सुरेंद्र कोली को 2006 के निठारी सीरियल मर्डर केस में 2025 में बरी कर दिया गया था। बाद में उन्होंने हरिद्वार में चाय की दुकान खोली थी। दुकान में ही उनका शव फंदे पर लटका मिला। पुलिस ने कहा कि कोली के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।
2006 के चर्चित निठारी हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट से बरी हो चुके सुरेंद्र कोली ने हरिद्वार में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। पुलिस के मुताबिक़ शुक्रवार को उनका शव हरिद्वार के भूपतवाला इलाके में उनकी चाय की दुकान में फंदे से लटका मिला। पुलिस ने प्रथम दृष्टया इसे आत्महत्या का मामला बताया है। हालाँकि, मौत की सही वजह पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक जांच के बाद ही साफ़ होगी। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 13वें और अंतिम मामले में भी कोली को बरी कर दिया था। इस फ़ैसले के बाद कोली ने हरिद्वार में चाय की दुकान खोली थी। उसी चाय की दुकान में उनका शव फंदे पर लटा मिला।
कोली पिछले कुछ महीनों से हरिद्वार में रह रहे थे और लाल माता मंदिर के सामने एक छोटी चाय की दुकान चला रहे थे। मौक़े से उनका आधार कार्ड मिला है। पुलिस के मुताबिक़ कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है और उनके परिवार को सूचना दे दी गई है।
हरिद्वार के सिटी सीओ शिशुपाल सिंह नेगी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पुलिस ने एक व्यक्ति का शव बरामद किया है और शुरुआती जांच में मामला आत्महत्या का लग रहा है। फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल की जाँच की है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद मामले में आगे की जानकारी सामने आएगी।
निठारी कांड का पूरा मामला क्या था?
निठारी हत्याकांड दिसंबर 2006 में सामने आया था। नोएडा के सेक्टर-31 स्थित निठारी इलाके में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर के मकान D-5 के पीछे और आसपास नालियों से बड़ी संख्या में मानव अवशेष, खोपड़ियां, हड्डियां, कपड़े और जूते-चप्पल मिलने के बाद पूरे देश में सनसनी फैल गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले में दर्ज घटनाक्रम के अनुसार, 2005 से ही इलाके में महिलाओं और बच्चों के लापता होने की शिकायतें सामने आ रही थीं। दिसंबर 2006 में नालियों और मकान के आसपास मानव अवशेष मिलने के बाद कई एफआईआर दर्ज की गईं।
मानव अवशेष मिलने के बाद मामले की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस से सीबीआई को सौंप दी गई थी। जांच के दौरान कई अलग-अलग मामले दर्ज किए गए और कोली के खिलाफ हत्या, अपहरण, बलात्कार तथा सबूत मिटाने जैसे आरोप लगाए गए।
कोली को पहले मिली थी मौत की सजा
निठारी से जुड़े मामलों में कोली को निचली अदालतों ने कई मामलों में दोषी ठहराया था। 2009 में एक मामले में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। कुल 13 मामलों में कोली पर आरोप लगाए गए थे। निठारी मामले में कोली के साथ कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर भी आरोपी बनाए गए थे। अलग-अलग मामलों में उनकी भूमिका को लेकर भी मुकदमे चले। सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले में दर्ज रिकॉर्ड के मुताबिक, कुछ मामलों में पंढेर को निचली अदालत ने दोषी ठहराया था, लेकिन बाद में हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया।
कोली सभी 13 मामलों में बरी
सुरेंद्र कोली की मौत इसलिए भी काफ़ी अहम है क्योंकि निठारी हत्याकांड से जुड़े मामलों में उनके ख़िलाफ़ चल रही लंबी क़ानूनी लड़ाई 2025 में ख़त्म हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को कोली की क्यूरेटिव याचिका मंजूर करते हुए उस मामले में उनकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं में लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया था। कोर्ट ने आदेश दिया था कि अगर वे किसी दूसरे मामले में ज़रूरी न हों तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। यह उनके ख़िलाफ़ निठारी से जुड़ा 13वां और अंतिम मुकदमा था। इससे पहले 12 अन्य मामलों में भी उनकी दोषसिद्धियां खत्म हो चुकी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि अलग-अलग मामलों में एक ही तरह के सबूतों के आधार पर दिए गए फ़ैसलों में गंभीर असंगति थी।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच और सबूतों पर क्या कहा था?
