कहा जाता है कि पुलिस वालों से न दोस्ती भली, न दुश्मनी। यह कोई हवा-हवाई या उड़ी-उड़ाई बात नहीं है, बल्कि तज़ुर्बे का मामला है। पुलिस से दोस्ती में आदमी की जेब ढीली होती है और दुश्मनी में चमड़ी। लेकिन कई बार बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और आदमी तज़ुर्बे को ताख पर रखकर शहर की ओर भागने लगता है। फिर जब लाठी पड़ती है तो उसे याद आता है कि बुज़ुर्गों ने आख़िर ऐसा कहा क्यों था।
अंधभक्तों का आज जो हाल हो रखा है, वह इसी तज़ुर्बे को भुलाने का नतीजा है। वे अमेरिका में ट्रम्प की हार पर न हँस पा रहे हैं, न रो पा रहे हैं। यही लोग थे जो ट्रम्प की जीत के लिए हवन-पूजन कर रहे थे, उनकी आरती उतार रहे थे, उन्हें भगवान की तरह पूज रहे थे। ट्रम्प जीते तो भक्तों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्हें लगा कि अब भारत में चल रहा अमृतकाल भी अमेरिका के आशीर्वाद से अमर हो जाएगा। जैसे अमेरिका में ट्रम्प का राज है, वैसे ही भारत में उनके पापा का। दोनों मिलकर दुनिया को एक ही रंग में रंग देंगे।
अंधभक्तों को बाक़ायदा घुट्टी पिलाई गई थी कि ट्रम्प और आपके पापा का डीएनए एक ही है। आचार-विचार, व्यवहार, अहंकार, आत्ममुग्धता, झूठ और हेट स्पीच—सब कुछ एक जैसा है। बस रंग का थोड़ा-सा फ़र्क़ है। अगर छोटे पापा अमेरिका में रहते तो उनका भी वही रंग होता। इसलिए ट्रम्प रिश्ते में आपके बड़े पापा लगते हैं। फिर वे अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति हैं, तो बड़े पापा से भी बड़े बाप हुए। और जब बड़े पापा इतने बड़े हों तो उनके आगे-पीछे घूमने में ही भक्तों की मौज़ है।
भक्तों ने रिश्तेदारी में कूटनीति खोज ली थी। उन्हें लगा था कि दुनिया रिश्तों से चलती है। लेकिन दुनिया का सबसे पुराना नियम है कि ताक़तवर के लिए रिश्ते भावनाएँ हैं और कमज़ोर के लिए मजबूरी।
वे भूल गए कि अमेरिका अंकल सैम है। सुपर कॉप है। सुपर कॉप बोले तो लाखों अजित डोभालों की मिक्सिंग से जो कॉकटेल बनता है, वह। वह दिल्ली के किसी एक ज़िले का एसीपी या डीसीपी नहीं है। वह पूरी दुनिया का दरोगा है। दरोगागीरी उसके ख़ून में है। वह दुनिया के हर देश को अपने थाने का इलाक़ा समझता है। कोई उसकी हद में घुसकर अपनी दुकान चलाए, यह उसे मंज़ूर नहीं।
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ट्रम्प उस दरोगा का साकार रूप हैं, सगुण रूप हैं। उनके लिए दुनिया एक ऐसा थाना है जहाँ हर देश मुल्ज़िम है और अमेरिका जज भी, जूरी भी और जल्लाद भी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अमेरिका की वर्दी पर लोकतंत्र का बैज लगा हुआ है।
लेकिन भक्त तो उन्हें बड़े पापा मानकर चल रहे थे। उन्हें क्या पता था कि बड़े पापा का प्यार और बड़े दरोगा की लाठी दो अलग-अलग चीज़ें हैं। बड़े पापा ने जब बड़े दरोगा का रोल अदा करना शुरू किया तो छोटे पापा की वॉट लग गई। ऐसी दुर्गति हुई कि उनका देवत्व एक झटके में झड़ गया। वे नॉन-बायोलॉजिकल से बायोलॉजिकल हो गए। जिनके बारे में भक्तों को लगता था कि वे ईश्वर के भेजे हुए हैं, वे अचानक एक साधारण राजनीतिक प्राणी नज़र आने लगे।
देवता वही होता है जिसकी सत्ता में भक्तों को अपना भविष्य दिखाई दे। सत्ता जाते ही देवता का चेहरा भी बदल जाता है।
