उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की बहुचर्चित पुलिस एनकाउंटर नीति पर अब सत्ताधारी एनडीए (NDA) गठबंधन के भीतर से ही गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। 4 जून 2026 को गाजीपुर में हुए एक पुलिस एनकाउंटर के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य पालन मंत्री और भाजपा के प्रमुख सहयोगी दल 'निषाद पार्टी' (NISHAD Party) के अध्यक्ष संजय निषाद ने इस घटना को लेकर सरकार की नीति पर उंगली उठाई है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

4 जून 2026 को गाजीपुर में पुलिस ने हत्या के आरोपी कमलेश बिंद को एक एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया। पुलिस के अनुसार, कमलेश बिंद एक होटल व्यवसायी के बेटे की हत्या का आरोपी थे। जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने गई, तो उन्होंने फायरिंग कर दी। भागने की कोशिश के दौरान दोबारा हुई गोलीबारी में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में बिंद के सीने में गोली लगी और अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई। इस झड़प में एक पुलिसकर्मी के भी घायल होने की बात कही गई।

ग़ाज़ीपुर के लोग इसे फर्जी एनकाउंटर क्यों बता रहे हैं

हालांकि, कमलेश बिंद के परिवार और स्थानीय निवासियों ने पुलिस के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उनका आरोप है कि यह एक "फर्जी एनकाउंटर" (Staged Encounter) है। परिवार का कहना है कि पुलिस ने बिंद को पहले ही सार्वजनिक रूप से हिरासत में ले लिया था और बाद में उनकी हत्या कर दी। इस घटना के बाद ग़ाज़ीपुर में भारी तनाव फैल गया और उग्र भीड़ ने शव को ले जा रही पुलिस टीम पर हमला भी कर दिया था। कमलेश के शव को जब वहां से ले जाया जा रहा था तो सैकड़ों लोगों की भीड़ वहां जुट गई थी और उसने खुलकर पुलिस के खिलाफ नारेबाज़ी की।

बीजेपी के सहयोगी दल निषाद पार्टी की आपत्ति क्या है

इस घटना के बाद बिंद समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया, जिसका सीधा राजनीतिक असर संजय निषाद की पार्टी पर पड़ा। निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने सीधे तौर पर पुलिस को पूरी तरह दोषी तो नहीं ठहराया, लेकिन उन्होंने इस एनकाउंटर को "अमानवीय" करार दिया और कानूनी प्रक्रिया (Due Process) के उल्लंघन पर चिंता जताई। हालांकि निषाद पार्टी के बाकी नेता पुलिस पर तमाम आरोप लगा रहे हैं।

संजय निषाद के मुख्य बयान और आपत्तियां

संजय निषाद ने मीडिया से बातचीत में कहा, "अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, आरोपी को आत्मसमर्पण करने और अदालत में अपना बचाव करने का मौका मिलना चाहिए। न्याय देना न्यायपालिका का काम है, जबकि पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना और केवल आत्मरक्षार्थ (Self-defence) कार्रवाई करना है।"

'ठोक देंगे' वाली बात पर सरकार को चेतावनी  

उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार की जो सख्त "ठोक देंगे" वाली छवि बनी हुई है, वह हमेशा राजनीतिक फायदा नहीं दे सकती। यदि ऐसी घटनाओं से जनता में संदेह पैदा होता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
राजनीतिक दबाव और चुनावी नुकसान का जिक्र: निषाद ने 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के भीतर एनडीए की सीटों में आई भारी गिरावट (60 से घटकर 36 होना) का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सुशासन को लेकर जनता की धारणा ही चुनावी नतीजों को तय करती है। बिंद समुदाय के लोगों ने उनके घर का घेराव भी किया, जिस पर उन्होंने कहा, "अगर समाज हमारे साथ नहीं रहेगा, तो हम कैसी राजनीति करेंगे? हमें अपने समाज की आवाज उठानी होगी।"
संजय निषाद ने इस संबंध में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र लिखा है और व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर इस एनकाउंटर की निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच कराने की पुरजोर मांग की है।

एनकाउंटर नीति पर विपक्ष हमलावर- 'जाति धर्म देखकर मुठभेड़'

इस विवाद को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और अन्य विपक्षी दलों ने योगी सरकार पर हमला किया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर राजनीतिक सुविधा और जाति-धर्म देखकर किए जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने कहा: "सच तो यह है कि राजनीतिक सुविधा के अनुसार फर्जी एनकाउंटर किए जा रहे हैं। भाजपा सरकार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समुदाय को डराना चाहती है और उनके अधिकारों से वंचित करना चाहती है। उत्तर प्रदेश में व्यक्ति की जाति और धर्म देखकर एनकाउंटर किए जाते हैं, जो कि एक असफल सरकार की पहचान है।"
अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार कानून के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म करके भय का माहौल बनाना चाहती है और त्वरित न्याय के नाम पर हिंसा को सामान्य रूप दे रही है।

भाजपा का बचाव

इन तमाम आरोपों और आंतरिक मतभेदों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जाति या राजनीति के आधार पर एनकाउंटर करने के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। भाजपा और सरकारी अधिकारियों का रुख हमेशा की तरह साफ है कि पुलिस केवल अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, चाहे उनकी पहचान कुछ भी हो। सरकार के अनुसार, ये मुठभेड़ें केवल तब होती हैं जब अपराधी पुलिस पर हथियार उठाते हैं या भागने की कोशिश करते हैं और ये सभी मामले कानूनी और न्यायिक जांच के दायरे से गुजरते हैं।