कोली की रिहाई का आधार यह नहीं था कि अदालत ने निठारी में हुई घटनाओं को ग़लत या काल्पनिक माना। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा था कि निठारी की घटनाएँ बेहद गंभीर थीं और पीड़ित परिवारों की पीड़ा बहुत बड़ी थी। लेकिन आपराधिक मुक़दमे में दोष साबित करने के लिए क़ानूनी रूप से स्वीकार्य और भरोसेमंद सबूत ज़रूरी हैं।
अदालत ने पाया कि कोली के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए गए कई अहम सबूतों में गंभीर क़ानूनी और जाँच संबंधी कमियाँ थीं। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ उनके कथित कबूलनामे को लेकर गंभीर सवाल थे। यह बयान क़रीब 60 दिनों की लगातार पुलिस हिरासत के बाद दर्ज किया गया था। अदालत ने यह भी नोट किया कि क़ानूनी सहायता और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त सुरक्षा नहीं थी।जिन बरामदगियों को अभियोजन पक्ष ने कोली के ख़िलाफ़ अहम सबूत बताया था उनके बारे में भी अदालत ने सवाल उठाए। अदालत ने कहा था कि जिस जगह से हड्डियां और अन्य सामान मिले थे, वहां पुलिस और आम लोगों को पहले से जानकारी थी और खुदाई भी कोली के पहुंचने से पहले शुरू हो चुकी थी। इसलिए इसे आरोपी की जानकारी के आधार पर हुई खोज मानने में क़ानूनी दिक्कत थी।
फॉरेंसिक सबूत भी कोली को सीधे नहीं जोड़ पाए
सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेंसिक जांच को भी अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, D-5 मकान की विशेषज्ञ टीमों द्वारा की गई तलाशी में ऐसे मानव रक्त के निशान, अवशेष या दूसरे फॉरेंसिक ट्रांसफर पैटर्न नहीं मिले जो मकान के अंदर बड़े पैमाने पर हत्या और शवों के टुकड़े किए जाने की घटना से सीधे जुड़ते हों।
डीएनए जांच से कुछ अवशेषों की पहचान लापता लोगों के परिवारों से जोड़ने में मदद मिली, लेकिन इससे यह साबित नहीं हुआ कि उन हत्याओं को कोली ने ही अंजाम दिया था। अदालत ने इसी अंतर को अहम माना। अदालत ने यह भी कहा कि चाकू और कुल्हाड़ी जैसे कथित हथियारों पर ऐसा मानव रक्त या ऊतक नहीं मिला, जिससे उन्हें अपराध से विश्वसनीय रूप से जोड़ा जा सके।
ऑर्गन ट्रेड एंगल की जांच नहीं होने पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने जांच की कमियों का ज़िक्र करते हुए कहा था कि कुछ अहम पहलुओं की पर्याप्त जांच नहीं हुई। अदालत ने विशेष रूप से अंगों की कथित तस्करी के ऐंगल का उल्लेख किया, जिसे एक सरकारी समिति ने भी उठाया था। अदालत के मुताबिक, इस दिशा में जांच पर्याप्त रूप से आगे नहीं बढ़ाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच में देरी, घटनास्थल को शुरुआती स्तर पर सुरक्षित नहीं रखना, बरामदगी से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास और जरूरी फॉरेंसिक सामग्री को समय पर रिकॉर्ड पर नहीं लाना जैसे पहलुओं ने जांच की विश्वसनीयता को प्रभावित किया। अदालत ने यह भी कहा कि गंभीर अपराध होने के बावजूद किसी व्यक्ति को केवल संदेह या अनुमान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपराध साबित करने के लिए सबूत कानूनी मानकों पर खरे उतरने चाहिए।