यूपी चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस ने सपा को 180 सीटों की सूची सौंपी। इस पर मंथन चल रहा है। सीट बंटवारे पर खींचतान के बीच ओवैसी ने मुस्लिम नेतृत्व का मुद्दा उठाया, जबकि बीजेपी नये चेहरों की तलाश में जुटी हुई है। सर्वे चल रहे हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विपक्षी गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच खींचतान तेज हो गई है। कांग्रेस ने सपा को 180 विधानसभा सीटों की सूची सौंपी है, लेकिन समाजवादी पार्टी चाहती है कि कांग्रेस पहले उन सीटों पर जीतने योग्य उम्मीदवारों के नाम और उनकी चुनावी क्षमता का ब्योरा दे। कांग्रेस इसे अनुचित मांग बता रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस के भीतर 80 से 90 सीटों पर समझौते की संभावना भी जताई गई है।
इस बीच, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों से नेहरू-गांधी और यादव परिवारों के नेतृत्व पर निर्भर रहने के बजाय अपना स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व विकसित करने की अपील की है। तेलंगाना कांग्रेस ने ओवैसी के इस बयान पर पलटवार किया है। भाजपा भी 2027 के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन और संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
इन घटनाक्रमों से साफ है कि उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की लड़ाई केवल भाजपा बनाम विपक्ष तक सीमित नहीं है। विपक्ष के भीतर सीटों, नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों को लेकर भी मुकाबला चल रहा है।
कांग्रेस की 180 सीटों की सूची, लेकिन अंतिम मांग नहीं
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत में दोनों पक्षों की अपेक्षाओं का अंतर सामने आया है। कांग्रेस ने 180 विधानसभा सीटों की सूची सपा को सौंपी है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम इससे पहले लगभग 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात भी कह चुके हैं। हालांकि, कांग्रेस की इस सूची को अंतिम मांग नहीं माना जा रहा है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रदेश नेतृत्व को सीटों की कुल संख्या पर अड़े रहने के बजाय उन सीटों की गुणवत्ता और जीतने की संभावना पर ध्यान देने की सलाह दी है।रिपोर्ट के अनुसार, प्रियंका गांधी ने 19 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के साथ बैठक की थी। इसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा, कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद और राजेंद्र पाल गौतम शामिल थे। बैठक में सीट बंटवारे पर बातचीत की रणनीति पर चर्चा हुई। कांग्रेस के एक सूत्र ने बताया कि 180 सीटों की सूची बातचीत शुरू करने के लिए दी गई है। पार्टी के भीतर यह भी संभावना जताई गई कि अंततः 80 से 90 सीटों पर समझौता हो सकता है।
कांग्रेस ने सीटों को A, B, C और D श्रेणियों में बांटा है। यह वर्गीकरण पार्टी की संगठनात्मक स्थिति, संभावित उम्मीदवारों और चुनावी संभावनाओं के आकलन पर आधारित है।
सपा की शर्त: पहले बताइए कौन उम्मीदवार जीत सकता हैः समाजवादी पार्टी कांग्रेस को बड़ी संख्या में सीटें देने को लेकर सतर्क है। सपा नेताओं का तर्क है कि केवल सीटों की सूची देने से गठबंधन मजबूत नहीं होगा। कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि वह किन सीटों पर किस तरह के उम्मीदवार उतार सकती है और उनकी जीतने की संभावना कितनी है।
सपा को आशंका है कि यदि कांग्रेस को अधिक सीटें दे दी गईं और उसने कमजोर उम्मीदवार उतारे, तो नुकसान केवल कांग्रेस को नहीं बल्कि पूरे विपक्षी गठबंधन को होगा। इसका आधार सपा नेता 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को बताते हैं। उस चुनाव में कांग्रेस ने अकेले 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे केवल दो सीटें मिली थीं। उसका वोट प्रतिशत 2.33 रहा था। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी ने 111 सीटें जीती थीं और उसका वोट प्रतिशत लगभग 36 था।
सपा का कहना है कि वह कांग्रेस को उन सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर देने के पक्ष में है जहां उसकी जीतने की वास्तविक संभावना हो। लेकिन कांग्रेस को संभावित उम्मीदवारों की जानकारी देने के लिए कहना पार्टी के भीतर विवाद का विषय बन गया है। कांग्रेस के एक सांसद ने इस मांग पर आपत्ति जताते हुए इसे अनुचित बताया। कांग्रेस का तर्क है कि उम्मीदवारों के नाम और सीटों के चयन की प्रक्रिया पार्टी का आंतरिक मामला है तथा बातचीत में केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
एक दर्जन सीटों पर फंस सकता है पेंचः सीट बंटवारे में एक और बड़ी समस्या उन लगभग 12 विधानसभा सीटों को लेकर बताई जा रही है, जहां फिलहाल समाजवादी पार्टी के विधायक हैं, लेकिन कांग्रेस ने अपनी सूची में इन सीटों को भी शामिल किया है। कांग्रेस का दावा है कि इन सीटों पर उसके पास बेहतर उम्मीदवार हैं और वह जीतने की स्थिति में हो सकती है। दूसरी ओर, सपा नेताओं के लिए अपनी मौजूदा सीटें छोड़ना मुश्किल हो सकता है।
समाजवादी पार्टी के सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव कांग्रेस को 100 से कम सीटें देने के पक्ष में हैं। पार्टी के भीतर 50 से 80 सीटों के बीच समझौते की संभावना पर भी चर्चा होने की बात सामने आई है। इस तरह कांग्रेस की 180 सीटों की सूची और सपा की संभावित पेशकश के बीच बड़ा अंतर है। हालांकि, दोनों दलों के शीर्ष नेताओं का मानना है कि गठबंधन को टूटने नहीं देना चाहिए।
