इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शामली के रहने वाले 31 वर्षीय आयुष मलिक को अपने ही परिवार की कथित हिरासत से तब मुक्त कर दिया जब कोर्ट में उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया है। उन्होंने कोर्ट में कहा कि वह चांदनी क़ुरैशी से शादी करना चाहते हैं। आयुष के पिता ने आरोप लगाया कि उनके बेटे को बहकाया गया। लेकिन अदालत ने कहा कि परिवार की आपत्ति बालिग की संवैधानिक आज़ादी पर हावी नहीं हो सकती है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, रहने की जगह और जीवनसाथी चुनने के मामले में खुद फ़ैसला लेने का अधिकार है। जस्टिस संदीप जैन ने बुधवार को हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने कहा कि आयुष ने साफ़ तौर पर बताया है कि उन्होंने बिना किसी धमकी, दबाव, लालच या अनुचित प्रभाव के अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया। अदालत के सामने ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया जिससे उनके बयान पर अविश्वास करने का आधार बनता हो। अदालत ने इसके बाद आयुष को अपनी पसंद की जगह पर रहने, अपनी इच्छा के व्यक्ति के साथ रहने व जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता दी।

आयुष ने कोर्ट को क्या बताया?

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार अदालत के सामने पेश किए गए आयुष मलिक ने कहा कि उन्होंने साल 2014 में हिंदू धर्म छोड़कर अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया था। उन्होंने अदालत को बताया कि उनके धर्म परिवर्तन के पीछे किसी व्यक्ति की धमकी, दबाव, लालच या अनुचित प्रभाव नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम अपनाने के बाद से वह इस धर्म की ज़रूरी धार्मिक प्रथाओं का पालन करते रहे हैं। हालाँकि, उनके इस फ़ैसले को उनके माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों ने स्वीकार नहीं किया।
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अदालत को आयुष ने बताया कि वह चांदनी कुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध बनाना चाहते हैं और उनसे शादी करने का फ़ैसला कर चुके हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि 4 जून से उन्हें उनके घर में धमकाया गया और ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से रखा गया। इसी कथित हिरासत को लेकर हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की गई थी।

आयुष के पिता ने क्या दावा किया?

धर्म परिवर्तन करने वाले आयुष के पिता देवराज सिंह मलिक ने अदालत में अपने बेटे के बयान से अलग दावा किया। उन्होंने कहा कि आयुष को कुछ लोगों ने प्रभावित या कथित तौर पर ब्रेनवॉश किया है और उनका धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से नहीं हुआ। परिवार की ओर से पहले यह दावा भी किया गया था कि मुस्लिम महिला और उसके परिवार ने आयुष पर दबाव डाला था और इसका उद्देश्य उनकी संपत्ति पर नियंत्रण हासिल करना था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयुष से सीधे बातचीत की और उनके बयान को रिकॉर्ड पर लिया। अदालत ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस आधार सामने नहीं आया है जिससे यह माना जाए कि आयुष का धर्म बदलने और जीवनसाथी चुनने का फ़ैसला स्वतंत्र इच्छा से नहीं लिया गया था।

‘बालिग व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का अधिकार’

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अहम माना। अदालत ने कहा कि बालिग व्यक्ति सामान्य तौर पर अपनी अंतरात्मा के अनुसार अपना धर्म तय करने का अधिकार रखता है। अदालत के मुताबिक़, यदि किसी व्यक्ति का धर्म चुनने का फ़ैसला परिवार के सदस्यों को पसंद नहीं है तो केवल इस वजह से उस फ़ैसले को ख़त्म नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई बालिग व्यक्ति अदालत के सामने अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद को साफ़ तौर पर बता देता है तो सामान्य तौर पर उसकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए। हालाँकि, अगर यह साबित हो कि उसका फैसला कानून में मान्य किसी दबाव, धमकी या अन्य ऐसी परिस्थिति से प्रभावित था तो स्थिति अलग हो सकती है।

शादी का फ़ैसला भी व्यक्ति की अपनी पसंद

अदालत ने जीवनसाथी चुनने के अधिकार को भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ा। कोर्ट ने कहा कि किसी बालिग व्यक्ति का यह तय करना कि वह किससे शादी करना चाहता है या किस व्यक्ति के साथ संबंध रखना चाहता है, उसकी व्यक्तिगत आज़ादी है। परिवार की इच्छा या अपेक्षा इसके विपरीत होने मात्र से किसी बालिग व्यक्ति की इस स्वतंत्रता पर रोक लगाने का वैध आधार नहीं बनता।

इस मामले में अदालत ने कहा कि आयुष ने साफ तौर पर चांदनी कुरैशी से शादी करने की इच्छा जताई है और वह इस फैसले को अपनी पसंद बता रहे हैं। इसलिए अदालत को फिलहाल उनके इस फ़ैसले की स्वेच्छा पर संदेह करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं मिला।

परिवार की चिंता पर कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने आयुष के पिता की चिंता को पूरी तरह खारिज नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की अपने बच्चे के कल्याण को लेकर चिंता पारिवारिक रिश्ते के संदर्भ में समझी जा सकती है। लेकिन अदालत ने यह भी साफ़ किया कि ऐसी चिंता किसी बालिग व्यक्ति की संविधान से सुरक्षित व्यक्तिगत आज़ादी से ऊपर नहीं हो सकती।
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हेबियस कॉर्पस याचिका क्या थी?

इस मामले में अदालत के सामने हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई थी। इसका मक़सद कथित गैर-कानूनी हिरासत में रखे गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश कराना और उसकी स्वतंत्रता से जुड़े सवाल की जांच करना होता है।

इस मामले में याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस्लाम अपनाने के बाद आयुष मलिक को उनके परिवार ने ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से घर में रोक रखा है। 9 सितंबर को हाईकोर्ट ने अधिकारियों को आयुष को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि गैर-कानूनी हिरासत के आरोप गंभीर हैं और तत्काल विचार की ज़रूरत है। इसके बाद बुधवार को पुलिस ने आयुष को अदालत के सामने पेश किया। उन्होंने अपनी इच्छा और फ़ैसलों को लेकर स्पष्ट बयान दिया, जिसके बाद अदालत ने उन्हें आज़ाद कर दिया।

चांदनी और उनके पिता गिरफ्तार क्यों?

आयुष मलिक के धर्म परिवर्तन का मामला पहले उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत दर्ज एक केस से भी जुड़ा था। रिपोर्टों के मुताबिक आयुष के हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने के बाद शामली पुलिस ने मुस्लिम महिला चांदनी कुरैशी और उनके पिता को उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत गिरफ्तार किया था।
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उस समय आयुष ने मीडिया से कहा था कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया है। दूसरी ओर उनके पिता ने आरोप लगाया था कि उन पर दबाव डाला गया था। बाद में ऐसी रिपोर्टें भी आईं कि आयुष हिंदू धर्म में वापस लौट आए थे। अब हाईकोर्ट में आयुष ने दोबारा स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने इस्लाम अपनी इच्छा से अपनाया था और वह अपनी धार्मिक पहचान के बारे में खुद फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। 

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि आयुष अपने घर में पुलिस की मौजूदगी में रह रहे थे। कोर्ट ने कहा कि जब एक बालिग व्यक्ति अदालत के सामने अपनी स्वतंत्र इच्छा साफ़ कर चुका है तो उसे उसकी पसंद की जगह पर रहने से रोकने का कोई वैध आधार नहीं है। इसी वजह से अदालत ने आयुष को अपनी पसंद की जगह और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दे दी। साथ ही उन्हें अपने चुने हुए धर्म को मानने और उसका पालन करने की भी आज़ादी दी गई।