विधान परिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 11 में से पांच सीटें जीतकर अपनी ताकत बढ़ाई। बीजेपी छह सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी रही, लेकिन वाराणसी और लखनऊ में हार ने उसके लिए नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इन नतीजों को उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए खतरे की घंटी?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद की 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को कड़ी चुनौती दी है। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी छह सीटें जीतने में सफल रही। गुरुवार को सभी नतीजे घोषित होने के बाद यह साफ हो गया कि समाजवादी पार्टी ने 2020 के चुनाव में जीती गई तीन सीटों के मुकाबले इस बार अपनी संख्या पांच तक पहुंचा दी है। बीजेपी हालांकि अपनी छह सीटें बरकरार रखने में सफल रही, लेकिन उसके लिए यह नतीजा उस राजनीतिक संदेश के लिहाज से असहज है, जिसे वह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले देना चाहती थी। 2020 के चुनाव में भी बीजेपी 6 ही सीट जीत सकी थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इन नतीजों से विधान परिषद में समाजवादी पार्टी की ताकत बढ़कर 12 हो जाएगी। नेता प्रतिपक्ष का पद बनाए रखने के लिए पार्टी को कम से कम 10 सदस्यों की जरूरत थी। अब विधान परिषद में नेता विपक्ष सपा का होगा। इस लिहाज से अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण साबित हुआ है।
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11 सीटों के चुनाव में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। मतपत्रों के जरिए हुए मतदान की गिनती 27 अक्टूबर को शुरू हुई और नतीजे घोषित होने में लगभग 55 घंटे लगे। अंतिम नतीजों में बीजेपी को छह और समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिलीं। 2020 के पिछले चुनाव में भी बीजेपी को 6 और सपा को 3 सीटें मिली थीं। लेकिन 2026 के चुनाव में बीजेपी की 6 सीटें वापस लौटीं लेकिन सपा 3 से आगे 5 सीटों पर जाकर रुकी। निर्दलीय को पिछली बार 2 सीटें मिलीं थीं लेकिन इस बार निर्दलीय कहीं से भी जीत नहीं सके।
बीजेपी ने पांच सीटें बरकरार रखीं, जबकि छठी सीट गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने जीती। त्रिपाठी ने 2020 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में यह सीट जीती थी, लेकिन इस बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा।

वाराणसी में बीजेपी को दोहरा झटका

इन चुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा वाराणसी की रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी ने शिक्षक और स्नातक दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की। वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार प्रमोद कुमार मिश्रा को हराया।
वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के अशुतोष सिन्हा ने बीजेपी के केदारनाथ सिंह को पराजित किया। मतगणना के दौरान इस सीट पर विवाद और तनाव की स्थिति बनी रही। बीजेपी ने मतगणना में अनियमितताओं का आरोप लगाया और पुनर्गणना की मांग की।
अखिलेश यादव ने भी वाराणसी में मतगणना की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि नतीजे घोषित करने में जानबूझकर देरी की जा रही है और प्रशासन पर दिल्ली तथा लखनऊ से दबाव है। हालांकि, अंततः दोनों वाराणसी सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की जीत घोषित हुई।

लखनऊ में बीजेपी से सीट छीनने में सफल रही सपा

समाजवादी पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण जीतों में लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की जीत शामिल है। यह सीट 2020 में बीजेपी के पास थी। इस बार समाजवादी पार्टी की कांति सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार अवनीश कुमार सिंह को हराकर सीट पर कब्जा कर लिया। कांति सिंह को 56,905 वोट मिले, जबकि बीजेपी के अवनीश कुमार सिंह को 39,778 वोट हासिल हुए। इस जीत से समाजवादी पार्टी ने लखनऊ में बीजेपी को बड़ा राजनीतिक झटका दिया। लखनऊ को बीजेपी का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता है। यहां से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा सांसद हैं। दूसरी ओर, लखनऊ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के उमेश द्विवेदी ने जीत हासिल की। इस तरह लखनऊ में दोनों दलों ने एक-एक सीट हासिल की।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सपा का मजबूत प्रदर्शन

पांच स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी को दो सीटें मिलीं। समाजवादी पार्टी ने इलाहाबाद-झांसी, वाराणसी और लखनऊ स्नातक सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी मेरठ और आगरा स्नातक सीटें बरकरार रखने में सफल रही। इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर समाजवादी पार्टी के मान सिंह यादव ने बीजेपी के अशोक कुमार राठौर को 27,663 वोटों से हराया। यह चुनाव में जीत का सबसे बड़ा अंतर था। मान सिंह यादव को 60,358 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 32,695 वोट हासिल हुए। वाराणसी स्नातक सीट पर अशुतोष सिन्हा की जीत का अंतर भी उल्लेखनीय रहा। उन्होंने बीजेपी के केदारनाथ सिंह को 19,932 वोटों से हराया। इस तरह जीत के अंतर के लिहाज से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार पहले और दूसरे स्थान पर रहे।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी का दबदबा