प्रियंका गांधी की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
कांग्रेस की ओर से सीट बंटवारे की बातचीत में प्रियंका गांधी वाड्रा की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 13 अक्टूबर को राहुल गांधी के आवास पर आयोजित मुलाकात के दौरान सपा सांसद राजीव राय ने प्रियंका गांधी से कांग्रेस की संभावित सीटों की सूची साझा करने का आग्रह किया था। इसके बाद प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के साथ बैठक की और बातचीत को आगे बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा की।कांग्रेस का एक वर्ग मानता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन ने उसे उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक स्थिति सुधारने का अवसर दिया है। उस चुनाव में कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीती थीं, जबकि सपा ने 37 सीटें हासिल की थीं। भाजपा को 33 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के लिए यही प्रदर्शन सपा के साथ बातचीत में एक महत्वपूर्ण आधार है। पार्टी का कहना है कि दोनों दलों ने मिलकर भाजपा को चुनौती दी थी, इसलिए विधानसभा चुनाव में भी उसे उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। हालांकि, विधानसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस के लिए चुनौती बने हुए हैं। 2017 में सपा के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सात सीटें जीती थीं। 2022 में अकेले चुनाव लड़ने पर पार्टी केवल दो सीटें जीत सकी।
राहुल गांधी, सामाजिक न्याय और कांग्रेस की नई रणनीति
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में दलितों, अल्पसंख्यकों और गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का मानना है कि संविधान, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे उसके लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं। कांग्रेस बलिया से मेरठ तक यात्रा निकालने की योजना पर भी काम कर रही है। इस यात्रा के जरिए पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों में राजनीतिक संपर्क बढ़ाने तथा संगठन को मजबूत करने का लक्ष्य है। पार्टी सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में संगठन मजबूत करने के लिए संगठन सृजन अभियान भी चला रही है।कांग्रेस उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को भी अधिक सख्त बनाने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने पर विचार हो रहा है जिनकी स्थानीय स्तर पर अच्छी पहचान हो और जो चुनाव प्रचार का खर्च उठाने में सक्षम हों। हालांकि, मजबूत जनाधार वाले साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों के लिए अपवाद रखने की बात भी कही गई है। यह रणनीति 2022 के चुनाव के अनुभव से जुड़ी बताई जा रही है, जब कांग्रेस ने कई उम्मीदवारों को प्रचार के लिए धन दिया था, लेकिन पार्टी के भीतर कुछ उम्मीदवारों के खर्च और चुनाव के प्रति गंभीरता को लेकर शिकायतें सामने आई थीं।
ओवैसी ने मुस्लिम नेतृत्व पर उठाया सवाल
कांग्रेस और सपा के बीच सीटों को लेकर विवाद के समानांतर असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया है।ओवैसी ने मुसलमानों से नेहरू-गांधी और यादव परिवारों के नेतृत्व पर निर्भर रहने के बजाय अपने समुदाय से स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करने की अपील की है। उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए खुद के नेताओं को आगे लाना चाहिए। ओवैसी की यह अपील सीधे तौर पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की राजनीति को चुनौती देती है। उत्तर प्रदेश में सपा लंबे समय से मुस्लिम-यादव गठजोड़ को अपनी चुनावी ताकत का प्रमुख आधार मानती रही है। कांग्रेस भी अल्पसंख्यक मतदाताओं के समर्थन को महत्वपूर्ण मानती है।ओवैसी की रणनीति है कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच एआईएमआईएम को एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया जाए। वह सपा पर मुस्लिम नेताओं और विधायकों के प्रदर्शन को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि, ओवैसी ने भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की है। उनकी पार्टी राजनीतिक हिस्सेदारी और सम्मानजनक साझेदारी की शर्त पर गठबंधन की बात करती रही है। इससे उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का समीकरण और जटिल हो सकता है। यदि एआईएमआईएम कई सीटों पर उम्मीदवार उतारती है, तो कुछ क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को लेकर सपा और कांग्रेस के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
तेलंगाना कांग्रेस का ओवैसी पर पलटवार
ओवैसी की मुस्लिम नेतृत्व संबंधी अपील पर तेलंगाना कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। तेलंगाना कांग्रेस नेता मोहम्मद वलीउल्लाह समीर ने आरोप लगाया कि ओवैसी उत्तर प्रदेश में जिस राजनीतिक मॉडल की वकालत कर रहे हैं, उसे उन्होंने अपने गृह राज्य तेलंगाना में उसी तरह लागू नहीं किया है। समीर का सवाल है कि यदि ओवैसी मुस्लिम समुदाय के स्वतंत्र नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो तेलंगाना में एआईएमआईएम ने अपने पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों से बाहर कितने स्वतंत्र मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाया है?
