किसानों के आंदोलन के चलते विवादित क़ानूनों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे दिये जाने से कोई फ़र्क़ न पड़ा । टिप्पणीकारों, आंदोलन रत किसान नेताओं और क़ानूनविदों ने एक स्वर से इस पर संशय व्यक्त किया है । देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था पर इस क़िस्म का अविश्वास देश के लोकतंत्र के लिये क्यों ख़तरे की घंटी है विश्लेषित कर रहे हैं शीतल पी सिंह
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।




















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