धार्मिक-जातीय समुदायों की भावनाएं इतनी ज़्यादा क्यों आहत हो रही हैं? क्या ये नस्लवाद सोच की उपज है? आख़िर ये आहत भावनाओं का नरैटिव कहाँ निर्मित हो रहा है?
लेखक सत्यहिंदी के संपादक हैं। वह लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी लिबरल एंड क्रिएटिव आर्ट्स के पूर्व डीन हैं। पत्रकार, टीवी एंकर, लेखक, कवि और अनुवादक के तौर पर रचनात्मक लेखन कार्य करते रहे हैं।


























