UP Assembly Election 2027 से पहले विपक्षी दलों के बीच तालमेल की कमी साफतौर पर नज़र आ रही है। सपा और कांग्रेस के नेता सीटों के बंटवारे पर बयान देते नहीं थक रहे। BSP परिवार के झगड़े से जूझ रही है। ऐसे में क्या विपक्ष बीजेपी को चुनौती दे पाएगा?
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच एक छद्म युद्ध चल रहा है। विधान सभा का अगला चुनाव कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, इसको लेकर हवा में तीर फेंके जा रहे हैं। कभी कोई कांग्रेसी, फ़रमान देता है कि 150 से एक भी कम नहीं। तो कोई समाजवादी चुनौती देता है कि 25 से ज़्यादा लेकर दिखाओ। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव पी डी ए अर्थात् पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के दम पर बी जे पी को पछाड़ने की उम्मीद कर रहे है। कांग्रेस जानती है कि समाजवादी पार्टी के बिना उसका गुजारा नहीं है फिर भी उसे ब्राह्मण, दलित और मुसलमान के पुराने गठजोड़ के दिन वापस लौटने की उम्मीद है। विपक्ष की तीसरी शक्ति बहुजन समाज पार्टी भी दलित, अति पिछड़ा, मुसलमान और ब्राह्मण के 2006 वाले समीकरण की वापसी की उम्मीद में जी रही है, जब उसे किसी बड़ी पार्टी को साथ लिए बिना विधानसभा में बहुमत मिल गया था।
तीनो ही पार्टियां मोदी - योगी युग में 2017 के बाद बदले हालात से बेख़बर नहीं हैं। उन्हें मालूम है कि अति पिछड़े और अति दलितों का एक बड़ा हिस्सा बी जे पी की तरफ़ खिसक चुका है और उसके बिना कोई चुनाव जीतना आसान नहीं है। यही तीन पार्टियां हैं जो 2027 के विधानसभा चुनाव में बी जे पी को चुनौती दे सकती हैं। चुनाव अगले साल अप्रैल - मई में होंगे। इस हिसाब से करीब छह महीने का ही समय बचा है। लेकिन अब तक विपक्षी पार्टियों की कोई रणनीति सामने नहीं आयी है।
गठबंधन और जीत का आंकड़ा
पिछले चुनावों के नतीजे साफ़ बताते हैं कि अकेले दम पर बी जे पी को चुनौती देना किसी एक पार्टी के बस में नहीं है। फिर भी ऐसा लगता है कि विपक्षी पार्टियों के नेता अपने व्यक्तिगत दंभ के शिकार हैं या फिर किसी चमत्कार की उम्मीद में जी रहे हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी 2022 का विधानसभा चुनाव अलग अलग लड़ी। कांग्रेस ने प्रदेश की कुल 403 सीटों में से 399 पर उम्मीदवार उतारे। लेकिन जीती महज 2 सीटें। 387 यानी लगभग 97% सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस को कुल 21 लाख 51 हजार यानी कुल वैध मतों का लगभग 2.4 प्रतिशत वोट मिले।
समाजवादी पार्टी 347 सीटों पर लड़ी और 111 सीटें जीतने में कामयाब रही। उसकी सहयोगी छोटी छोटी पार्टियो को भी 14 सीटें मिली। बी एस पी सभी 403 सीटों पर लड़ी और सिर्फ एक सीट जीत पायी।290 यानी लगभग 72% सीटों पर उसके उम्मीदवारों की भी जमानत जब्त हो गयी।बी एस पी को एक करोड़ 18 लाख (कुल वैध मतों का लगभग 13%) वोट मिला। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक साथ आ गए तो नतीजे बदल गए। इस चुनाव में प्रदेश की 80 सीटों में से समाजवादी पार्टी 62 सीटों पर लड़ी और 37 सीटें जीतने में कामयाब रही। समाजवादी पार्टी को लगभग 2 करोड़ 95 लाख वोट मिले और उसका वोट शेयर लगभग 34 प्रतिशत हो गया।
कांग्रेस 17 सीटों पर लड़ी और 6 सीटें जीतने में कामयाब रही। पार्टी का वोट बढ़ कर लगभग 83 लाख हो गया (वोट शेयर लगभग 9.53%)। बी एस पी 79 सीटों पर लड़ी लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई। उसका वोट घट कर लगभग 82 लाख हो गया। (वोट शेयर लगभग 9.46%)। उसके 69 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी। 2019 के लोकसभा चुनाव में बी एस पी और समाजवादी पार्टी साथ मिलकर लड़े तब बी एस पी को 10 और समाजवादी पार्टी को 5 सीटें मिली थी। इन आंकड़ों से साफ़ है कि बी जे पी को असली चुनौती समाजवादी पार्टी, कांग्रेस , और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन ही दे सकता है। उसकी संभावना बहुत कम है।
