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जितिन प्रसाद की अटकल वाली ख़बर पर इतना शोर क्यों?

संजीव आचार्य की फ़ेसबुक वॉल से

शाहजहाँपुर के ब्राह्मण राजवंश के कुँवर जीतेंद्र प्रसाद अति महत्वाकांक्षी काँग्रेस नेता थे, जो कि दरबारी जोड़-तोड़ की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे। राजीव गाँधी के ज़माने में अरुण नेहरू जब शक्तिशाली थे तो वह जीतेन्द्र प्रसाद को पसंद नहीं करते थे और इसलिए उन्होंने इन्हें किनारे लगा दिया था।

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समय बदला और अरुण नेहरू ने राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ वी. पी. सिंह, विद्याचरण शुक्ल, आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, सतपाल मलिक वगैरह के साथ मिलकर जनमोर्चा बनाया और दुश्मन हो गए। राजीव शुक्ला उन दिनों काँग्रेस की राजनीति के सबसे सक्रिय पत्रकार थे और अपन भारतीय जन संचार संस्थान से ताज़ा-ताज़ा निकलकर दिल्ली दरबार को कौतूहल और जिज्ञासा से समझने की कोशिश में उनके साथ घूमते थे। राजीव शुक्ला तब 'रविवार' पत्रिका के पाँच सितारा रिपोर्टर थे जिनकी दस जनपथ में सीधे राजीव गाँधी तक घुसपैठ थी। ख़ैर, उन पर कभी और लिखूँगा। अभी बात जीतेंद्र प्रसाद की, जो राजीव शुक्ला के माध्यम से राजीव गाँधी के दरबार में महत्वपूर्ण भूमिका पाने के लिए प्रयासरत थे। राजीव शुक्ला ने 100, बख्तावर सिंह ब्लॉक, एशियाड विलेज के फ्लैट में राजीव गाँधी की दस-बारह सम्पादकों के साथ खान-पान पर चर्चा आयोजित की। मैं भी अनुराधा प्रसाद के साथ व्यवस्था में लगा था। बड़े सुनियोजित तरीक़े से उस चर्चा में तीन-चार बड़े पत्रकारों ने राजीव गाँधी को जीतेंद्र प्रसाद की काबिलियत की जमकर प्रशंसा करते हुए सलाह दे डाली कि उनको अपने संगठन में अहम ज़िम्मेदारी दें।

अगले दिन 24, अकबर रोड पर नियमित प्रेस ब्रीफ़िंग में विट्ठल नरहरि गाडगिल और मार्गरेट अल्वा ने बताया कि काँग्रेस अध्यक्ष राजीव गाँधी ने जीतेंद्र प्रसाद को अपना राजनीतिक सचिव नियुक्त किया है। रातोरात कुँवर साब फर्श से सीधे अर्श पर पहुँच गए।

लोधी कॉलोनी के उनके बंगले पर धीरूभाई अंबानी के क़रीबी आर. के. मिश्रा समेत काँग्रेस के दिग्गजों का सुबह-शाम मेला लगने लगा। वह विंसेंट जॉर्ज से भी ज़्यादा प्रभावशाली हो गए।

कांग्रेस में ताक़तवर नेता बन गये थे जीतेंद्र प्रसाद

फिर आ गए 1991 के चुनाव। प्रचार के दौरान ही राजीव गाँधी की श्रीपेरंबुदूर में निर्मम हत्या कर दी गयी। परिणाम आये, भारी उठापटक के बाद पमुलपति व्यंकट नरसिंहराव प्रधानमंत्री बन गए। वह काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी चुन लिए गए। चूँकि अर्जुन सिंह, शरद पवार, राजेश पायलट, माखनलाल फोतेदार जैसे महत्वाकांक्षी क्षत्रप राव के लिए चुनौती खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे, राव साहब ने जीतेंद्र प्रसाद को ही अपना राजनीतिक सचिव नियुक्त कर दिया।

1991 से 1996 तक जीत्ती भाई का अखण्ड जलवा रहा। यह हालत हो गई कि वह नरसिंह राव के बाद ख़ुद को पार्टी का सर्वेसर्वा स्थापित करने में सफल रहे।

हालाँकि नरसिंह राव के अन्य दो क़रीबी ब्राह्मण नेता देवेंद्र द्विवेदी और भुवनेश चतुर्वेदी यदाकदा जीतेंद्र प्रसाद को कमज़ोर करने की कोशिशें करते, लेकिन दोनों चालबाज़ी में जिती भाई से बहुत कमज़ोर थे। चूँकि नारायण दत्त तिवारी भी राव के लिए ख़तरा थे, इसलिए जीतेंद्र प्रसाद उनको रोकने में कामयाब होते हुए राव के विश्वास पात्र बन गए।

उपाध्यक्ष बनने के लिए केसरी से सौदा?

1996 में राव के पतन के साथ ही जीतेंद्र प्रसाद ने अध्यक्ष बनने के लिए बहुत जोड़-तोड़ की, लेकिन राव साहब ने उनको साफ़ मना कर दिया। सीताराम केसरी को बनाकर राव सभी दिग्गजों को नीचा दिखाना चाहते थे। जीतेंद्र प्रसाद ने राव की मंशा भाँपकर केसरी से डील कर ली कि मुझे उपाध्यक्ष बना दो, मैं सब से राव साब को बचाता रहा, आप को भी सिंहासन से हिलने नहीं दूँगा। चचा केसरी को सौदा बुरा नहीं लगा, राजनीतिक सचिव तो उन्होंने अपने चेले तारिक अनवर को बनाया, जित्ती बाबू उपाध्यक्ष बन गए। उनके पहले अर्जुन सिंह को यह पद देकर राजीव गाँधी परिणाम भुगत चुके थे।

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एक बार सोनिया को चुनौती दे दी थी

ख़ैर, महत्वाकांक्षी जीतेंद्र प्रसाद ने केसरी को पद से हटाने के लिए ख़ूब चालें चलीं। लेकिन इस बीच विंसेंट जॉर्ज ने तिवारी काँग्रेस के दोनों योद्धाओं अर्जुन सिंह और एन. डी. तिवारी के ज़रिये सोनिया गाँधी को पार्टी की बागडोर दिलवाने की ज़ोरदार मुहिम छेड़ी जो कामयाब रही।

जीतेंद्र प्रसाद साँप-सीढ़ी के खेल में फिर ज़मीन पर आ गिरे। न तो राजनीतिक सचिव बन पाए और न ही उपाध्यक्ष। अति-आत्मविश्वास में वह सोनिया गाँधी के ख़िलाफ़ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ गए और जैसा कि तय था, बुरी तरह हार गए।

और अब जितिन और राहुल... 

सोनिया गाँधी ने उनकी विधवा कांता प्रसाद को टिकट दिया, लेकिन वह चुनाव हार गईं। बाद में बेटे जीतिन प्रसाद ने राहुल गाँधी का दामन थामा, लोकसभा जीते, केंद्र में मंत्री बने, 2014 में लोकसभा चुनाव हार गए, बाद में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी हार गए। ज़मीन पर पकड़ कभी रही नहीं, दिल्ली के तमाम हवा-हवाई पाँच सितारा नेताओं की तरह एयर कंडीशनर नेता हैं। राहुल गाँधी भी समझ गए कि मर्क ड्राइव करके रेबैन लगाए ताज मानसिंह के चाइनीज रेस्टोरेंट में बैठकर पार्टी नेतृत्व की ग़लतियों पर चटखारे लेने वाले किसी काम के नहीं हैं।

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