जहां समाजवादी पार्टी ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया, वहीं बीजेपी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में आगे रही। छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी ने चार सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी को दो सीटें मिलीं। बीजेपी ने लखनऊ, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी शिक्षक और आगरा-अलीगढ़ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की। आगरा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के आकाश अग्रवाल ने जीत दर्ज की। यह सीट 2020 में निर्दलीय उम्मीदवार के पास थी। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव को हराया। यह मुकाबला बेहद करीबी रहा। 

वोट प्रतिशत में सपा आगे, लेकिन सीटें बीजेपी को ज्यादा, कैसे? 

इन चुनावों को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत बीजेपी से ज्यादा रहा, तो फिर उसे बीजेपी से एक सीट कम क्यों मिली? इस सवाल को समझने के लिए सबसे पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की चुनावी व्यवस्था विधानसभा चुनाव से अलग है। यहां पूरे प्रदेश के मतदाता एक साथ मतदान नहीं करते। अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में केवल पंजीकृत स्नातक और शिक्षक मतदाता मतदान करते हैं। इसलिए इन चुनावों में किसी पार्टी के कुल वोटों और जीती गई सीटों के बीच विधानसभा चुनाव जैसी सीधी तुलना नहीं की जा सकती। 
उपलब्ध रिपोर्टों में सभी 11 निर्वाचन क्षेत्रों के पार्टीवार कुल वोटों के आधार पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी का प्रमाणित, संयुक्त राज्यव्यापी वोट प्रतिशत स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह दावा कि समाजवादी पार्टी का कुल वोट प्रतिशत बीजेपी से अधिक रहा, स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आंकड़े के बिना निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
हालांकि, चुनाव के परिणामों से यह साफ है कि समाजवादी पार्टी ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी के उम्मीदवारों को बड़े अंतर से हराया।
उदाहरण के लिए:
  • - इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर सपा के मान सिंह यादव ने बीजेपी उम्मीदवार को 27,663 वोटों से हराया।
  • - वाराणसी स्नातक सीट पर सपा के अशुतोष सिन्हा ने बीजेपी उम्मीदवार को 19,932 वोटों से हराया।
  • - लखनऊ स्नातक सीट पर सपा की कांति सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार को 17,127 वोटों से हराया।
इसके बावजूद बीजेपी ने कुल छह सीटें जीतकर सपा से एक सीट अधिक हासिल की।
इसका एक प्रमुख कारण यह रहा कि सीटों का वितरण निर्वाचन क्षेत्र के आधार पर होता है। बीजेपी ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया और छह में से चार सीटें जीत लीं। दूसरी ओर, सपा ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में तीन सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की। इसलिए किसी पार्टी का कुल वोट प्रतिशत अधिक होना और सीटों की संख्या अधिक होना दो अलग-अलग बातें हैं। इस चुनाव में बीजेपी की सीटों की संख्या सपा से एक अधिक रही, लेकिन सपा का प्रदर्शन कई महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में अधिक प्रभावशाली रहा।

अखिलेश यादव ने बीजेपी की नीतियों पर उठाए सवाल

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव नतीजों को बीजेपी की नीतियों के खिलाफ जनादेश बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों, छात्रों और शिक्षित बेरोजगारों ने बीजेपी के खिलाफ अपना फैसला सुनाया है। अखिलेश यादव ने दावा किया कि बीजेपी की नीतियों के कारण शिक्षकों और छात्रों में असंतोष बढ़ा है। उन्होंने चुनाव नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए चेतावनी बताया। हालांकि, बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि उसने अपनी छह सीटें बरकरार रखी हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में भी वह सत्ता में वापसी करेगी।

2027 के विधानसभा चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के इन चुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक ताकत की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटें 2019 के 62 से घटकर 33 रह गई थीं। इसके बाद बीजेपी लगातार अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद विधान परिषद चुनाव में भी अपनी ताकत बढ़ाई है।
वाराणसी में दोनों सीटों पर जीत, लखनऊ स्नातक सीट पर बीजेपी को हराना और इलाहाबाद-झांसी में बड़े अंतर से जीत दर्ज करना सपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धियां हैं। हालांकि, विधान परिषद के चुनावों को विधानसभा चुनावों का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता। यहां मतदाताओं का वर्ग सीमित होता है और स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव भी काफी महत्वपूर्ण होता है। फिर भी, इन नतीजों से यह संकेत जरूर मिलता है कि बीजेपी के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा। समाजवादी पार्टी को इन नतीजों से संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने का अवसर मिला है।