उत्तर प्रदेश काडर के 2022 बैच के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने मंगलवार को सेवा से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से उन्हें कोई अर्थपूर्ण पोस्टिंग नहीं दी गई। उन्हें केवल ‘अटैच्ड’ पद पर रखा गया, जहां वेतन तो मिलता रहा, लेकिन जनसेवा का कोई अवसर नहीं दिया गया।

रिंकू सिंह राही एक दलित आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने इस्तीफे का फैसला ऐसे समय में लिया जब पिछले कई महीनों से उन्हें कोई जिम्मेदारीपूर्ण पद नहीं सौंपा गया था। जुलाई 2025 में शाहजहांपुर में वकीलों के विरोध प्रदर्शन के दौरान उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने कुछ लोगों से उठक बैठक कराई थी। इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश राजस्व बोर्ड से अटैच कर दिया गया।
  • 28 जुलाई 2025 को रिंकू सिंह राही को शाहजहांपुर के पुवायां का सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) नियुक्त किया गया। मात्र 36 घंटे बाद ही उन्हें इस पद से हटा दिया गया।
  • इसके बाद से वे निरंतर ‘अटैच्ड’ स्थिति में रहे और कोई मीनिंगफुल काम नहीं सौंपा गया।
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घोटाले का पर्दाफाश करने पर फायरिंग हुई, 7 गोलियां लगी थीं

रिंकू सिंह राही इससे पहले प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) अधिकारी के रूप में मुजफ्फरनगर के वेलफेयर विभाग में तैनात थे। वर्ष 2009 में उन्होंने विभाग में एक बड़े घोटाले को उजागर किया था। घोटाले का भंडाफोड़ करने के बाद हमलावरों ने उन पर गोलीबारी कर दी थी। वे सात गोलियों के घाव सहकर भी बच गए थे। इसके बावजूद उन्होंने सरकारी सेवा में बने रहकर जनसेवा करने का फैसला किया और बाद में यूपीएससी परीक्षा पास कर आईएएस बन गए।

लोकसभा सांसद (नगीना) चंद्र शेखर आजाद ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “एक दलित आईएएस अधिकारी को उपेक्षा के कारण इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। इससे पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगता है।”

उन्होंने एक्स पर लिखा, “रिंकू सिंह राही, एक दलित, का इस्तीफा कोई व्यक्तिगत फैसला नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर सवाल है। उन्होंने 2009 में भ्रष्टाचार उजागर किया, मौत के मुंह से लौटे (सात गोलियां लगीं), फिर भी सिस्टम के अंदर जनसेवा के लिए प्रतिबद्ध रहे। आज उन्हें काम नहीं देने की बात कही जा रही है और इस उपेक्षा ने उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया।”

आज़ाद ने कहा- अभी तीन दिन पहले ही कन्नौज में राज्य मंत्री असीम अरुण जी को मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया गया, लेकिन 45 मिनट तक इंतजार कराया गया और अंत में बिना कार्यक्रम के लौटना पड़ा। वहीं, पिछले साल भूतपूर्व राज्यपाल और वर्तमान कैबिनेट मंत्री बेबी रानी मौर्य जी द्वारा अपने गृह जनपद आगरा में बुलाई गई किसानों की बैठक में अधिकारी पहुंचे ही नहीं, जिससे उन्हें बैठक स्थगित करनी पड़ी। यह विरोधाभास केवल संयोग नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर मौजूद गंभीर असंतुलन और सवालों की ओर इशारा करता है।

यह मामला उत्तर प्रदेश प्रशासन में दलित अधिकारियों के साथ व्यवहार और पोस्टिंग के मुद्दों को लेकर चर्चा पैदा कर रहा है। अधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें जनता की सेवा करने का अवसर नहीं दिया जा रहा था, जबकि वे वेतन लेते रहे।
अभी तक उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इस्तीफे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। रिंकू सिंह राही का यह कदम उन युवा अधिकारियों की पीड़ा को उजागर करता है जो ईमानदारी और सेवा भाव से काम करना चाहते हैं, लेकिन सिस्टम की उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।

अधिकतर दलित अफसर उत्पीड़न के शिकार

यूपी ही नहीं हिन्दी पट्टी के तमाम बीजेपी शासित राज्यों में दलित अफसर उत्पीड़न के शिकार हैं। तमाम विभागों में उन्हें ऐसे कामों पर रखा गया है, जहां वे जनता से जुड़े हुए नहीं हैं। कई विभागों में तो उन्हें काम तक नहीं मिला हुआ है। रिंकू सिंह राही के मामले में भी यही हुआ, उन्हें किसी न किसी विभाग से अटैच करके रखा गया। कभी बाकी सवर्ण अधिकारियों के मुकाबले उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी या पद नहीं दिया गया। 
पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट में एक जज साहब ने टिप्पणी की थी कि दलित जब आईएएस आईपीएस अधिकारी बन जाते हैं, तो वे इतने कुलीन हो जाते हैं कि उनकी अगली पीढ़ी को किसी आरक्षण की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। अब यही दलित आईएएस अधिकारी रिंकू राही के साथ हो रहा है। इससे पहले हरियाणा के एक दलित आईपीएस अधिकारी के साथ भयानक जातिगत भेदभाव हुआ।