बेंगलुरु में फ़ेसबुक पर की गई एक पोस्ट के ख़िलाफ़ जो कुछ हुआ वह भारत के मुसलमानों को अकारण उस कटघरे में ला खड़ा कर देता है जिसके वे हक़दार नहीं । वे पूरे भारत के स्तर पर इस समय उत्पीड़ित हैं पर बेंगलूरू में वे दंगाई हैं । यह जो विरोधाभास है वही आज की दुनिया में मुस्लिम समाज के सामने गंभीर चुनौती है, सुनिये शीतल पी सिंह को
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।













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