मंगलवार को तमिलनाडु विधानसभा में उस वक्त जोरदार राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला, जब राज्यपाल आरएन रवि ने सदन से वॉकआउट कर दिया और परंपरागत अभिभाषण नहीं पढ़ा। राज्यपाल ने आरोप लगाया कि विधानसभा में राष्ट्रगान का अपमान किया गया है। राज्यपाल के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि आरएन रवि ने विधानसभा का अपमान किया है और उनका व्यवहार 100 साल पुरानी तमिलनाडु विधानसभा की गरिमा के खिलाफ है।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि अन्नादुरै और कलैग्नार एम करुणानिधि ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान कभी राज्यपाल पद का अपमान नहीं किया। स्टालिन ने कहा- “हमने भी हमेशा राज्यपाल पद का सम्मान किया है, लेकिन मौजूदा राज्यपाल का रवैया और उनका बार-बार ऐसा व्यवहार बेहद दुखद है। तमिलनाडु विधानसभा करोड़ों तमिलों की भावनाओं को प्रतिबिंबित करती है।”
स्टालिन ने राज्यपाल पर आरोप लगाया कि वे सार्वजनिक मंचों पर राज्य सरकार के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा इस बात को स्वीकार नहीं कर सकती कि राज्यपाल बिना सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण पढ़े सदन से बाहर चले जाएं।
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तमिलनाडु में चुनाव होने वाले हैं, तीसरी बार गवर्नर का ऐसा रवैया

राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी पिछले कई वर्षों से तमिलनाडु में अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए वो हर दांव आज़मा रही है। यह तीसरी बार है जब राज्यपाल ने विधानसभा से वॉकआउट किया है। वर्ष 2024 और 2025 में भी उन्होंने अभिभाषण नहीं दिया था। पिछले साल भी राष्ट्रगान को लेकर विवाद के बाद उन्होंने सदन छोड़ दिया था।

क्या गवर्नर को अपना भाषण पढ़ने का अधिकार है

भारतीय संविधान ने इस मुद्दे पर कोई अस्पष्टता नहीं छोड़ी है। अनुच्छेद 176 के तहत यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विधानसभा के पहले सत्र में राज्यपाल वह अभिभाषण पढ़ते हैं जो मंत्रिपरिषद की सलाह पर तैयार किया गया हो। यह भाषण राज्यपाल का व्यक्तिगत विचार नहीं, बल्कि निर्वाचित सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं का संवैधानिक दस्तावेज होता है। ऐसे में यह सवाल तो उठेगा ही कि
क्या तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि संविधान से ऊपर हैं? क्या उन्हें यह अधिकार है कि वे सरकार द्वारा तैयार भाषण को अस्वीकार कर अपना लिखा भाषण पढ़ने की जिद करें? संवैधानिक व्यवस्था में इसका जवाब साफ है- नहीं।

गवर्नर के सहारे क्या राजनीति हो रही है

बीजेपी शासित राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात या असम में राज्यपालों ने कभी भी सरकार के भाषण को ठुकराकर अपना भाषण पढ़ा है, ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। वहां न राष्ट्रगान का विवाद खड़ा होता है, न माइक्रोफोन बंद होने के आरोप, न ही वॉकआउट की नौबत आती है। सवाल यह नहीं है कि तमिलनाडु में क्या गलत हुआ, डीएमके और उसके समर्थक दलों का सवाल यह है कि क्या राज्यपाल पद के ज़रिए राज्य में बीजेपी राजनीतिक कर रही है, क्या आर एन रवि को राजनीतिक टकराव का औजार बनाया जा रहा है?
राज्यपाल द्वारा बार-बार राष्ट्रगान के नाम पर टकराव खड़ा करना, जबकि संविधान में राष्ट्रगान के क्रम को लेकर कोई सख्त निर्देश नहीं है। तमिलनाडु में दशकों से पहले तमिल ताई वाज़्थु और फिर राष्ट्रगान की औपचारिकता होती रही हैं। लेकिन राष्ट्रगान की आड़ लेना राजनीतिक मंशा पर सवाल खड़े करता है। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि यह तीसरा लगातार वर्ष है जब राज्यपाल ने अभिभाषण नहीं पढ़ा। यदि एक बार को इसे मतभेद कहा जाए, तो बार-बार का ऐसा बर्ताव इसे संवैधानिक को ताक पर रखने की श्रेणी में खड़ा कर देती है।राज्यपाल आर एन रवि न तो विपक्ष के नेता हैं, न ही केंद्र सरकार के प्रवक्ता। वे संविधान के संरक्षक हैं। जब राज्यपाल ही संविधान की भावना को चुनौती दे, तो सवाल खड़े ही होंगे।

राजभवन से 13 सूत्री बयान जारी, स्टालिन सरकार पर आरोप

इस मामले में तमिलनाडु राजभवन ने 13 सूत्री बयान जारी करके सफाई दी है। बयान में आरोप लगाया गया कि राज्यपाल को बोलने नहीं दिया गया और सामाजिक मुद्दों को भाषण में नजरअंदाज किया गया। राजभवन ने स्टालिन सरकार पर आरोप लगाया कि "सरकार द्वारा राज्यपाल को पढ़ने के लिए दिए गए भाषण में कई निराधार दावे और भ्रामक बयान शामिल हैं। जनता को परेशान करने वाले कई महत्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। राष्ट्रगान का एक बार फिर अपमान किया गया है और मौलिक संवैधानिक कर्तव्य की अवहेलना की गई है।" यहां बताना ज़रूरी है कि तमिलनाडु विधानसभा सत्र की शुरुआत तमिल गान से होती है।
गवर्नर ऑफिस ने अपने बयान में आरोप लगाया कि डीएमके सरकार का यह दावा कि तमिलनाडु में 12 करोड़ रुपये से अधिक का भारी निवेश हुआ है, "सच से परे" है और संभावित निवेशकों के साथ हुए कई समझौते केवल कागजों पर ही रह गए हैं। वास्तविक निवेश तो इसका एक अंश मात्र है। निवेश के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु निवेशकों के लिए कम आकर्षक होता जा रहा है। चार साल पहले तक, तमिलनाडु राज्यों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने वाला चौथा सबसे बड़ा राज्य था। आज यह छठे स्थान पर बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है।
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तमिलनाडु राजभवन ने आरोप लगाया कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है, जबकि यौन उत्पीड़न के मामलों में भारी वृद्धि हुई है- 55 फीसदी से अधिक पॉक्सो मामले और 33 फीसदी से अधिक महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के मामले सामने आए हैं। बयान में यह भी कहा गया है, "दलितों के खिलाफ अत्याचार और दलित महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा तेजी से बढ़ रही है। इसे पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा है।