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OBC कोटा लागू होने पर यूपी में शहरी निकाय की राजनीतिक तस्वीर बदलेगी?

यूपी में शहरी स्थानीय निकाय चुनाव (सिटी लोकल बॉडीज इलेक्शन) अब ओबीसी आरक्षण के मुताबिक होने की उम्मीद बढ़ गई है। इस वजह से राज्य के तमाम निकायों में पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल जाएगी। यूपी सरकार ने शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण के मुद्दे पर गौर करने के लिए गठित पांच सदस्यीय आयोग की सिफारिश को स्वीकार कर लिया।
कोटा लागू होने के बाद यूपी में जब शहरी स्थानीय निकाय चुनाव होंगे तो पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल जाएगी। सपा और बीएसपी जैसे क्षेत्रीय दल ओबीसी वोटों के दम पर तमाम निकायों पर कब्जा कर सकते हैं। हालांकि बीजेपी के पास भी कम ओबीसी वोट नहीं हैं। विधानसभा चुनाव 2022 में तो उसने ओबीसी वोटों की बदौलत जबरदस्त कामयाबी हासिल की थी। हालांकि बीजेपी का शहरों में जनाधार ओबीसी जातियों के मुकाबले दूसरी जातियों में ज्यादा है। शहर में ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य बीजेपी के परंपरागत वोटर माने जाते हैं। कुल मिलाकर अभी यह कहना मुश्किल है कि ओबीसी आरक्षण का लाभ शहरी निकाय चुनाव में किसी एक दल को मिलेगा।   
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पीटीआई के मुताबिक यूपी के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि यूपी सरकार अब इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में फौरन सुनवाई की मांग करेगी, जहां मामला विचाराधीन है।
ऊर्जा और शहरी विकास मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने कहा कि राज्य मंत्रिमंडल ने शहरी स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और ओबीसी के लिए पूर्ण आरक्षण का समर्थन किया। हम इस रिपोर्ट को एक या दो दिन में सुप्रीम कोर्ट ले जाने वाले हैं और अदालत के निर्देशों के अनुसार इस मुद्दे पर आगे बढ़ेंगे। हालांकि उन्होंने रिपोर्ट को मीडिया से साझा नहीं किया।

क्यों हुई ये कवायदः 27 दिसंबर 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण के लिए 5 दिसंबर की सरकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया था। यह अधिसूचना इस आधार पर रद्द की गई कि यूपी सरकार ने 2010 में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ द्वारा तय किए गए "ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला" का पालन नहीं किया था। इसके बाद यूपी सरकार ने एक पैनल बनाया और उससे शहरी निकाय चुनाव पर ओबीसी आरक्षण पर रिपोर्ट मांगी। उस रिपोर्ट को लागू किया जाएगा और उस आधार पर चुनाव होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने जो ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला तय किया था, उसमें स्पष्ट आदेश था कि राज्य को स्थानीय निकायों के संबंध में ओबीसी के लिए एक समर्पित आयोग स्थापित करना होगा। अदालत ने निर्देश दिया था कि आरक्षण का अनुपात इस तरह हो जो तय मानक से ज्यादा न हो और न ही कम हो।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें बिना कोटे के चुनाव कराने का भी आदेश दिया गया था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग की अलग-अलग अपीलों पर सुनवाई करते हुए, चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने कहा था: हाईकोर्ट ने चुनाव कराने का निर्देश दिया है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि हम देखते हैं कि राज्य का एक हिस्सा बिना प्रतिनिधित्व के रह जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी से कहा कि वो आयोग से प्रारंभिक रिपोर्ट तीन महीने में देने के लिए कहे। क्योंकि तीन महीने की अवधि से ज्यादा नगरपालिकाओं में को चुनाव के बिना नहीं रखा जा सकता है।
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सबसे ज्यादा वोट मिले और उस वजह से बीजेपी की यूपी की सत्ता में दोबारा वापसी हुई। लेकिन जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश आया कि ओबीसी आरक्षण तय हुए बिना शहरी निकाय चुनाव करा दिए जाएं तो सपा, कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो ओबीसी लोगों के राजनीतिक आरक्षण की रक्षा करने में नाकाम रही। तब मजबूरी में यूपी की योगी सरकार को सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एसएलपी दायर करना पड़ी।
बहरहाल, प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मांग की कि आयोग ने क्या सिफारिशें की हैं, यह जानने के लिए पैनल की रिपोर्ट को सभी के लिए सार्वजनिक किया जाए। सपा ने कहा कि हमें नहीं पता कि रिपोर्ट में क्या है। हम मांग करते हैं कि सरकार इसे सार्वजनिक करे ताकि हम इसका अध्ययन कर सकें। 
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यूपी कांग्रेस ने योगी सरकार से रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की। कांग्रेस ने कहा कि हम निकाय चुनाव के लिए तैयार है और हम जानना चाहते हैं कि रिपोर्ट में क्या कहा गया है।

स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी कोटे का मुद्दा अन्य राज्यों में भी उठा है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा में - सभी राज्यों ने पिछले साल ओबीसी कोटा स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल टेस्ट का पालन नहीं करने के लिए सरकारी अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया। मध्य प्रदेश और बिहार ने बाद में एक आयोग का गठन किया और उसकी रिपोर्ट को अदालत ने आंशिक या पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया।

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क़मर वहीद नक़वी
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