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राम मंदिर शिलान्यास समारोह में मौजूद उमा भारती

मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की वरिष्ठ नेता उमा भारती राम मंदिर शिलान्यास समारोह में भाग लेंगी।

उन्होंने इसके पहले कहा था कि वह कोरोना की वजह से शिलान्यास समारोह से दूर रहेंगी। पर बुधवार की सुबह उन्होंने ट्वीट किया कि वह इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगी क्योंकि 'राम की मर्यादा से बंधी' हैं।

इसके पहले उमा भारती ने यह ऐलान कर सबको चौंका दिया था कि वह कोरोना संक्रमण की वजह से राम मंदिर शिलान्यास समारोह में भाग नहीं लेगीं, लेकिन सरयू नदी के तट पर एक दूसरे कार्यक्रम में शिरकत करेंगी। 
यह चौंकाने वाली घोषणा इसलिए थी कि वह राम मंदिर आन्दोलन से जुड़ी हुई रही हैं। 

मामला क्या है?

उमा भारती के इस रुख ने सबको हैरान कर दिया था। क्या यह उनका सांकेतिक विरोध था? कोरोना से ऐसा डर तो नहीं हो सकता! नेता आज भी लोगों से मिल रहे हैं, सरकारें बनाने, बिगाड़ने का खेल भी इस दौरान हुआ था और ख़ास तौर पर मध्य प्रदेश में भी हुआ था। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया गया था और बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने थे। उमा भारती इस प्रक्रिया में शामिल भी रहीं, विधायकों से मिलने-जुलने की उनकी ख़बरें भी मीडिया में आयीं। कांग्रेस के बाग़ी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी वे मिलीं थीं। 
उमा भारती की यह बात किसी को हजम नहीं हुई थी कि कोरोना संक्रमण की किसी आशंका के कारण राम मंदिर शिलान्यास के ऐतिहासिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हो रही हैं।
उमा भारती ने दो टूक शब्दों में यह कह कर लोगों को हैरान कर दिया था कि 'राम' अयोध्या या भारतीय जनता पार्टी की बपौती नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'राम सबके हैं, पूरे विश्व के हैं, जो राम को मानते हों, वे चाहे किसी भी धर्म, किसी भी संप्रदाय, विश्व के किसी भी देश, या किसी भी पार्टी के हों। राम उन सबके हैं जो राम को मानते हैं उनमें आस्था रखते हैं। हम यदि राम के ऊपर अपना पेटेंट या एकाधिकार ज़माना चाहते हैं, तो यह हमारा अहंकार है, हमारी भूल है। राम अविनाशी हैं, राम का अंत नहीं, हमारा अंत है!'
राम मंदिर के आयोजन को लेकर उमा भारती का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जिस दौर में यह आंदोलन परवान चढ़ा था, आज सत्ता में बैठे अधिकांश नेता उस समय बीजेपी की दूसरी पंक्ति के भी नहीं माने जाते थे। उमा भारती 'राम मंदिर निर्माण' को यज्ञ बोलती थीं और उसके लिए प्राणों की सहर्ष आहुति देने की बात करती थीं। उनकी राजनीतिक पहचान ही राष्ट्रीय स्तर पर राम जन्म भूमि आंदोलन के दम पर बनी।

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