मद्रास हाईकोर्ट ने एक रिपोर्ट का ज़िक्र किया जिसके अनुसार 7 मई से 28 मई के बीच सफ़ाई अभियान के दौरान तामिराबरानी नदी से 86 से 90 टन कपड़े, 1385 किलो प्लास्टिक, 374 किलो सैनिटरी नैपकिन-डायपर, 220 किलो कांच की बोतलें, 115 किलो चप्पलें निकलीं।
एक पवित्र नदी की सफाई में 90 टन कपड़ा निकला। साथ में 1385 किलो प्लास्टिक, 374 किलो नैपकिन-डायपर, 220 किलो शीशे की बोतलें और 115 किलो चप्पलें भी मिलीं। पूजी जाने वाली नदी का ये हाल! वो भी पूजा और आस्था के नाम पर ही! मद्रास हाईकोर्ट भी हैरान रह गया। इसने तो कह दिया कि धर्म के नाम पर नदी को प्रदूषित करने का किसी को अधिकार नहीं है।
यह मामला है तमिलनाडु की पवित्र तामिराबरानी (ताम्रपर्णी) नदी का है। नदी में प्रदूषण का मामला हाईकोर्ट पहुँचा था। न्यायमूर्ति जीआर स्वामिनाथन और बी पुगलेन्दि की हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 9 जुलाई को सुनवाई की। बेंच ने तामिराबरानी नदी में धार्मिक अनुष्ठानों के बाद बड़ी मात्रा में कपड़े और अन्य सामान फेंके जाने पर गंभीर चिंता जताई।
प्रदूषण के हालात पर कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 यानी धार्मिक स्वतंत्रता लोगों के स्वास्थ्य से ऊपर नहीं है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई रीति-रिवाज पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है या दूसरों के अधिकारों को प्रभावित करता है तो उसे ऐसा नहीं होने दिया जा सकता है। बेंच ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को धर्म के नाम पर नदी या किसी भी जलस्रोत को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं है।
किस वजह से इतना ज़्यादा प्रदूषण?
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि हज़ारों श्रद्धालु अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में निभाने के लिए तामिराबरानी नदी के घाटों पर आते हैं। इन रस्मों में इस्तेमाल किए गए और बिना इस्तेमाल किए गए कपड़े, तौलिए, चप्पल और मृतक से जुड़ी चीज़ों को नदी में फेंकना शामिल है। बेंच ने नदी की सफ़ाई में लगे मूर्ति नाम के एक एक्टिविस्ट से बात की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि हर दिन कम से कम एक टन कपड़े नदी में फेंके जाते हैं।
कोर्ट के आदेश में एक बुकलेट का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें बताया गया था कि 7 मई से 28 मई के बीच सफ़ाई अभियान के दौरान नदी से 86 से 90 टन कपड़े निकाले गए। इकट्ठा किए गए कचरे में 1385 किलोग्राम प्लास्टिक, 374 किलोग्राम सैनिटरी नैपकिन और डायपर, 220 किलोग्राम कांच की बोतलें और 115 किलोग्राम चप्पलें भी शामिल थीं। अदालत ने इन आँकड़ों को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि यह स्थिति नदी के अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है।
पानी में रहने वाले जीवों के लिए भी ख़तरा
एक्टिविस्ट ने कोर्ट से कहा कि लगातार बढ़ते इस कचरे के कारण नदी की सफाई बेहद मुश्किल होती जा रही है और जलजीवों पर भी इसका गंभीर असर पड़ रहा है। अदालत ने कहा कि नदी में फेंके जाने वाले अधिकांश कपड़े पॉलिएस्टर जैसे कृत्रिम रेशों से बने होते हैं, जो आसानी से गलते नहीं।
ये कपड़े नदी की तलहटी में फंस जाते हैं और बैक्टीरिया पनपने का कारण बनते हैं। इसके अलावा नदी में रहने वाले भारतीय काले कछुए और फ्लैपशेल कछुए इन कपड़ों में उलझकर दम घुटने से मर सकते हैं।
अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पानी का अधिकार
मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त पानी नागरिकों का मौलिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने तमिलनाडु पब्लिक हेल्थ एक्ट, 1939 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का भी ज़िक्र करते हुए कहा कि जल स्रोतों को प्रदूषित करना कानून के भी खिलाफ है।प्रशासन जागरूकता अभियान चलाए
हाई कोर्ट ने कहा कि लोगों को बड़े पैमाने पर जागरूक करने की जरूरत है ताकि धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण की भी रक्षा हो सके। अदालत ने कहा कि पेश किए गए आंकड़े इतने गंभीर हैं कि प्रशासन को युद्ध स्तर पर लोगों को समझाना होगा कि नदी में कचरा फेंकना बंद करें।
हालांकि अदालत ने तुरंत किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। इसने कहा कि यह मामला बड़ी संख्या में लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए सभी पक्षों को सुनना ज़रूरी है।
कोर्ट ने तिरुनेलवेली जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे सार्वजनिक सूचना जारी करें कि इस मामले में 16 जुलाई को आगे सुनवाई होगी। धार्मिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों को भी अपना पक्ष रखने की अनुमति दी गई है। साथ ही जिला प्रशासन से नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए स्थायी समाधान का प्रस्ताव भी अदालत में पेश करने को कहा गया।सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा कि 'धर्म के नाम पर किसी भी जल स्रोत को प्रदूषित करने का किसी को अधिकार नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता तभी तक है, जब तक उससे पर्यावरण और दूसरे लोगों के अधिकार प्रभावित न हों।' अदालत ने संकेत दिया कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य उससे भी अधिक अहम संवैधानिक जिम्मेदारी है।
अब दिक्कत ये है कि लोग सदियों पुरानी परंपरा को अचानक नहीं छोड़ना चाहते। भावनाएँ जुड़ी हैं। इसलिए कोर्ट ने तुरंत रोक नहीं लगाई। उसने 16 जुलाई को सभी पक्षों को सुनने का फैसला किया है।