अल्पसंख्यक फैक्टर पर प्रहार
उत्तर प्रदेश में हार जीत के फैसले में लंबे समय तक अल्पसंख्यक मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। प्रदेश में सबसे ज़्यादा आबादी क़रीब 19 प्रतिशत मुसलमानों की है। कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा उम्मीद अल्पसंख्यकों से है। लेकिन उनका वोट हर बार बंट जाता है। पिछले कुछ चुनावों के नतीजे बताते हैं कि बहुजन समाज पार्टी से अल्पसंख्यकों का मोहभंग हो चुका है। लेकिन प्रदेश की राजनीति में ए आई एम आई एम का प्रवेश चुनाव के पहले भ्रम फैलाने के लिए काफ़ी है। ये पार्टी चुनाव जीतती नहीं है लेकिन ग़ैर बी जे पी उम्मीदवारों के लिए माहौल ख़राब ज़रूर करती हैं। पसमांदा यानी ग़रीब वर्ग के मुसलमानों को अलग वोट बैंक बनाने की कोशिश नाकामयाब हो चुकी है। अब बी जे पी उसे इस्तेमाल करके विपक्षी वोट को बांटने की कोशिश में जुटी है।
एम वाई यानी मुसलमान - यादव गठबंधन भी अब चुनाव जिताने का फ़ार्मूला नहीं रह गया है। अति पिछड़ों और अति दलितों की छोटी छोटी पार्टियां और नेता खड़े हो गए हैं। उनका झुकाव बी जे पी की ओर दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी के लिए ये एक बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पा रही है। हाल में पार्टी संगठन में फेर बदल करके एक सवर्ण की जगह दूसरे सवर्ण को अध्यक्ष बना दिया गया। बी जे पी से थोड़ी बहुत नाराजगी के बावजूद ब्राह्मण उसका साथ छोड़ेंगे इसमे संदेह है। राहुल गांधी बात तो पिछड़ों और दलितों की करने लगे हैं लेकिन जब नेतृत्व की बात आती है तो कांग्रेस चूक जाती है।
बीएसपीः दिल्ली से दौलताबाद
मध्यकालीन भारत में एक राजा हुए। तुगलक। उसकी पूरी जिंदगी देश की राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद और फिर दौलताबाद से दिल्ली लाने में खप गया। बी एस पी में तुगलकी फ़रमान का दौर भी चल रहा है। सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद सुबह पार्टी से बाहर कर दिए जाते है। और शाम को फिर पार्टी के संयोजक बना दिए जाते है। न जाने कितनी बार इस कहानी को दोहराया गया है। राजनीति के पंडित जब तक आकाश आनंद को पार्टी से बाहर करने का कारण समझने की कोशिश करते हैं तब तक वो फिर पार्टी के शीर्ष पर बैठा दिए जाते हैं। पार्टी सुप्रीमो मायावती भयानक दुविधा के दौर से गुजर रही हैं। एक दुविधा अखिलेश के भीतर भी दिखाई दे रही है। कांग्रेस या कांग्रेस के बगैर।कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चुनाव का कमान प्रियंका गांधी के हाथ में देकर भी कुछ कर नहीं पायी। लेकिन पुराना दंभ अब भी दिखाई देता है।
जितनी संख्या उतना हिस्सा
इन सब के बीच बी जे पी अपना रास्ता आसान करने में लगी है। राज्य सभा के लिए टिकट भी बांटे तो राज्य के जातीय समीकरण का पूरा ध्यान रखा। उसकी सूची में ब्राह्मण और राजपूत भी हैं। पिछड़े और दलित के साथ महिला मतदाताओं को साधने का पूरा इंतज़ाम है। जिसकी जितनी संख्या उसका उतना हिस्सा। नारा तो ये समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया का था, लेकिन बी जे पी ने समझ लिया है कि चुनाव जीतने का सटीक फ़ार्मूला इसी समीकरण में है।
पूरे विपक्ष को एस आई आर और मुख्य चुनाव आयुक्त से जंग में फंसाकर बी जे पी तीसरी बार जीत की तैयारी में है। पेपर लीक से नाराज जेन जी या महंगाई से परेशान आम लोग के लिए अंततः जाति के चक्रव्यूह से निकलना मुश्किल है। बी जे पी का पूरा चुनावी ताना बाना इसके इर्द गिर्द ही रचा जा रहा है। इसके इतर योगी बाबा के उग्र हिंदुत्व के चोंगे में लिपटा हिंदू राष्ट्रवाद तो है ही। चुनाव जीतने का एक फार्मुला मुसलमानों का एक जुट समर्थन हो सकता है है तो दूसरा फ़ार्मूला मुस्लिम विरोध को साधकर भी बनाया ही जा सकता है। बी ज पी जीत के इस मंत्र को साधने में जुटी है।