कांग्रेस ने उत्तराखंड में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटरों के नाम काटे जाने के लिए आवेदन दिये जाने के आरोप लगाए हैं। इसने आरोप लगाया है कि बीजेपी से जुड़े लोग SIR की प्रक्रिया का इस्तेमाल चुन-चुनकर मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटवाने के लिए कर रहे हैं। कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और मताधिकार पर हमला बताते हुए ‘वोट चोरी’ करार दिया है।

कांग्रेस ने रविवार को न्यूज वेबसाइट न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि उत्तराखंड की पांच विधानसभा सीटों पर पांच ऐसे लोगों ने क़रीब 6500 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आपत्तियां दाखिल कीं, जिनके बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि वे बीजेपी से जुड़े हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन पांचों लोगों ने राज्य की 70 विधानसभा सीटों में सबसे ज़्यादा संख्या में नाम हटाने की आपत्तियाँ दाखिल की हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि इन पांच लोगों द्वारा जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई, वे सभी मुस्लिम हैं।
ताज़ा ख़बरें

‘मुस्लिम वोटर निशाने पर’

उत्तराखंड कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट साझा करते हुए बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस ने कहा कि विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने ‘वोट चोरी’ का खेल शुरू कर दिया है। कांग्रेस के मुताबिक, रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड की पांच विधानसभा सीटों पर मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए सबसे ज्यादा आवेदन दाखिल करने वाले पांच लोग बीजेपी से जुड़े हुए हैं।

कांग्रेस ने खास तौर पर किच्छा विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण दिया। पार्टी के अनुसार, यहां नाम हटाने के लिए कुल 4857 आवेदन आए, जिनमें से 4855 आवेदन अकेले राजेश तिवारी ने दाखिल किए। रिपोर्ट के अनुसार, तिवारी बीजेपी के बूथ लेवल एजेंट यानी बीएलए हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि गदरपुर, खटीमा, नानकमत्ता और रुद्रपुर में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नामों को निशाना बनाकर आपत्तियां दाखिल की गई हैं।
हालाँकि, बीजेपी और उसके नेताओं का कहना है कि ये आवेदन कथित तौर पर डुप्लीकेट या दूसरी जगह पंजीकृत मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किए गए हैं और आपत्ति दाखिल होने मात्र से किसी मतदाता का नाम अपने आप नहीं कटता।

किच्छा में एक व्यक्ति ने दाखिल कीं 4855 आपत्तियाँ

न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक़, ऊधम सिंह नगर जिले की किच्छा विधानसभा सीट में नाम हटाने के लिए कुल 4857 आपत्तियां दर्ज हुईं। इनमें से 4855 आपत्तियां राजेश तिवारी की थीं। रिपोर्ट में हिंदुस्तान की एक खबर का हवाला देते हुए तिवारी को बीजेपी का बूथ लेवल एजेंट बताया गया है। न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार तिवारी से इस मामले में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

उनके ज्यादातर आवेदनों में नाम हटाने का कारण पहले से पंजीकृत बताया गया है। बीजेपी के पूर्व किच्छा विधायक राजेश शुक्ला ने हिंदुस्तान से बातचीत में दावा किया कि तिवारी की ओर से बूथ स्तर पर की गई एक आंतरिक जांच में किच्छा की मतदाता सूची में क़रीब 8000 ऐसे डुप्लीकेट मतदाताओं का पता चला, जिनके नाम उत्तर प्रदेश के बरेली, पीलीभीत और रामपुर जिलों में भी दर्ज हैं।

किच्छा में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 28.4 प्रतिशत बताई गई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तिलक राज बेहड़ ने बीजेपी के दो बार के विधायक राजेश शुक्ला को 10 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया था।

किच्छा में दाखिल आपत्तियों में पूर्व राज्य मंत्री रईस अहमद का नाम भी शामिल है। उनके नाम के सामने ‘shifted’ यानी स्थानांतरित होने का कारण बताया गया है। रईस अहमद ने कहा कि वह करीब 60 साल के हैं और उनका जन्म किच्छा में ही हुआ है। उन्होंने कहा कि वह दो बार पंचायत चुनाव लड़ चुके हैं और हरीश रावत सरकार में राज्य मंत्री का दर्जा भी प्राप्त कर चुके हैं। अहमद ने आरोप लगाया कि किच्छा में करीब 45 से 50 हजार मुस्लिम मतदाता हैं और पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। उनके मुताबिक, इसी वजह से मुस्लिम मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि उन्हें अभी तक नाम हटाने को लेकर कोई नोटिस नहीं मिला है और बूथ लेवल अधिकारी ने भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी है।

गदरपुर में 670 नामों पर एक व्यक्ति की आपत्ति

गदरपुर विधानसभा सीट पर भी बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल की गईं। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां 1370 नाम हटाने की आपत्तियां आईं, जिनमें से 670 आपत्तियां चंकित हूरिया ने दाखिल कीं जो सभी मुस्लिम नामों से जुड़े हैं।

रिपोर्ट में हूरिया के सोशल मीडिया प्रोफाइल का हवाला देते हुए उन्हें बीजेपी से जुड़े विभिन्न स्थानीय पदों पर रहने वाला बताया गया है। उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा कि वह बीजेपी के बीएलए-1 हैं और उन्होंने क़रीब 900 मतदाताओं की सूची पार्टी की ओर से तैयार की थी। हूरिया का दावा है कि उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे होने के कारण उन्होंने ऐसे मतदाताओं की पहचान की जो कथित तौर पर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दोनों जगह मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं। उनके मुताबिक, ऐसे डुप्लीकेट नाम हटाने के लिए स्थानीय ईआरओ यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर को आवेदन दिया गया। गदरपुर में बीजेपी के अरविंद पांडेय ने 2022 में तीसरी बार जीत हासिल की थी। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को 1120 वोटों से हराया था। 2017 में उनकी जीत का अंतर 14106 वोट था।

