यूपी एसआईआर के बाद वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर घपले का आरोप कांग्रेस पार्टी ने आज बुधवार को लखनऊ में लगाया। कांग्रेस का आरोप है कि पीलीभीत में 13,150 मतदाताओं के EPIC नंबर बदले बिना नाम बदल दिए गए।
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए दावा किया है कि पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में 13,150 मतदाताओं के EPIC नंबर और क्रम संख्या समान रखते हुए उनके नाम बदल दिए गए। पार्टी का आरोप है कि मतदाता सूची में नाम हटाने और नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया में भी गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।
कांग्रेस की मीडिया एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स चेयरपर्सन सुप्रिया श्रीनेत ने इन आरोपों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट से SIR की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और जहां-जहां यह प्रक्रिया पूरी हुई है, वहां इसकी समीक्षा कर इसे खारिज करने की मांग की है। उन्होंने मतदाताओं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं और जिला प्रशासन के अधिकारियों से भी इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी और सरकारी अधिकारियों पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और लोगों को डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है।
अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद भी बदलाव का आरोप
लखनऊ में 21 अक्टूबर बुधवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेताओं ने उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा, सांसद एवं कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष इमरान मसूद और कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत सहित पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। सुप्रिया श्रीनेत के मुताबिक, 10 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची जारी की गई थी। कांग्रेस का दावा है कि SIR के दौरान लगभग 2 करोड़ 4 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। पार्टी का कहना है कि अंतिम सूची जारी होने के बाद पुनरीक्षण की प्रक्रिया समाप्त मानी जा रही थी, लेकिन जुलाई से सितंबर के बीच चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाने और जोड़ने की कार्रवाई की।श्रीनेत ने सवाल उठाया कि यदि इस अवधि में नियमित रूप से फॉर्म-6 और फॉर्म-7 के माध्यम से नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया नहीं चल रही थी, तो मतदाताओं के रिकॉर्ड में ये बदलाव किस आधार पर किए गए? कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया का विवरण सार्वजनिक करने और कथित अनियमितताओं की जांच कराने की मांग की।
पीलीभीत सदर में 13,150 नाम बदलने का दावा
कांग्रेस ने अपने आरोपों के समर्थन में पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण दिया। यह विधानसभा क्षेत्र संख्या 127 है। पार्टी का दावा है कि जुलाई से सितंबर के बीच यहां 13,150 मतदाताओं के नाम बदल दिए गए, जबकि उनके EPIC नंबर और मतदाता सूची में क्रम संख्या पहले जैसी ही रखी गई। EPIC नंबर मतदाता पहचान पत्र पर दर्ज विशिष्ट पहचान संख्या होती है। कांग्रेस का कहना है कि पहचान संख्या और क्रम संख्या समान रहने के कारण संबंधित मतदाताओं को यह पता ही नहीं चला कि सूची में उनके नाम बदल दिए गए हैं।पार्टी ने उदाहरण देते हुए बताया कि अंतिम ड्राफ्ट सूची में रशीद नाम के व्यक्ति का नाम दर्ज था। रशीद ने अपना नाम, EPIC नंबर और क्रम संख्या देखकर मान लिया कि मतदाता सूची में उनका रिकॉर्ड सही है। लेकिन कांग्रेस के दावे के मुताबिक, बाद की सूची में उसी EPIC नंबर और क्रम संख्या के सामने किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया। कांग्रेस का आरोप है कि इस तरह की गड़बड़ी किसी एक मतदाता तक सीमित नहीं थी, बल्कि पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुई।
कुल 16,554 मतदाताओं के रिकॉर्ड में गड़बड़ी का आरोप
कांग्रेस की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में तीन तरह की कथित अनियमितताएं हुईं। कांग्रेस का कहना है कि जिन 804 लोगों के नाम हटाए गए, वे अब भी संबंधित क्षेत्र में मौजूद हैं। वहीं, पार्टी के मुताबिक, बाद में लगभग 2,600 मतदाताओं के नाम जोड़े गए, लेकिन उनमें से कई लोग उस क्षेत्र में रहते ही नहीं हैं। पार्टी का दावा है कि उसकी टीम ने मौके पर जाकर इन मामलों का सत्यापन किया। इन आरोपों के आधार पर कांग्रेस ने कहा कि एक विधानसभा क्षेत्र में ही 16,554 मतदाता रिकॉर्ड प्रभावित होने का दावा सामने आया है। पार्टी ने इसे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला बताया।
संजय गंगवार की जीत के अंतर का भी उठाया मुद्दा
