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मुसलिमों पर विज्ञापन देने वाले मेरठ के हॉस्पिटल मालिक पर केस, माफ़ी माँगी 

मुसलिम मरीजों को भर्ती नहीं करने को लेकर अख़बार में विज्ञापन निकालने वाले मेरठ के वेलेंटिस कैंसर हॉस्पिटल के मालिक के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई है। पुलिस का कहना है कि यह रिपोर्ट इसलिए दर्ज की गई है क्योंकि पुलिस को पता चला कि एक हॉस्पिटल ने विज्ञापन के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बयान दिया है और जिससे अशांति फैल सकती है। जब मामले ने तूल पकड़ा तब हॉस्पिटल के मालिक डॉ. अमित जैन ने पहले तो विज्ञापन के सांप्रदायिक होने की बात को खारिज कर दिया लेकिन बाद में उन्होंने विज्ञापन के लिए माफ़ी माँगी। 

तीन दिन पहले ही हॉस्पिटल की ओर से हिंदी अख़बार दैनिक जागरण के मेरठ एडिशन में निकाले गए विज्ञापन में कहा गया था कि वह नये मुसलिम मरीजों को तब तक भर्ती नहीं करेगा जब तक कि वह कोरोना नेगेटिव होने की रिपोर्ट नहीं देगा। ऐसी शर्त दूसरे धर्म के लोगों के लिए नहीं थी। 

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हॉस्पिटल ने यह क़दम इसका हवाला देते हुए उठाया था कि कुछ मुसलिम मरीज़ मास्क पहनने, स्वच्छता का ख़याल रखने जैसे दिशा-निर्देशों को नहीं मान रहे हैं और हॉस्पिटल स्टाफ़ के साथ ग़लत व्यवहार कर रहे हैं। हॉस्पिटल द्वारा दिए गए विज्ञापन के अनुसार, 'अस्पताल के कर्मचारियों और मरीज़ों की सुरक्षा के लिए अस्पताल प्रशासन सभी नए मुसलिम मरीज़ों से आग्रह करता है कि वे और अपने साथ देखभाल के लिए आने वाले लोगों का कोरोना का परीक्षण कराएँ और केवल तभी अस्पताल आएँ जब उनकी रिपोर्ट नेगेटिव हो।' हॉस्पिटल प्रशासन ने विज्ञापन में दावा किया था कि दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के कार्यक्रम के बाद कोरोना मरीजों की संख्या में 'अप्रत्याशित' बढ़ोतरी हुई है।

'द वायर' की रिपोर्ट के अनुसार, जैन ने कहा था कि इन नियमों से मुसलिम डॉक्टर, स्वास्थ्य कर्मी, जज, पुलिस कर्मी, शिक्षक और दूसरे उन मुसलमानों को छूट दी गई है जो सघन मुसलिम बस्तियों में नहीं रहते हैं। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि मुसलिम बहुल क्षेत्रों में रह रहे इसलाम के अलावा दूसरे धर्मों के लोगों पर भर्ती होने से पहले कोरोना जाँच रिपोर्ट नेगेटिव देने का यह नियम नहीं लागू होगा। 

इस मामले में रविवार को शहर के इंचौली पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई। इसमें आदेश नहीं मानने, जानबूझकर धार्मिक भावनाएँ भड़काने, ग़लत कार्य करने, अशांति फैलाने वाला बयान जारी करने का आरोप है।

'एएनआई' के अनुसार डॉ. जैन ने सोमवार को कहा कि हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने विज्ञापन के लिए माफ़ी माँग ली है। उन्होंने कहा, 'सरकारी निर्देशों की पालना के लिए सभी लोगों से विज्ञापन में अपील की गई थी। इसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं था। हम माफ़ी माँगते हैं कि कुछ शब्द से लोगों की भावनाएँ आहत हुईं। हॉस्पिटल का मक़सद कभी भी किसी की भावनाएँ आहत करना नहीं है।'

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हालाँकि, एक दिन पहले ही रविवार को हॉस्पिटल के मालिक डॉ. अमित जैन ने कहा था कि विज्ञापन सांप्रदायिक नहीं था। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार जैन ने आरोप लगाया था कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश रची जा रही है। डॉ. जैन ने कहा कि वह भी उन लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराएँगे जो विज्ञापन का ग़लत मतलब निकाला। उन्होंने दावा किया कि टाइपिंग की ग़लती और मिसप्रिंट के कारण ग़लत संदेश गया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य तो जाँच को बढ़ावा देना था। जैन ने कहा, 'हॉस्पिटल किसी समुदाय के प्रति भेदभाव नहीं बरतता है। हमारे 70 फ़ीसदी मरीज़ मुसलिम हैं। टाइपिंग की ग़लती हुई थी तो हमने माफ़ी माँगी थी। टेस्ट को बढ़ावा देना हमारा मक़सद है क्योंकि एक समुदाय के कुछ लोग ग़लत सूचनाएँ फैला रहे हैं और दूसरों को टेस्ट करने में भी बाधा डाल रहे हैं। हम समाज की बेहतरी चाहते हैं।'
हाल ही में गुजरात के अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में भी धर्म के आधार पर कोरोना वार्ड बनाने की ख़बर आने के बाद ऐसा ही विवाद हुआ था। तब गुजरात सरकार ने उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। उस हॉस्पिटल के मेडिकल सुप्रींटेंडेंट डॉ. गुणवंत एच राठौड़ ने भी कहा था कि धर्म के आधार पर अलग कोरोना वार्ड नहीं बनाया गया है और उनके बयान को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है। यानी वह पिछले बयान से पूरी तरह पलट गए। इस बयान से एक दिन पहले ही 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने लिखा था कि राठौड़ ने कहा था कि 'यहाँ हमने हिंदू और मुसलिम मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए हैं।' इसके बाद विवाद थम गया। 

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