नोटबंदी के आँकड़ों के आधार पर लंदन स्कूल ऑफ़ इकानामिक्स में किया गया एक अध्ययन बताता है कि लॉकडाउन के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज को बचाने के लिये कम से कम ढाई लाख करोड़ रुपए बाँटने पड़ेंगे। वजह यह है कि क़रीब पचास फ़ीसदी आबादी की ख़रीदारी की ताक़त लॉकडाउन खुलने तक शून्य हो चुकेगी। रिटायर्ड आई ए एस राजू शर्मा से यही पूछ रहे हैं शीतल पी सिंह।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।













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