लेकिन नंबर सबका आता है। वक़्त हर एक का पलटता है। ट्रम्प का भी पलटा और ऐसा पलटा कि उनसे सीधे खड़े होते नहीं बन रहा है। क़ायदे से ये अंधभक्तों के लिए डबल दीवाली मनाने का मौक़ा था। जिस ट्रम्प को वे अपने पापा की बजाने में लगा हुआ देख रहे थे, अमरीकियों ने उसकी ही बजा दी थी।
लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि वे न दिए जला पा रहे हैं, न पटाखे फोड़ पा रहे हैं। उनके भीतर जश्न और डर की ऐसी कुश्ती चल रही है कि जीत किसी की नहीं हो रही। उन्हें डर है कि चुनाव हारने के बाद कहीं ट्रम्प और कड़क न हो जाएँ। कहीं अपना गुस्सा पापा पर न उतारने लगें।
आख़िर उनका डीएनए पापा से मिलता है। उनमें भी घमंड कूट-कूटकर भरा हुआ है। वे भी बदला लेने की फ़िराक़ में रहते हैं। वे भी आत्ममुग्ध हैं और झूठ बोलने में अखंड विश्वास रखते हैं। हेट स्पीच का मुक़ाबला हो जाए तो कौन किसको परास्त करेगा, इसकी भविष्यवाणी भगवान भी नहीं कर सकते।
कहने का मतलब यह है कि भक्त ट्रम्प की हार का जश्न नहीं मना पा रहे और उनके लिए यह वैसा ही है जैसे किसी भक्त को पता चले कि उसके आराध्य देव का मंदिर किसी दूसरे देवता के कब्ज़े में चला गया है। आरती की थाली हाथ में है, मगर घंटी बजाने की हिम्मत नहीं।

एक बात और ग़ौर करने की है। पापा की ही तरह बड़े पापा के ख़ून में भी बैपार है। बल्कि मुझे तो लगता है कि ट्रम्प के ख़ून में ही नहीं, उनकी तमाम ग्रंथियों (ग्लैंड्स) में भी बैपार ही तैयार होता होगा, क्योंकि इसके अलावा वे कुछ सोचते ही नहीं। उनके लिए राजनीति सेवा का नहीं, सौदे का नाम है।

उनके लिए जैसे नेताओं के लिए सत्ता एक ऐसा एटीएम है जिसमें जनता वोट डालती है और वे अपने रिश्तेदारों के लिए नोट निकालते हैं।
अपनी पूरी सत्ता को उन्होंने अपने बेटे, दामाद और दोस्तों के धंधे पर लगा रखा है। पापा के दामाद नहीं हैं, मगर दोस्त तो बहुतेरे हैं। दोस्ती भी ऐसी कि देश का हित बीच में आ जाए तो उसे भी किनारे कर देते हैं।
लेकिन अंधभक्त मानकर बैठे थे कि उनके पापा ने ट्रम्प के साथ कमाल की केमेस्ट्री बना ली है। ऐसी केमेस्ट्री कि हर लोहा पिघल जाएगा, हर दीवार गिर जाएगी और हर सौदा भारत के हित में होगा। उन्हें लगता था कि झप्पी-पप्पी से अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सारी समस्याएँ हल हो जाती हैं। शायद वे यह भूल गए थे कि कैमरे के सामने की मुस्कान और बंद कमरे का सौदा दो अलग-अलग चीज़ें हैं।
ट्रम्प तो ट्रम्प ठहरे। वे हर चाय का पैसा वसूलना जानते हैं। उन्होंने पापा की चाय पी तो ली, मगर चाय का बिल भी उन्हीं को पकड़ा दिया। झप्पी-पप्पी को उन्होंने धंधे से अलग रखा और पापा की बाँह मरोड़कर बहुत सारे काम करवा लिए। पापा के लिए केमेस्ट्री थी, ट्रम्प के लिए अकाउंटेंसी। पापा रिश्ते निभा रहे थे, बड़े पापा हिसाब बराबर कर रहे थे।

कूटनीति में गले मिलना मुफ़्त होता है, लेकिन उसकी क़ीमत अक्सर देश को चुकानी पड़ती है।

अब पापा करें तो क्या करें। बाँह मरोड़े जाने का डर उन पर बहुत बुरी तरह हावी हो गया है। वे सरेंडर हो रहे हैं और भारतीयों को भी कह रहे हैं—सरेंडर करो। पापा ने सरेंडर कर दिया है, मगर ट्रम्प तो नाक रगड़वाने की चालें चल रहे हैं। एक तरफ़ पापा की झप्पी की तस्वीरें हैं, दूसरी तरफ़ उनकी नीतियों की धज्जियाँ। तस्वीरें जितनी बड़ी होती हैं, कई बार देश की हैसियत उतनी ही छोटी दिखाई देने लगती है।