कांग्रेस नेता के मुताबिक, 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने 119 में से केवल नौ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि बाकी क्षेत्रों में मुस्लिम नेतृत्व को अवसर क्यों नहीं दिया गया। समीर ने यह भी आरोप लगाया कि एआईएमआईएम ने जिन सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारे, उनमें से कई पर उसने भारत राष्ट्र समिति का समर्थन किया। उनके अनुसार, ओवैसी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीतिक स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं, लेकिन तेलंगाना में दूसरे दलों के लिए राजनीतिक जगह छोड़ते रहे हैं। यह कांग्रेस नेता का राजनीतिक आरोप है। ओवैसी और एआईएमआईएम की ओर से इस विवाद पर प्रतिक्रिया को इस रिपोर्ट में स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया गया है। इस विवाद ने मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर एक नई बहस खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि क्या समुदाय की राजनीतिक ताकत बड़े विपक्षी दलों के साथ गठबंधन से बढ़ेगी या स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व खड़ा करने से।
भाजपा की टिकट रणनीति भी महत्वपूर्णः उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने भी 2027 में सत्ता बरकरार रखने की चुनौती होगी। पार्टी के लिए उम्मीदवारों का चयन, मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति और टिकट नहीं मिलने पर संभावित असंतोष महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे।
भाजपा की चुनावी रणनीति के संदर्भ में जिला और स्थानीय स्तर से फीडबैक जुटाने तथा संभावित उम्मीदवारों की समीक्षा को अहम माना जा रहा है। ऐसी प्रक्रिया का उद्देश्य उन उम्मीदवारों की पहचान करना है जिनकी स्थानीय पकड़ मजबूत हो और जो पार्टी के लिए सीट जीतने की संभावना बढ़ा सकें। टिकट वितरण के दौरान मौजूदा विधायकों और दूसरे दावेदारों के बीच संतुलन बनाना भी पार्टी के लिए जरूरी होगा। यदि किसी विधायक का टिकट काटा जाता है, तो स्थानीय स्तर पर बगावत या दूसरे दलों में जाने की संभावना पैदा हो सकती है। हालांकि, भाजपा की टिकट रणनीति से संबंधित उपलब्ध सामग्री के आधार पर संभावित टिकट कटने वाले विधायकों के नाम या बगावत की कोई निश्चित संख्या बताना उचित नहीं होगा। उम्मीदवारों के चयन और अंतिम टिकट वितरण पर पार्टी का आधिकारिक निर्णय सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
2027 में विपक्ष के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, सपा और एआईएमआईएम की रणनीतियां कई स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
- पहली चुनौती कांग्रेस और सपा के बीच सीट बंटवारे की है। यदि दोनों दल अपनी मांगों में लचीलापन नहीं दिखाते, तो गठबंधन के संयुक्त चुनाव अभियान पर असर पड़ सकता है।
- दूसरी चुनौती मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की है। ओवैसी की अपील सपा और कांग्रेस को अपने समर्थक वर्गों के बीच राजनीतिक हिस्सेदारी पर अधिक स्पष्ट रुख अपनाने के लिए मजबूर कर सकती है।
- तीसरी चुनौती भाजपा की है, जिसे उम्मीदवारों के चयन और स्थानीय संगठन में असंतोष को नियंत्रित करते हुए सत्ता विरोधी रुझानों का सामना करना होगा।
सीटों का समझौता या विपक्षी एकता की परीक्षा?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे की बातचीत विपक्षी एकता की पहली बड़ी परीक्षा बनती जा रही है। कांग्रेस की 180 सीटों की सूची से सपा असहज है, जबकि कांग्रेस इसे बातचीत की शुरुआत मान रही है। 80 से 90 सीटों पर संभावित समझौते का संकेत बताता है कि अंतिम फैसला शुरुआती मांग से काफी अलग हो सकता है।ओवैसी की मुस्लिम नेतृत्व की अपील ने इस राजनीतिक बहस में एक और आयाम जोड़ दिया है। वहीं, भाजपा की उम्मीदवार चयन रणनीति यह संकेत देती है कि सत्तारूढ़ दल भी चुनावी तैयारी में पीछे नहीं रहना चाहता। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि कांग्रेस और सपा सीटों की संख्या के बजाय जीतने की संभावना पर सहमति बना पाती हैं या नहीं। यही तय करेगा कि 2027 में विपक्ष भाजपा को कितनी प्रभावी चुनौती दे पाएगा।