कांग्रेस ने पीलीभीत सदर के मामले को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया। पार्टी ने उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री और पीलीभीत सदर के विधायक संजय गंगवार का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने 2022 का विधानसभा चुनाव लगभग 6,930 मतों के अंतर से जीता था। कांग्रेस नेताओं ने तर्क दिया कि यदि एक विधानसभा क्षेत्र में हजारों मतदाताओं के नामों में कथित बदलाव हुआ है, तो इससे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं।उन्होंने कहा- सीमा खन्नाचुनाव आयोग में आईटी और सॉफ्टवेयर विभाग की प्रमुख हैं, लेकिन आजकल किसी को नहीं पता कि वह कहां हैं। वो आरोपों के घेरे में हैं।
सुप्रीम कोर्ट से SIR रोकने की मांग
सुप्रिया श्रीनेत ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीन प्रमुख मांगें रखीं।
सुप्रीम कोर्ट तत्काल हस्तक्षेप करे।
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि वह मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का स्वतः संज्ञान ले और SIR की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाए। पार्टी ने यह भी मांग की कि जिन क्षेत्रों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां की प्रक्रिया और उससे तैयार मतदाता सूचियों की समीक्षा की जाए तथा कथित गड़बड़ियों के मद्देनजर उसे खारिज करने पर विचार किया जाए।
मतदाता अपने EPIC नंबर की जांच करें
कांग्रेस ने आम लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे तत्काल चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपना EPIC नंबर डालकर मतदाता सूची में दर्ज नाम की जांच करें। श्रीनेत के मुताबिक, यदि किसी मतदाता को अपना EPIC नंबर सही मिलता है, लेकिन उसके सामने नाम किसी दूसरे व्यक्ति का दर्ज है, तो उसे इस बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे मतदाताओं से कांग्रेस के जिला और प्रदेश कार्यालयों से संपर्क करने की अपील की गई।
DM और SDM रिकॉर्ड की जांच कराएं
कांग्रेस ने जिलाधिकारियों (DM) और उपजिलाधिकारियों (SDM) से भी सामने आने की अपील की। पार्टी का कहना है कि यदि अधिकारियों ने मतदाता सूची में कोई अनियमितता नहीं की है, तो उन्हें चुनाव आयोग से पूरा तकनीकी एक्सेस मांगना चाहिए और कथित रूप से गलत दर्ज नामों को ठीक कराने के लिए कदम उठाने चाहिए। कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि यदि स्थानीय निर्वाचन अधिकारी मतदाता सूची में हुए बदलावों की जांच नहीं कर सकते, तो जवाबदेही किसकी होगी।अखिलेश यादव ने भी चुनावी धांधली का आरोप लगाया
इस बीच, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी चुनावी प्रक्रिया को लेकर भाजपा और सरकारी अधिकारियों पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा बेईमानी और चुनावी हेरफेर के बिना चुनाव नहीं जीत सकती। अखिलेश यादव के मुताबिक, सरकार ने अधिकारियों, विशेषकर शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों को जिस तरह जिम्मेदारियां सौंपी हैं और कथित तौर पर उनका इस्तेमाल लोगों को डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है, वह चिंताजनक है।उन्होंने दावा किया कि जिन राज्यों और क्षेत्रों में चुनाव होने वाले हैं, वहां बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) और जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) मोबाइल फोन तथा फोन कॉल के माध्यम से लोगों पर दबाव बना रहे हैं। अखिलेश यादव ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी चुनावी अनियमितताओं में शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ ऐसे तथ्य और सबूत जुट सकते हैं जिनके आधार पर उन्हें जेल भेजा जा सकता है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार करने के बजाय निष्पक्ष प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए।
अखिलेश यादव ने चुनाव आयुक्त और संबंधित अधिकारियों से अपील की कि वे चुनावी प्रक्रिया की रक्षा करें और सुनिश्चित करें कि मतदाता सूची में हेरफेर या वोट चोरी न हो। उनका कहना था कि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से होने चाहिए तथा सरकारी अधिकारियों को किसी राजनीतिक दल के पक्ष में काम नहीं करना चाहिए। समाजवादी पार्टी पहले भी मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और SIR की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस के ताजा आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा एक बार फिर विपक्षी राजनीति के केंद्र में आ गया है।
मतदाता सूची विवाद का राजनीतिक महत्व
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का यह विवाद केवल नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं है। इसका संबंध मतदाताओं की पहचान, उनके मतदान के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से है। यदि किसी मतदाता का EPIC नंबर सही होने के बावजूद उसके सामने गलत नाम दर्ज होने की शिकायत प्रमाणित होती है, तो यह गंभीर प्रशासनिक मामला होगा। इसी तरह, यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे मतदान से वंचित होने का जोखिम हो सकता है।