हालाँकि अब भक्त समाज में दरार पड़ गई है। एक हिस्सा मानता है कि पापा बड़े पापा को छप्पन इंच का सीना दिखाएँ और पलटकर उनकी नाक पर एक घूँसा जड़ दें। आखिर भारत विश्वगुरु है, उसके पापा किसी के सामने झुक नहीं सकते। दूसरा हिस्सा मानता है कि सरेंडर कर दो, क्योंकि अमेरिका से टकराने के चक्कर में कहीं और बुरी गति न हो जाए। दोनों हिस्सों में एक बात समान है—वे देश के हित की चिंता कर रहे हैं, मगर अपने-अपने पापा के चश्मे से।
भक्तों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपने नेता को कभी ग़लत मान ही नहीं सकते। इसलिए जब नेता ग़लत होता है तो वे दुनिया को ग़लत साबित करने में जुट जाते हैं और जब दुनिया भी नहीं मानती तो वे अपनी ही कही हुई बातों को चुपचाप निगल लेते हैं। भक्त का विवेक भी कमाल का होता है—नेता की हार में भी जीत खोज लेता है, बस जीत का प्रमाणपत्र नेता के दफ़्तर से मिलना चाहिए।
एक और नियम है जिसे भक्तगण भूल जाते हैं—बॉस इज़ आल्वेज़ राइट। अगर बॉस के फ़ैसले में संदेह है तो रूल नंबर दो देखो, जिसमें लिखा है कि तीसरी तरफ़ देखो। वहाँ फिर वही लिखा मिलेगा—बॉस इज़ आल्वेज़ राइट।
भक्तों ने बॉस को दोस्त समझने की भूल कर दी। वे उसे भाई, चाचा, ताऊ आदि मानने लगे। रिश्तेदारी के इस मोह में वे यह भूल गए कि अमेरिका के लिए भारत एक बाज़ार और ख़रीदार हो सकता है, बराबरी का रिश्तेदार नहीं। अमेरिका की दोस्ती में भी एक शर्त होती है—दोस्ती तब तक, जब तक उससे फ़ायदा हो।
ऐसे में गड़बड़ तो होनी ही थी, सो हो गई। बॉस नाराज़ हो गया। उसने भक्तों को उनकी औक़ात बता दी। अमेरिका में ट्रम्प समर्थक भारतीयों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने लगे। भारतीयों को पराया घोषित किया जाने लगा। उनके अमेरिका आने पर पाबंदियाँ लगाने की बातें होने लगीं। जिन लोगों को लगता था कि ट्रम्प उनके बड़े पापा हैं, उन्हें अचानक पता चला कि बड़े पापा के घर में वे मेहमान नहीं हैं, बल्कि ऐसे रिश्तेदार हैं जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर दरवाज़े से बाहर कर दिया जाता है।
दुनिया की राजनीति में रिश्ते नहीं, हित चलते हैं। रिश्ते तो बस हितों की चादर होते हैं, जिन्हें मौसम बदलते ही उतारकर रख दिया जाता है।
अब हाल यह है कि भक्तों की भजन मंडली रातोंरात ग़ायब हो चुकी है। ट्रम्प को देवस्थान में प्रतिष्ठित करने वाले पता नहीं कहाँ चले गए। शायद वे अब उनके महापतन के लिए कोई यज्ञ शुरू करने की तैयारियों में जुटे हों। वैसे भक्तों की आस्था का भी जवाब नहीं। कल तक जिस ट्रम्प की जीत के लिए हवन कर रहे थे, आज उनकी हार पर मौन व्रत धारण किए हुए हैं।
मगर चिंता की बात यह नहीं कि भक्तों का देवता हार गया। चिंता की बात यह है कि भक्तों ने अपनी राजनीति को किसी दूसरे देश के नेता की कृपा पर टिका दिया था। अपने देश की ताक़त, अपनी जनता का विवेक और अपनी सरकार की जवाबदेही—सब कुछ छोड़कर वे बड़े पापा की छाया में बैठ गए थे। और अब छाया भी उठ गई है।
भक्तों के लिए यही सबसे बड़ा संकट है। उन्हें पहली बार पता चला है कि बड़े पापा की छतरी के नीचे खड़े होने से आदमी बड़ा नहीं हो जाता। कई बार वह सिर्फ़ भीगने से बचा हुआ एक छोटा आदमी होता है।
ट्रम्प ने बेचारे भक्तों को कहीं का नहीं छोड़ा। बड़े पापा तो चले गए, मगर छोटे पापा की नाक अब भी वहीं पड़ी है—ज़मीन पर।
और भक्तों की हालत यह है कि वे नाक उठाएँ तो पापा नाराज़ होते हैं, छोड़ दें तो बड़े पापा की याद आती है।