गाजियाबाद से वायरल हुए एक वीडियो में एक पुलिस अधिकारी एक व्यक्ति की पीठ पर मोबाइल फोन को 'मशीन' की तरह इस्तेमाल करके उसे बांग्लादेशी बता रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पुलिस को लोगों की नागरिकता की जांच का अधिकार कब से मिल गया।
ग़ाज़ियाबाद पुलिस नागरिकता की जांच करती हुई। पुलिस की इस हरकत पर सवाल हो रहे हैं।
भारत की राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पुलिस द्वारा नागरिकता जांच के नाम पर एक अजीबोगरीब तरीका अपनाए जाने का मामला सामने आया है। एक वायरल वीडियो में गाजियाबाद के SHO अजय शर्मा को एक व्यक्ति की पीठ पर मोबाइल फोन लगाते हुए दिखाया गया है, जहां वे दावा करते हैं कि यह 'मशीन' बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर सकती है। वीडियो में व्यक्ति खुद को बिहार के अररिया जिले का बताता है, लेकिन पुलिस अधिकारी कहते हैं, "मशीन बता रही है कि तुम बांग्लादेशी हो।" यह वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तेजी से वायरल हो गया है, जिसके बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं।
डीसीपी (ट्रांस-हिंडन) निमिश पाटिल ने पुष्टि की कि यह वीडियो 23 दिसंबर को बिहारी मार्केट क्षेत्र के झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाके में कौशांबी पुलिस स्टेशन के अधिकारियों और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) कर्मियों द्वारा किए गए "क्षेत्र नियंत्रण अभ्यास" के दौरान रिकॉर्ड किया गया था।
नाम न बताने की शर्त पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बताया कि वीडियो में दिख रहा अधिकारी कौशांबी पुलिस स्टेशन का स्टेशन हाउस ऑफिसर है। हालांकि, मामले की जांच जारी रहने का हवाला देते हुए पुलिस ने अभी तक उसकी आधिकारिक पहचान नहीं बताई है। लेकिन सोशल मीडिया पर पुलिस अधिकारी की पहचान एसएचओ अजय शर्मा बताई गई है। वीडियो के सामने आने पर पुलिस ने कहा कि यह अभ्यास क्रिसमस और नए साल से पहले किए जा रहे नियमित सुरक्षा उपायों का हिस्सा था। डीसीपी पाटिल ने कहा, “यह सिर्फ इलाके की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का अभ्यास था… इसी दौरान वीडियो सामने आया और इंदिरापुरम सर्कल के एसीपी को जांच सौंप दी गई है।”
घटना गाजियाबाद के कौशांबी इलाके की एक झुग्गी बस्ती में हुई, जहां पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवान संदिग्ध व्यक्तियों की जांच कर रहे थे। वीडियो में दिख रहा है कि पुलिस अधिकारी एक गरीब परिवार से पूछताछ कर रहे हैं, और मोबाइल को पीठ पर लगाकर नागरिकता का 'परीक्षण' कर रहे हैं। स्थानीय लोग दस्तावेज दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अधिकारी 'मशीन' के आधार पर दावा करते नजर आते हैं। इस वीडियो को पत्रकार सचिन गुप्ता (@SachinGuptaUP) ने X पर शेयर किया, जिसके बाद यह लाखों लोगों तक पहुंच गया। पोस्ट में उन्होंने लिखा, "ये गाजियाबाद के SHO अजय शर्मा हैं। इनके पास ऐसी मशीन है, जो इंसान की नागरिकता बता देती है।" पोस्ट को अब तक 5,000 से ज्यादा लाइक्स और 2,500 रीपोस्ट मिल चुके हैं।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस अधिकारियों ने उन्हें बांग्लादेशी बताकर डराने-धमकाने की कोशिश की। वीडियो में दिख रहे 76 वर्षीय मोहम्मद सिद्दीक ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने उनकी 22 वर्षीय बेटी से मशीन को लेकर बहस की। सिद्दीक, जो मछली बेचते हैं और 1987 से गाजियाबाद में रह रहे हैं, ने कहा, "हमने उन्हें सभी आवश्यक सबूत दिखाए कि हम बिहार में अररिया के मूल निवासी हैं।"
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने X पर पोस्ट कर लिखा, "गाजियाबाद के एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि उनके पास एक मशीन है जो पीठ पर लगाकर बांग्लादेशियों का पता लगा सकती है। वे RAF के जवानों के साथ हैं।" गोखले ने गाजियाबाद के DM, पुलिस और CRPF को टैग करते हुए कहा, "यह इतनी अत्याधुनिक खोज है। या तो हम संसद में तीन हफ्तों में इस मशीन पर चर्चा करेंगे, या आप लोग इन अधिकारियों को निलंबित करें।" उनकी पोस्ट को भी व्यापक समर्थन मिला है, और विपक्षी नेता इसे पुलिस की मनमानी का उदाहरण बता रहे हैं।
सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। कई यूजर्स ने इसे 'फर्जी टेक्नोलॉजी' बताकर पुलिस की आलोचना की है। उदाहरण के लिए, X यूजर @Benarasiyaa यानी पत्रकार पीयुष राय ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "UP पुलिस गाजियाबाद में एक 'मशीन' लेकर घूम रही है जो राष्ट्रीयता पता लगा सकती है।" उनके पोस्ट को 1,400 से ज्यादा लाइक्स मिले। वहीं, @iamharunkhan ने भी वीडियो पोस्ट कर सवाल उठाया कि क्या UP पुलिस के पास नागरिकता पता लगाने का नया डिवाइस है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी यह वीडियो शेयर हो रहा है, जहां यूजर्स इसे SIR (सिटीजनशिप अमेंडमेंट रूल्स) से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ यूजर्स ने इसे 'मानसिक यातना' का तरीका बताया, जबकि कुछ ने व्यंग्यात्मक टिप्पणियां कीं, जैसे "अब फॉर्म भरने की जरूरत नहीं, बस पीठ पर मोबाइल लगाओ।"
उत्तर प्रदेश में नफरत फैलाने वाली घटनाएं चरम पर
यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल इलाकों या गरीब बस्तियों में ऐसे अभियान चलाए जा रहे हैं। पहले हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता 'लव जिहाद' या 'घुसपैठिए' के नाम पर लोगों की जांच करते थे, मारपीट करते थे और धमकाते थे। अब पुलिस खुद ऐसा कर रही है, जो और भी चिंताजनक है। लखनऊ में तो मेयर खुद बांग्लादेशी लोगों को तलाशने झुग्गी बस्तियों में निकल पड़ी थीं। उनका वीडियो वायरल हो चुका है। ये घटनाएं तब से बढ़ी हैं जब से पीएम मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि एक-एक घुसपैठिए को बाहर निकाला जाएगा।
हाल की कुछ घटनाएं इस पैटर्न को उजागर करती हैं।
बरेली कैफे कांड: दिसंबर 2025 में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने एक नर्सिंग छात्रा के जन्मदिन पार्टी में घुसकर दो मुस्लिम युवकों पर 'लव जिहाद' का आरोप लगाया और मारपीट की। अधिकांश मेहमान हिंदू थे, फिर भी हंगामा किया गया। पुलिस ने पहले मुस्लिम युवकों पर ही कार्रवाई की, बाद में मीडिया के दबाव में हमलावरों पर केस दर्ज किया। छात्रा ने इस घटना के लिए बजरंग दल को जिम्मेदार ठहराया है।
गाजियाबाद में हथियार बांटने की घटना: दिसंबर 2025 में हिंदू रक्षा दल के सदस्यों ने शालिमार गार्डन इलाके में तलवारें और कुल्हाड़ियां बांटते हुए मुस्लिमों के खिलाफ नारे लगाए। उन्होंने बांग्लादेश जैसी स्थिति आने पर हथियार इस्तेमाल करने की धमकी दी। पुलिस ने 10 लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन ऐसे संगठन खुलेआम नफरत फैला रहे हैं। लेकिन इस घटना पर भी अब लीपापोती की जा रही है।
मुस्लिमों की लिंचिंग की घटनाएं: उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में गोमांस या अन्य बहानों से मुस्लिम पुरुषों की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या की कई घटनाएं हुई हैं, जो सांप्रदायिक तनाव बढ़ा देती हैं। मुस्लिमों के अलावा ईसाइयों और उनके चर्चों को भी इसी तरह निशाना बनाया जा रहा है। क्रिसमस के मौके पर कई जगह चर्चों में घुसकर तोड़फोड़ की गई। इसी तरह नॉर्थ ईस्ट के लोगों पर नस्लीय हमले हो रहे हैं। उत्तराखंड के देहरादून में हाल ही में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या कर दी गई। पुलिस ने इस घटना की लीपापोती कर दी। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यह सब नॉर्मल होता जा रहा है और हम लोग सिर्फ देख रहे हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा के शासन से लोग बेरोजगारी, महंगाई, किसान संकट और कानून-व्यवस्था की विफलता जैसे मुद्दों को लोग नाराज हैं। ऐसे में हिंदू-मुस्लिम नफरत फैलाकर ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। 'घुसपैठिए' या 'बांग्लादेशी' का डर दिखाकर ध्रुवीकरण करने की रणनीति पुरानी है, लेकिन अब पुलिस का इसमें शामिल होना लोकतंत्र और संविधान के लिए खतरा है।
क्या यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति है? और सबसे बड़ा सवाल: पुलिस को किसी की नागरिकता जांचने का अधिकार कैसे और कब मिला? दस्तावेज दिखाने के बावजूद धमकाना क्या कानूनी है? इन सवालों के जवाब जनता को चाहिए।