स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को योगी शासन के नोटिस के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या शंकराचार्य जैसे धार्मिक पदाधिकारियों से अब औपचारिक कागज़ या दस्तावेज़ मांगे जाएँगे? योगी सरकार और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच विवाद क्यों?
यूपी के माघ मेला में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शाही स्नान को लेकर शुरू हुआ झगड़ा अब शंकराचार्य की पदवी पर सवाल उठाने तक पहुंच गया है। सरकार ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर पूछा है कि वे खुद को शंकराचार्य क्यों कहते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक इस पद पर कोई आधिकारिक पट्टाभिषेक नहीं हुआ है। स्वामी ने इस नोटिस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि शंकराचार्य का फैसला सिर्फ अन्य शंकराचार्यों का होता है, न कि मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति का। विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर सरकार को घेर रही हैं और कह रही हैं कि जो बीजेपी के लोग पहले मुसलमानों से कागज दिखाने को कहते थे, अब वही हिंदुओं के संत शिरोमणि को कागज दिखाने को कह रहे हैं।
यह सब प्रयागराज में चल रहे माघ मेला से शुरू हुआ। खुद को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मेला में शाही स्नान करना चाहते थे। वह कहते हैं कि शंकराचार्य की परंपरा के अनुसार, उन्हें पालकी में बैठकर संगम पर स्नान करने दिया जाना चाहिए। लेकिन मेला प्रशासन ने उन्हें रोक दिया और कहा कि इसके लिए अनुमति ज़रूरी है। स्वामी का कहना है कि यह उनकी परंपरा का अपमान है।
सरकार की आलोचना से बढ़ा विवाद?
इसके विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले 48 घंटों से ज्यादा समय से धरने पर बैठे हैं। उन्होंने कहा, 'जब तक प्रशासन माफ़ी नहीं मांगता, मैं अपने आश्रम में नहीं जाऊंगा। शंकराचार्य हमेशा पालकी में स्नान करने जाते रहे हैं, मैं भी इस परंपरा से पीछे नहीं हटूंगा। हर साल मेला में आऊँगा, लेकिन शिविर में नहीं, फुटपाथ पर ही रहूँगा।'
स्वामी का आरोप है कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी सरकार की कुछ नीतियों की आलोचना की थी। उन्होंने गौ मांस पर सवाल उठाया, राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को आधा-अधूरा बताया और मेला की अव्यवस्था पर बोला था। स्वामी का आरोप है कि पहले तो सरकार उन्हें शंकराचार्य मानती थी, लेकिन अब जब उन्होंने सवाल उठाए तो उन्हें नकार दिया जा रहा है।
सरकार का नोटिस: 24 घंटे में जवाब दें
मेला प्राधिकरण ने सोमवार देर रात स्वामी के शिविर के बाहर नोटिस चिपका दिया। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला दिया गया है। कोर्ट ने कहा था कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर किसी का पट्टाभिषेक नहीं हुआ है, इसलिए इस पद का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। प्रशासन ने कहा कि स्वामी अपने शिविर के बोर्ड पर खुद को शंकराचार्य लिखकर कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहे हैं। उन्हें 24 घंटे के अंदर जवाब देना होगा, वरना कार्रवाई होगी।
मेला अधिकारी ऋषिराज ने साफ़ किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए स्वामी को शंकराचार्य के रूप में प्रोटोकॉल नहीं दिया जा सकता। उन्हें बद्रिका आश्रम सेवा शिविर के नाम पर जमीन दी गई है, न कि शंकराचार्य के तौर पर। जब नोटिस देने कानूनगो पहुंचे तो स्वामी के समर्थकों ने कहा कि सुबह आइए, अभी कोई पदाधिकारी नहीं है जो नोटिस ले सके।स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद क्या बोले?
