श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में चंदे के कथित गबन और गड़बड़ी के आरोपों के बीच एक पुरानी ऑडिट रिपोर्ट ने मैनेजमेंट पर नये सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। वह पुरानी ऑडिट रिपोर्ट 2020 में ट्रस्ट गठन के कुछ महीनों की है। छह साल पहले की इस रिपोर्ट ने ट्रस्ट के मैनेजमेंट को 'बेहद अनप्रोफेशनल' बता दिया था। इसने चंदे का कोई सिस्टमैटिक रिकॉर्ड न होने की बात कही थी। लेकिन 6 साल बीत जाने के बाद भी ऑडिट फर्म की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। अब ट्रस्ट पर चंदे के गबन के गंभीर आरोप लगे हैं। यूपी सरकार को SIT ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट सौंप दी है।

2020 की ऑडिट रिपोर्ट में क्या था?

ट्रस्ट का गठन फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद हुआ था। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ट्रस्ट गठन के कुछ महीने बाद ही नवंबर 2020 में एक प्राइवेट ऑडिट फर्म ने ट्रस्ट के फंड मैनेजमेंट और डेटा मैनेजमेंट की जांच की। रिपोर्ट में साफ़ चेतावनी दी गई थी कि चंदे का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं है। मैनेजमेंट का कोई साफ स्तर तय नहीं है, काम बहुत अनप्रोफेशनल तरीके से हो रहा है।
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उस ऑडिट रिपोर्ट में सुधार के लिए कई सिफारिशें भी की गई थीं। इसने कहा था कि हर लेन-देन, डेटा एंट्री और स्टाफ के लिए SOP यानी सिस्टेमैटिक ऑपरेटिंग प्रोसेस बनाना ज़रूरी है। इसने यह भी कहा था कि बिना SOP के जवाबदेही तय करना मुश्किल है और गलत जानकारी फैलने का ख़तरा रहता है। इसने कहा था कि किसी भी लेन-देन पर दूसरे या तीसरे स्तर की जांच नहीं हो रही है। ऑडिट फर्म ने कहा था कि अगर सुधार नहीं किया गया तो 'भ्रामक जानकारी' फैल सकती है और 'भ्रामक रिपोर्टिंग' हो सकती है।

2020 की उस ऑडिट रिपोर्ट को लेकर द इंडियन एक्सप्रेस ने ट्रस्ट के अकाउंटेंट और महासचिव चंपत राय से सवाल पूछे, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑडिट फर्म के एक सीनियर अधिकारी से भी संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो सकी। ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर SOP का कोई ज़िक्र नहीं है और न ही कोई इंटरनल ऑडिट रिपोर्ट उपलब्ध है।

ट्रस्ट पर अब क्या आरोप हैं?

रिपोर्टें हैं कि ट्रस्ट को अब तक क़रीब 3500 करोड़ रुपये नकद चंदे के रूप में मिले हैं, इसके अलावा सोने-चांदी के आभूषण भी चढ़ावे में आए हैं। हाल में आरोप लगे हैं कि कई आभूषण और नकद चंदा गायब है या उसका हिसाब-किताब ठीक से नहीं रखा गया।

राम मंदिर के चंदे और चढ़ावे को लेकर आरोप मुख्य रूप से दानपात्रों से जमा नकदी, सोने-चांदी के आभूषण और जेवरात की चोरी या गबन के हैं। आरोप हैं कि दानपात्रों से रोजाना आने वाले लाखों रुपये की गिनती से पहले या गिनती के दौरान हेराफेरी की गई।

कहा जा रहा है कि नोटों की गड्डियाँ कम बनाना, मंदिर से बैंक ले जाते समय चोरी या गिनती में कम दिखाने का मामला हो सकता है। अगल-अलग रिपोर्टों में 7 करोड़ से 200 करोड़ रुपये तक की राशि का गबन का अनुमान है। कुछ विपक्षी दलों के अनुमान तो इससे भी ज़्यादा के हैं।

नकद रुपये के अलावा दान में आए सोने-चांदी के सिक्के, आभूषण, सोने की गदा आदि गायब होने की रिपोर्टें भी हैं। कुछ बॉक्स बिना हिसाब के हटाए गए। असली जेवरात हटाकर नकली रखने के आरोप भी लगे हैं। इसके साथ ही यह भी रिपोर्टें हैं कि चढ़ावा गिनती वाले क्षेत्र का 7-8 महीने का सीसीटीवी फुटेज गायब किया गया है।

सुरक्षा और प्रक्रिया में लापरवाही?

बड़ा सवाल तो यह भी उठ रहा है कि चंदे और चढ़ावे के रुपये को गिनती करने का काम एसबीआई जैसे बैंकों की जगह प्राइवेट एजेंसी को दिया गया। आरोप लग रहे हैं कि कर्मचारियों की भर्ती में भाई-भतीजावाद किया गया। सिक्योरिटी चेक, फ्रिस्किंग, ड्रेस कोड और वाहन मूवमेंट में चूक के भी आरोप लग रहे हैं।

पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह ने भी काफी पहले ही हेराफेरी की शिकायत की थी। लेकिन 7 जून को जब अखिलेश यादव ने आरोप लगाया तो राजनीतिक विवाद बढ़ा। ट्रस्ट ने आंतरिक जाँच की और यूपी सरकार से एसआईटी गठित करने की मांग की। फिर 13 जून को सीएम योगी ने 3 सदस्यीय एसआईटी गठित की। एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट में कई स्तरों पर लापरवाही पाए जाने की बात सामने आ रही है। अभी तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।

अब कहा जा रहा है कि यदि 2020 में ही ऑडिट रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल किया गया होता तो आज की यह गड़बड़ी टाली जा सकती थी।

राम मंदिर से जुड़ा ममला बेहद संवेदनशील

यह विवाद राम मंदिर के भक्तों और पूरे देश के लिए संवेदनशील है क्योंकि करोड़ों लोगों ने भक्ति और विश्वास के साथ चंदा दिया था। ऑडिट रिपोर्ट दिखाती है कि समस्या नई नहीं है, बल्कि शुरू से ही प्रबंधन में कमियां थीं, जिन्हें दूर नहीं किया गया। अब SIT की जांच रिपोर्ट और ट्रस्ट के जवाब का इंतजार है।