदा में अवसर ढूँढ लेता है…”
इतने में न्यूज़ चैनल के दफ़्तर से आया कॉकरोच बोला— “हमारे चैनल में तो सब पागल हुए पड़े हैं। दिन-रात चिल्ला रहे हैं—‘इन गंदे, अधनंगे, षड्यंत्रकारी कॉकरोचों को सेना भेजकर कुचल देना चाहिए। ये देशद्रोही हैं। इन्हें विदेशी फंडिंग मिलती है।’”
एक युवा कॉकरोच बोला— “क्या उन्होंने कोई सबूत दिखाया?”
“नहीं,” चैनल वाला कॉकरोच बोला, “लेकिन स्क्रीन पर लाल रंग में ‘एक्सक्लूसिव’ लिखा हुआ था।”
सभा प्रभावित हो गई।
तभी एक यूट्यूबर के घर से आया कॉकरोच बोला— “मेरा मालिक बहुत दुखी था। कह रहा था—‘मैंने काले कोट वाले के खिलाफ़ वीडियो बनाया, फिर मेरा चैनल ब्लॉक हो गया!’”
एक कॉकरोच बोला— “तो अब?”
“अब वो लोकतंत्र बचाने पर वीडियो बना रहा है।”
सभा में पहली बार ज़ोरदार ठहाका लगा।
इसी बीच एक दुबला-पतला, विचारशील कॉकरोच अचानक उत्तेजित होकर बोला— “काले कोट वाले ने जो कहा वो ग़लत था, लेकिन ये जो कॉकरोच-कॉकरोच कर रहे हैं, ये भी कम खतरनाक नहीं हैं!”
सारी सभा उसकी ओर मुड़ी।
“साफ़-साफ़ बोलो!” कई आवाज़ें आईं।
उसने गला साफ़ किया— “कुछ साल पहले भी ऐसा ही शोर मचा था। तब कॉकरोच नहीं, ‘करप्ट’ नाम के किसी और कीड़े की बात हो रही थी…”
भीड़ से आवाज़ आई— “हाँ! रामलीला मैदान वाले कॉकरोचों ने बताया था!”
“तो याद करो,” उसने कहा, “तब कितनी बड़ी-बड़ी बातें होती थीं—‘करप्ट मिटाओ’, ‘देश बचाओ’, ‘नई राजनीति लाओ’… लेकिन बाद में क्या हुआ?”
सभा चुप।
“कोई मुख्यमंत्री बन गया… कोई मंत्री… कोई राज्यपाल… कोई कथावाचक… और जो सबसे ज़्यादा ‘करप्ट-करप्ट’ चिल्ला रहे थे, वही सबसे बड़े दग़ाबाज़ निकले!”
सभा में बेचैनी बढ़ गई।
“और जो पीछे से उनका समर्थन कर रहे थे,” वह आगे बोला, “उन्होंने पूरे सिस्टम पर कब्ज़ा कर लिया। अब वही लोग दूसरों को कॉकरोच कह रहे हैं।”
सभा में गहरा सन्नाटा।
प्रधान कॉकरोच ने स्थिति भाँप ली। उन्होंने तुरंत माइक संभाला— “मितरों…”
यह सुनते ही कई कॉकरोच भावुक हो गए।
“मुझे गर्व है कि हमारे समाज में इतने प्रबुद्ध कॉकरोच हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि किया क्या जाए?”
उन्होंने नाटकीय विराम लिया।
“जहाँ तक मेरा विचार है… काले कोट वाले का चरित्र सामने आ चुका है… कॉकरोचों को कोसने वाले भी बेनकाब हो चुके हैं… मगर सबसे बड़ा ख़तरा वे लोग हैं जो ख़ुद को कॉकरोच बता रहे हैं!”
सभा में सहमति की चीं-चीं गूंजी।
“इसलिए,” साहेब गरजे, “मेरा प्रस्ताव है कि अव्वल तो कॉकरोचों के ख़िलाफ़ किए जा रहे षड़यंत्र की कड़े शब्दों में निंदा की जाए। इसके अलावा एक उच्चस्तरीय फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाई जाए। कुछ चुने हुए अनुभवी कॉकरोच रात में उनके घरों, दफ़्तरों और मोबाइल फोनों की जाँच करेंगे। वे किनसे मिलते हैं, क्या पढ़ते हैं, किस पोस्ट को लाइक करते हैं, कौन-सी नाली में आते-जाते हैं—सबकी रिपोर्ट तैयार की जाएगी!”
सभा रोमांचित हो उठी।
“अब जो लोग इस प्रस्ताव से सहमत हैं,” उन्होंने हाथ उठाकर कहा, “वे अपने एंटीना उठाकर चीं-चीं की ध्वनि निकालें!”
एक साथ हज़ारों एंटीना खड़े हो गए। “चीं! चीं!! चीं!!!”
व्यंग्य/उलटबाँसी से और खबरें
इतना शोर हुआ कि पास खड़ी पुलिस मोबाइल वैन का सायरन बज उठा।
“छापा!”
“कीटनाशक!”
“भागो!!”
अचानक अफ़रा-तफ़री मच गई। सारे कॉकरोच अपने एंटीना दबाकर अँधेरे की ओर भागने लगे।
कुछ ही सेकंड में पूरा मैदान खाली हो गया।
बस मंच पर प्रधानसेवक अकेले खड़े रह गए।
उन्होंने इधर-उधर देखा, फिर धीरे से अपने चमचे से पूछा—
“सब चले गए?”
“जी साहेब।”
“अच्छा… कैमरे बंद हो गए क्या?”
“जी।”
साहेब ने राहत की साँस ली, कोट झाड़ा और फुसफुसाए—
“चलो… अब असली मीटिंग करते हैं।”