मणिपुर में क़रीब एक साल बाद राष्ट्रपति शासन ख़त्म हो गया है। बुधवार को युमनम खेमचंद सिंह ने मणिपुर के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने इंफाल के लोक भवन उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। नगा पीपुल्स फ्रंट यानी एनपीएफ के नेता एल. दिक्हो और नेमचा किप्गेन ने भी उप-मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके अलावा, बीजेपी के गोविंदास कोंथौजम और नेशनल पीपुल्स पार्टी के लोकेन ने भी मंत्री के रूप में शपथ ली।

इससे पहले बुधवार को ही दिन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को 4 फरवरी 2026 से प्रभावी रूप से ख़त्म करने की अधिसूचना जारी की। यह शासन फरवरी 2025 से लगाया गया था, जब पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इस्तीफा दिया था। राज्य में जातीय तनाव और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह स्थिति बनी हुई थी।
दिन में ही युमनम खेमचंद सिंह ने राज्यपाल अजय कुमार भल्ला से मुलाकात की और बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनाने का दावा पेश किया था। मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने फेसबुक पर पोस्ट करते हुए कहा, 'मुझे विश्वास है कि नए मंत्रिमंडल के गठन से शांति और विकास हमारी सरकार के मुख्य सिद्धांत होंगे। विकसित भारत और विकसित मणिपुर की दिशा में राजनीतिक यात्रा चुनौतियों से भरी है, लेकिन हमारी प्राथमिकताएं इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने पर केंद्रित रहेंगी।'

खेमचंद सिंह कौन हैं?

युमनाम खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से हैं। वे दो बार विधायक चुने गए हैं- 2017 और 2022 में सिंगजामेई सीट से। 2017 में वे मणिपुर विधानसभा के स्पीकर बने और पूरे 5 साल पद पर रहे। 2022 चुनाव के बाद बीरेन सिंह सरकार में मंत्री बने। उनके पास ग्रामीण विकास, पंचायती राज, नगर प्रशासन, आवास विकास और शिक्षा जैसे अहम विभाग थे।

युमनम खेमचंद सिंह बीजेपी के वरिष्ठ नेता और लंबे समय से आरएसएस से जुड़े हुए हैं। वे संगठन पर फोकस करने वाले नेता माने जाते हैं।

खेमचंद सिंह ने राज्य में कई अहम संवैधानिक और मंत्रिमंडलीय पद संभाले हैं। वे ताइक्वांडो के मास्टर भी हैं और भारत में 5वीं डैन ब्लैक बेल्ट प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति हैं। खेमचंद सिंह बीरेन सिंह के आलोचक रहे हैं। उन्होंने हिंसा के दौरान बीरेन सिंह से इस्तीफा मांगा था। अब उनका नाम चुनना एक नया संदेश देता है।

यह सरकार का गठन राज्य में शांति बहाली और विकास के लिए अहम क़दम माना जा रहा है। नए मंत्रिमंडल में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व से जातीय संतुलन बनाने की कोशिश दिख रही है। उप-मुख्यमंत्री एल. दिक्हो नगा समुदाय से हैं, जबकि अन्य डिप्टी सीएम नेमचा किप्गेन कुकी समुदाय से हैं।

कैसे खाली हुआ था मुख्यमंत्री पद?

पहले मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह थे। मई 2023 से मणिपुर में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई। इसमें सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों बेघर हुए। कुकी समूहों ने बीरेन सिंह पर पक्षपात का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। धीरे-धीरे बीजेपी के अंदर भी असंतोष बढ़ा। कई विधायकों ने बीरेन सिंह को राजनीतिक बोझ बताया। अक्टूबर 2024 में 19 भाजपा विधायकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी और बीरेन सिंह को हटाने की मांग की। नवंबर में खेमचंद सिंह ने खुद बीरेन सिंह से इस्तीफा देने को कहा था।

फरवरी 2025 में स्थिति बिगड़ी। कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी की। बीजेपी के कई विधायक दिल्ली पहुंचे और नेतृत्व से मिले। 9 फरवरी 2025 को बीरेन सिंह ने इस्तीफा दे दिया। 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। विधानसभा निलंबित कर दी गई।

केंद्र सरकार शुरू में हिचकिचा क्यों रही थी?

2025 के ज्यादातर समय केंद्र सरकार सतर्क रही। उसका मानना था कि राष्ट्रपति शासन से राज्य में कुछ हद तक शांति लौट आई है। अगर कोई अस्थिर सरकार बनाई गई तो यह नाजुक शांति को खराब कर सकती है। हथियार छोड़ने का काम पूरा नहीं हुआ था, पहाड़ी और घाटी इलाकों में लोगों की आवाजाही पर अभी भी विवाद था, और उग्रवादी समूहों से बातचीत चल रही थी। फिर भी, कुछ अच्छी चीजें आगे बढ़ने में मदद कर रही थीं। कूकी समूहों के साथ समझौते हुए जिससे लोगों की आवाजाही आसान हुई। हथियारबंद संघर्ष रोकने का समझौता फिर से शुरू हुआ। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की मणिपुर यात्रा हुई। यह हिंसा शुरू होने के बाद उनकी पहली यात्रा थी। इन सबको शांति लौटने के संकेत के रूप में दिखाया गया। केंद्र सरकार पर संवैधानिक दबाव भी था। राष्ट्रपति शासन को एक साल से ज्यादा बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल लगाना पड़ता है। इसलिए केंद्र को मजबूरन फैसला लेना पड़ा।

नई सरकार के सामने क्या मुश्किलें?

नई सरकार को बहुत बड़ी चुनौतियां मिलेंगी। राज्य में अभी भी सामाजिक विभाजन है। विस्थापित लोग राहत शिविरों में हैं। पहाड़ी और घाटी इलाकों में आवाजाही सीमित है। हथियार जमा नहीं हुए हैं। समुदायों के बीच अविश्वास है। विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। नई सरकार को लोगों का भरोसा जीतना होगा। पुनर्वास, रास्ते खोलना, संवाद और सुरक्षा में पारदर्शिता जरूरी है।

बहरहाल, राज्य में अब चुनी हुई सरकार बहाल होने से लोगों में उम्मीद जगी है कि जल्द ही शांति और सामान्य स्थिति लौटेगी। नए मुख्यमंत्री ने शांति, विकास और सभी समुदायों के हितों को प्राथमिकता देने का वादा किया है। लेकिन क्या नई सरकार इसमें सफल हो पाएगी?