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योगी के नए मंत्रीः जरूरी या मजबूरी, राजभर से लेकर RLD तक एडजस्ट

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया, जो उनके दूसरे कार्यकाल में पहला विस्तार है। इसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से दो नए चेहरे शामिल हुए, एक राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) से और दूसरा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) से। मंत्रिमंडल में उल्लेखनीय सदस्यों में दारा सिंह चौहान, सुनील शर्मा, अनिल कुमार और ओमप्रकाश राजभर हैं। दारा सिंह चौहान भाजपा नेता थे, पिछले साल समाजवादी पार्टी के साथ रहने के बाद फिर से भाजपा में लौट आए। साहिबाबाद से भाजपा विधायक सुनील कुमार शर्मा नए मंत्री बने हैं। मुजफ्फरनगर के पुरकाजी से आरएलडी विधायक अनिल कुमार और एसबीएसपी प्रमुख ओपी राजभर ने भी मंत्री पद की शपथ ली। राजभर 2017 वाले योगी मंत्रिमंडल में भी मंत्री थे लेकिन बाद में एनडीए छोड़कर चले गए थे।

यूपी में 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा का अच्छा प्रदर्शन था। इसके बाद 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने राज्य में भी वापसी कर ली। 2019 में भाजपा ने 78 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 62 सीटें मिली थीं। इस बार हालांकि 51 प्रत्याशियों की घोषणा उसने पहले ही कर दी है लेकिन अभी भी वो यूपी को लेकर आश्वस्त नहीं है, इसीलिए लोकसभा चुनाव से पहले राज्य मंत्रिमंडल का विस्तार कराया गया है।


भाजपा ने ये सारे इंतजाम जाति और क्षेत्रीय समीकरण बनाने के लिए किए हैं। इसमें सबसे उल्लेखनीय एंट्री जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी की है। मोदी सरकार ने हाल ही में चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिया था। बस, इसी बात से खुश होकर जयंत भाजपा के साथ आ गए। काफी इंतजार कराने के बाद उन्हें एनडीए में अभी चंद दिनों पहले एंट्री मिली और अब यूपी में उनका एक मंत्री भी बन गया। 

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जयंत चौधरी की हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ बैठक में एनडीए के साथ-साथ आरएलजी को भी मजबूत करने की बात हुई है। इसीलिए एक मंत्री पद भी आरएलडी को दिया गया। आरएलडी ने आगामी आम चुनाव के लिए बिजनौर और बागपत में अपने उम्मीदवारों की घोषणा पहले ही कर दी है। मुज़फ़्फ़रनगर के मीरापुर से निवर्तमान विधायक चंदन चौहान बिजनौर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं, जबकि आरएलडी के वरिष्ठ नेता डॉ. राजकुमार सांगवान बागपत लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे।

मंत्रिमंडल विस्तार में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर की वापसी महत्वपूर्ण है। जून 2023 में जब पटना से इंडिया गठबंधन की गतिविधिया शुरू हुईं और मुंबई में जब तीसरी बैठक में 26 दल इंडिया में शामिल हो गए तो भाजपा को भी एनडीए गठबंधन की संख्या बढ़ाने की चिन्ता हुई। उसने भी सम्मेलन बुलाया और 38 दलों को अपने साथ दिखाया। इन 38 नामों में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी एसबीएसपी भी थी।
2017 में जब योगी आदित्यनाथ को भाजपा ने सीएम बनाया तो उस एनडीए गठबंधन की वजह से राजभर भी मंत्री बने। लेकिन ओमप्रकाश राजभर की दोस्ती पूर्वी के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी से भी है। उनका बेटा अब्बास अंसारी इसी पार्टी से विधायक है। योगी आदित्यनाथ ने जब अपने पुराने प्रतिद्वंदी मुख्तार अंसारी ने शिकंजा कसना शुरू किया तो राजभर ने इस पर ऐतराज किया। और कुछ दिनों बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और एनडीए से भी अलग हो गए। उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया। फरवरी 2022 में राजभर ने आरोप लगाया था कि योगी आदित्यनाथ मेरी हत्या कराना चाहते हैं।   
हालांकि राजभर अभी भी पूर्वी यूपी की राजनीति के छोटे खिलाड़ी हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, राजभर पूर्वी यूपी में ओबीसी के भीतर प्रतिनिधित्व के लिए जाति-उन्मुख (जाति) संघर्ष में एक मुखर नेता के रूप में उभरे हैं। लेकिन उनका बार-बार भाजपा का साथ पकड़ना पिछले तीन दशकों में हाशिये पर पड़ी पिछड़ी जातियों की 'सामाजिक न्याय' की राजनीति को कमजोर करता है। भाजपा ने बहुत चालाकी से जाति-आधारित लामबंदी करने वाले नेताओं का हिंदुत्व के साथ विलय कर दिया है। जब तक तमाम ओबीसी नेता भाजपा के दायरे से बाहर रहे तो उनकी पहचान बनी रही लेकिन जैसे भी उन्होंने भाजपा का दामन था, उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रही।