खटीमा में 394 में से 392 आपत्तियां एक व्यक्ति की

खटीमा विधानसभा क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल करने का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां नाम हटाने के लिए दाखिल 394 आवेदनों में से 392 आवेदन अमित कुमार पांडेय ने दिए। यह कुल आपत्तियों का करीब 99 प्रतिशत है।
मीडिया रिपोर्टों और उनके सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर उन्हें बीजेपी का खटीमा जिला उपाध्यक्ष और पार्टी का बूथ लेवल एजेंट बताया गया है। उनसे प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। खटीमा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पारंपरिक विधानसभा सीट रही है। धामी ने 2012 और 2017 में यहां से जीत हासिल की थी। लेकिन 2022 में कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी ने उन्हें 6579 वोटों से हरा दिया था। धामी बाद में चंपावत से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।

रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी 2022 में हारी 23 विधानसभा सीटों पर विशेष निगरानी कर रही है और खटीमा भी इनमें शामिल है। इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत है।

नानकमत्ता विधानसभा सीट पर 391 फॉर्म 7 आवेदन दाखिल किए गए। इनमें से 353 आवेदन किशोर जोशी के नाम से थे। यह कुल आवेदनों का करीब 90 प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक, किशोर जोशी खुद को बीजेपी का बीएलए बताते हैं। आवेदनों में उनका नाम डेटा एंट्री की गलती के कारण ‘किशार कुमार’ दर्ज होने की बात भी सामने आई। जोशी के 353 में से 351 आवेदनों में नाम हटाने का कारण एक ही बताया गया- ‘शिफ्टेड’ यानी व्यक्ति वहां से स्थानांतरित हो चुका है। जोशी ने कहा कि वह पहले बीजेपी के जिला महामंत्री, मंडल अध्यक्ष और युवा मोर्चा के प्रदेश सचिव रह चुके हैं। उनके मुताबिक, इस बार पार्टी ने उन्हें चुनावी प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारी दी है। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से बड़ी संख्या में लोगों के उत्तराखंड आने के कारण डुप्लीकेट मतदाता बने हैं।
उत्तराखंड से और खबरें

SIR में बड़े पैमाने पर आपत्तियों को लेकर नियम क्या हैं?

इस पूरे विवाद का एक अहम पहलू चुनाव आयोग के फॉर्म 7 और बल्क बड़ी संख्या में आवेदन से जुड़े नियम हैं। चुनाव आयोग के 2023 के मैनुअल में 'बल्क एप्लीकेशन' यानी बड़ी संख्या में आवेदन का मतलब ऐसे आवेदन से है, जो किसी व्यक्ति द्वारा एक ही परिवार से बाहर के कई लोगों के नाम हटाने के लिए दाखिल किया जाता है।

मैनुअल में बीजेपी जैसे राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों के लिए भी प्रावधान था। इसके तहत बीएलए एक दिन में 10 से अधिक आवेदन नहीं दे सकता था। ऐसे आवेदनों के साथ लिखित घोषणा और आवेदन की सूची भी देना ज़रूरी था।

मैनुअल के अनुसार, अगर कोई बीएलए आपत्ति दर्ज करने की पूरी अवधि के दौरान 30 से ज़्यादा आवेदन करता था तो ईआरओ या एईआरओ को व्यक्तिगत रूप से मामले का क्रॉस-वेरिफ़िकेशन करना होता था। हालाँकि, SIR की अलग-अलग प्रक्रियाओं के दौरान इन नियमों में बदलाव भी हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल कुछ राज्यों में एक दिन में आवेदन की सीमा बढ़ाकर 50 कर दी गई थी। इस साल पश्चिम बंगाल एसआईआर से संबंधित एक पत्र में यह सीमा पूरी तरह हटा दी गई, लेकिन पांच से अधिक फॉर्म दाखिल करने वाले व्यक्ति के मामलों की अनिवार्य समीक्षा का प्रावधान रखा गया।

बीजेपी ने आरोपों को खारिज किया

उत्तराखंड बीजेपी के प्रवक्ता विनोद चमोली ने बड़ी संख्या में आवेदनों और मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाए जाने के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि उसका नाम अपने आप मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा। मतदाताओं को अपने रिकॉर्ड की पुष्टि करने और जरूरी दस्तावेज जमा करने का पूरा मौका दिया जाता है। चमोली ने कहा कि उत्तर प्रदेश के रामपुर और मुरादाबाद जैसे सीमावर्ती जिलों के साथ मतदाता सूची में संभावित दोहरे पंजीकरण की जाँच एक सतत प्रक्रिया है। अगर कोई नाम वास्तव में डुप्लीकेट या अमान्य पाया जाता है, तभी उसे नियमों के अनुसार हटाया जाएगा।

दूसरी ओर, कांग्रेस का आरोप है कि बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल करने वाले लोग बीजेपी से जुड़े हैं और जिन मतदाताओं के नामों को निशाना बनाया गया है, उनमें मुस्लिमों की संख्या असामान्य रूप से ज्यादा है। पार्टी का कहना है कि चुनाव से पहले एसआईआर के ज़रिए एक खास समुदाय के मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक हर मामले में सत्यापन, नोटिस और सुनवाई के बाद ही अंतिम फैसला होगा। इसलिए यह विवाद अब इस बात पर टिका है कि सितंबर में प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची में कितने नाम वास्तव में हटते हैं, कितने नाम बरकरार रहते हैं और जिन नामों पर आपत्तियां दर्ज हुई हैं, उनकी जांच किस तरह की गई।