यूपी में रोज़ाना 5 एनकाउंटर

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के कार्यकाल के दौरान औसतन हर दिन करीब 5 पुलिस एनकाउंटर दर्ज किए गए हैं, जिसे सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती रही है। लेकिन गाजीपुर का यह मामला इसलिए बेहद संवेदनशील बन गया है क्योंकि इस बार विरोध केवल विपक्ष की तरफ से नहीं, बल्कि सरकार के भीतर मौजूद एक ऐसे सहयोगी दल की तरफ से आया है जिसका आधार सीधा उस समाज (पिछड़े/निषाद/बिंद समाज) से जुड़ा है, जो एनडीए का बड़ा वोट बैंक है।

कानून व्यवस्था की आड़ में एनकाउंटर

उत्तर प्रदेश (UP) में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की "जीरो टॉलरेंस नीति" के तहत पुलिस एनकाउंटर कानून-व्यवस्था का एक बड़ा चेहरा बन चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में 17,000 से अधिक पुलिस मुठभेड़ हो चुकी हैं, जिनमें 289 से अधिक आरोपी मारे गए और 11,000 से अधिक घायल हुए हैं। एक तरफ जहां सरकार इसे अपराध खत्म करने का प्रभावी फॉर्मूला बताती है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठनों, न्यायपालिका और अब सरकार के अपने सहयोगियों (जैसे निषाद पार्टी) की तरफ से भी इस नीति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

एक जैसे पैटर्न (Scripted FIRs) पर कोर्ट की आपत्ति

हाईकोर्ट और कानूनी विश्लेषकों ने पाया है कि यूपी पुलिस की लगभग हर एनकाउंटर एफआईआर (FIR) की कहानी एक जैसी होती है, जिसे आलोचक "कॉपी-पेस्ट थ्योरी" कहते हैं।
पैटर्न: पुलिस चेकिंग के दौरान संदिग्ध को रोकती है ➔ संदिग्ध पुलिस पर फायरिंग कर भागने की कोशिश करता है ➔ पुलिस आत्मरक्षार्थ (Self-defence) जवाबी फायरिंग करती है ➔ गोली सीधे आरोपी के पैर में या छाती पर लगती है ➔ पुलिसकर्मी की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी एक गोली लगती है जिससे वह बच जाता है।
अदालत का रुख: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस तय ढर्रे (Routine Feature) पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा था कि "पुलिस कोई जज या जल्लाद नहीं है और यूपी को पुलिस स्टेट नहीं बनने दिया जा सकता।"

'हाफ एनकाउंटर' (पैर में गोली मारना) का नया ट्रेंड

यूपी में 'हाफ एनकाउंटर' यानी अपराधियों के पैर में गोली मारकर उन्हें लंगड़ा करने की घटनाएं बेहद आम हो चुकी हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस किसी आरोपी को गिरफ्तार करने के बाद या आत्मसमर्पण के बावजूद अपनी बहादुरी दिखाने और जनता में "त्वरित न्याय" का संदेश देने के लिए जानबूझकर पैर में गोली मारती है। पूर्व महानिदेशकों (DGP) के अनुसार, यह प्रथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई कानूनी प्रक्रिया (Due Process) का मखौल उड़ाती है।

जातिगत और राजनीतिक भेदभाव के आरोप

विपक्ष और स्थानीय समुदायों का आरोप है कि एनकाउंटर की लिस्ट निष्पक्ष नहीं है। समाजवादी पार्टी समेत विपक्ष का आरोप है कि एनकाउंटर करते समय आरोपी की जाति और धर्म देखा जाता है। गाजीपुर में हुए कमलेश बिंद के एनकाउंटर के बाद, बीजेपी की सहयोगी 'निषाद पार्टी' के प्रमुख संजय निषाद ने खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा कि "ठोक देंगे" की नीति से समाज का भरोसा उठ रहा है और बेगुनाह इसका शिकार बन रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट और NHRC की गाइडलाइंस का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में एनकाउंटर को लेकर 16 सूत्रीय कड़े दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी किए थे, जैसे:
  • हर एनकाउंटर के बाद उसकी स्वतंत्र एजेंसी (CID या किसी दूसरे थाने) से जांच होनी चाहिए।
  • मजिस्ट्रेट जांच (Magisterial Inquiry) अनिवार्य है।
  • घटना के तुरंत बाद शामिल पुलिसकर्मियों को कोई आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जा सकता जब तक बहादुरी पूरी तरह साबित न हो जाए।
  • विवाद की वजह: आलोचकों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर इन गाइडलाइंस को महज कागजी खानापूर्ति बनाकर छोड़ दिया जाता है और पुलिसकर्मियों को तुरंत 'पुरस्कृत' कर दिया जाता है, जिससे फर्जी एनकाउंटर को बढ़ावा मिलता है।

क्या "त्वरित न्याय" से लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरा है

उत्तर प्रदेश के कई पूर्व डीजीपी (जैसे सुलखान सिंह और विभूति नारायण राय) ने हाल ही में चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि समाज में एनकाउंटर और बुलडोजर जैसी कार्रवाइयों को "मजबूत इच्छाशक्ति" मानकर जो सामाजिक स्वीकार्यता मिल रही है, वह वास्तव में "मध्ययुगीन बर्बरता" है।
इन लोगों का कहना है कि जब पुलिस ही जज, जूरी और जल्लाद की भूमिका निभाने लगेगी, तो देश की अदालतें और न्याय प्रणाली अप्रासंगिक हो जाएंगी। संविधान के तहत हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का अधिकार है, जिसे एनकाउंटर पूरी तरह खत्म कर देते हैं।