नोटिस पर स्वामी ने कहा, "शंकराचार्य का फैसला सरकार या राष्ट्रपति नहीं करते। यह गुरु-शिष्य परंपरा से होता है। चार शंकराचार्य पीठों में से तीन ने मुझे मान्यता दी है। दो पीठ के शंकराचार्य मुझे शंकराचार्य कहते हैं और पिछले मेले में साथ स्नान कर चुके हैं। प्रशासन शंकराचार्य तय नहीं कर सकता।"
स्वामी ने यह भी कहा कि 1954 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि मठ के संचालन में सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसलिए यह नोटिस कानून का उल्लंघन है। वे अपने धरने पर डटे हैं और कहते हैं कि माफी मिलने तक नहीं हटेंगे।
विपक्ष का हमला
इस मुद्दे पर विपक्ष ने योगी सरकार को जमकर घेरा है। कांग्रेस ने कहा कि जो बीजेपी वाले पहले मुसलमानों से कागज मांगते थे, अब हिंदुओं के संत शिरोमणि से कागज मांग रहे हैं। क्या अब प्रशासन तय करेगा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं या नहीं? हम कहां आ गए हैं?'
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, 'शंकराचार्य ने मोदी सरकार की निंदा की तो उन्हें शाही स्नान से रोका गया। अब माफी की बजाय नोटिस भेज दिया। यह घमंड की हद है। भारत में गंगा स्नान के लिए अनुमति लेनी पड़ेगी? जो सरकार के गुणगान करें, उनके लिए सब कुछ, बाकियों के लिए अपमान।'
कांग्रेस ने आगे कहा, "शंकराचार्य तब तक थे जब मोदी उनके सामने नतमस्तक होते थे। लेकिन जब उन्होंने गौ मांस, राम मंदिर और मेला अव्यवस्था पर सवाल उठाए तो अब वे शंकराचार्य नहीं रहे। जो 10 साल से अपनी डिग्री छिपा रहे हैं, वे दूसरों से नोटिस मांग रहे हैं। पूरा देश मोदी और योगी के मौन को देख रहा है, उन्हें माफ नहीं किया जाएगा। संत मठ वाले होते हैं, लठ वाले नहीं।'
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समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी ट्वीट कर कहा, "घोर निंदनीय! मांगने वाले पहले खुद अपना प्रमाण पत्र दें। विभाजनकारी भाजपाई और उनके साथियों की सोच इतनी गिर जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। भाजपा सत्ता और धन के सिवा किसी की सगी नहीं है। अहंकार तो दशमुखी का भी नहीं बचा था, इन एक मुखी का क्या बचेगा।"
बीजेपी की क्या प्रतिक्रिया?
योगी सरकार ने अभी तक इस पर आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन प्रशासन इसे कानूनी कार्रवाई बता रहा है। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में बीजेपी समर्थक कह रहे हैं कि स्वामी राजनीति में घुस आए हैं और योगी के खिलाफ साजिश रच रहे हैं, इसलिए यह कदम जरूरी था। हालांकि, मोदी या योगी जैसे बड़े नेता ने इस पर चुप्पी साध रखी है। धार्मिक संगठनों से भी ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं आई है, जो इस विवाद को और दिलचस्प बना रहा है।
क्या है शंकराचार्य पद की परंपरा?
शंकराचार्य पद आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों- ज्योतिष, द्वारका, पुरी और श्रृंगेरी- से जुड़ा है। चयन गुरु-शिष्य परंपरा से होता है, न कि सरकार से। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि उन्हें अन्य पीठों की मान्यता है। लेकिन ज्योतिष पीठ पर विवाद लंबे समय से है और सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है। 1954 के कोर्ट आदेश के मुताबिक़, मठों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, लेकिन 2022 का आदेश खास तौर पर पट्टाभिषेक पर है।
यह विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है। अगर स्वामी जवाब नहीं देते तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना सकता है। हिंदू समाज में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार धार्मिक परंपराओं में दखल दे रही है?