इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट मामले में आकृति चौधरी की गिरफ़्तारी पर पूछा, 'BNS की धारा 130 नोटिस के अनुसार वह बयान देने को तैयार हो तो गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अब इसमें जीडी एंट्री देखिये, उसे गिरफ्तार कर लिया फिर नोटिस बनाया।'
आकृति चौधरी को एनएसए मामले में राहत।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ लगाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA हिरासत को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से पेश की गई कहानी 'मनगढ़ंत' है और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्य उसके पक्ष में नहीं दिखते। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यदि आकृति चौधरी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।
करीब पांच महीने से जेल में बंद 25 वर्षीय आकृति चौधरी ने अपनी गिरफ्तारी और एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी।
अदालत ने सरकार के दावों पर उठाए सवाल
यह मामला न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ के सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत ने गिरफ्तारी की पूरी प्रक्रिया, पुलिस रिकॉर्ड और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत जारी नोटिसों की जांच की। जांच के बाद अदालत ने पाया कि पुलिस की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया में कई गंभीर खामियां थीं।गिरफ्तारी पहले, नोटिस बाद में?
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को बताया कि आकृति चौधरी को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और उन्हें BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस भी दिया गया था।
सरकार का दावा था कि आकृति चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को हिंसा, आगजनी और पथराव के लिए उकसाया था। इस पर न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने पूछा कि क्या गिरफ्तारी से पहले BNSS की धारा 126 के तहत कोई नोटिस जारी किया गया था? सरकार ने जवाब दिया कि ऐसा कोई नोटिस नहीं दिया गया था और केवल धारा 130 का नोटिस जारी किया गया था।
अदालत ने बताई प्रक्रिया की खामी
इस पर अदालत ने कहा कि BNSS के तहत धारा 130 की प्रक्रिया, धारा 126 के बाद आती है। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने सुनवाई के दौरान कहा, 'धारा 130 के नोटिस के मुताबिक अगर वह बयान देने के लिए तैयार थी, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अब जनरल डायरी (GD) की एंट्री देखिए, पहले उसे गिरफ्तार कर लिया गया और उसके बाद नोटिस बनाया गया।'अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा लगता है कि पहले गिरफ्तारी हुई और बाद में नोटिस तैयार किया गया, जिससे सरकार की पूरी दलील पर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने जीडी एंट्री पर जताई आपत्ति
अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में पहले नोटिस जारी किया गया होता तो उसकी प्रक्रिया अलग होती। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा, 'यानी वह मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं हुई, बल्कि पहले ही गिरफ्तार हो चुकी थी। अगर नोटिस पहले दिया गया होता तो जीडी नंबर इस तरह दर्ज नहीं होता या हाथ से तैयार किया गया होता।'
हिंसा कब हुई, इस पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान सरकार ने बताया कि प्रदर्शनकारी 11 अप्रैल को इकट्ठा हुए थे। इस पर अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 11 अप्रैल को कोई हिंसा नहीं हुई थी। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने टिप्पणी की, 'यानी 11 तारीख को कोई हिंसा नहीं थी। जो भी हिंसा हुई, वह उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई।' अदालत ने इस आधार पर सवाल उठाया कि यदि आकृति चौधरी पहले ही गिरफ्तार हो चुकी थीं तो बाद में हुई हिंसा के लिए उन्हें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।वीडियो सबूत दिखाने को कहा था
इससे पहले सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि वह वह वीडियो दिखाए जिसमें आकृति चौधरी प्रदर्शनकारियों को पथराव या वाहनों में आग लगाने के लिए उकसाती हुई दिखाई दे रही हों। सरकार ने वीडियो पेश करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।लेकिन अदालत ने यह कहते हुए और समय देने से इनकार कर दिया कि आकृति पहले ही लगभग पांच महीने जेल में रह चुकी हैं।
गवाहों के बयान भी अदालत की कसौटी पर
सरकार ने अदालत को बताया कि चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और गवाहों ने आकृति चौधरी का नाम लिया है। इस पर न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि केवल गवाहों के बयान पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने पूछा कि वीडियो रिकॉर्डिंग में ऐसा कौन-सा हिस्सा है जिसमें आकृति लोगों को हिंसा के लिए उकसाती हुई दिखाई देती हैं। सरकार इस संबंध में अदालत को स्पष्ट जवाब नहीं दे सकी।
क्या है पूरा मामला?
आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातक हैं। उन्हें अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके और सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA भी लगा दिया। दोनों को 13 मई 2026 को एनएसए के तहत पकड़ा गया था।गौतमबुद्ध नगर की तत्कालीन पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया था कि पुलिस के पास आकृति चौधरी, सत्यम वर्मा और अन्य आरोपियों के खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं। इन्हीं दावों के आधार पर एनएसए की कार्रवाई की गई थी। हालांकि हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि उपलब्ध रिकॉर्ड सरकार के दावों की पुष्टि नहीं करते।
हाईकोर्ट ने फिलहाल आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द करते हुए उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया है, यदि किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी ज़रूरी न हो। अदालत का विस्तृत लिखित आदेश अभी जारी होना बाकी है। इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गिरफ्तारी की वैधानिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल से जुड़े मामलों में एक अहम न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।