राजभर गाजीपुर की जहूराबाद सीट से विधायक हैं। 2022 में, उनके और जेल में बंद पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी सहित एसबीएसपी के छह उम्मीदवारों ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के हिस्से के रूप में अपनी सीटें जीतीं।

मंत्रिमंडल विस्तार में दारा सिंह चौहान को भी जगह मिली है। वो भी सपा की यात्रा करके लौटे हैं। भाजपा में लौटने के बाद पिछले साल घोसी विधानसभा उपचुनाव हारने वाले दारा सिंह चौहान ने जनवरी में यूपी विधान परिषद के लिए निर्वाचित होकर जीत हासिल की। ये वही दारा सिंह चौहान हैं जो 14 जनवरी 2022 को भाजपा को इसलिए कोस रहे थे कि उसने कभी ओबीसी का भला नहीं किया। यहां बताना जरूरी है कि 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दारा सिंह चौहान और स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा को छोड़ दिया था। दोनों ही मंत्री थे। लेकिन इनका आरोप था कि वे नाम के मंत्री हैं, उनकी कोई सुनवाई नहीं है। दोनों ने भाजपा छोड़ने के बाद सपा का दामन था। दारा सिंह वापस भाजपा में लौट आए, स्वामी प्रसाद मौर्य ने हाल ही में सपा छोड़ी है और अपनी अलग पार्टी बना रहे हैं। इन सभी नेताओं की असली जगह कभी बसपा थी। वहीं से ये लोग राजनीतिक रूप से उभरे थे। 
दारा सिंह चौहान ने जनवरी 2022 में एक इंटरव्यू में कहा था- ''आप जानते हैं कि 2017 में योगी सरकार बनी थी। भारत का सबसे बड़ा राज्य होने के नाते, सबसे बड़ा आबादी ओबीसी की है। इस समुदाय और दलितों ने खुलकर बीजेपी का समर्थन किया। यहां तक ​​कि स्थानीय लोगों और किसानों ने भी पार्टी का समर्थन किया। मैं भी पिछड़े वर्ग से हूं, इसलिए मैं उनका दर्द समझता हूं।" उन्होंने कहा, "सरकार बनने के बाद पिछले पांच वर्षों में, जिस तरह से उनके साथ व्यवहार किया गया है, जिस तरह से संविधान में उनके मौलिक अधिकारों के साथ छेड़छाड़ की गई है, मुझे लगा कि उन्हें सम्मान नहीं मिलेगा क्योंकि उन्हें पूरे समय उपेक्षित किया गया है।" .

बहरहाल, राजनीति में जुमलों और वादों का कोई महत्व नहीं होता। सब कुछ अपनी सुविधा के अनुसार तय होता है। कल के दुश्मन आज दोस्त हैं। इसी को कहते हैं कि नेता भी गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं।
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क़मर वहीद नक़वी
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