दुनिया की अर्थव्यवस्था एक लंबी मंदी की शिकार है। उबरने के जो रास्ते अपनाए गए उन्होंने ग़रीबी और अमीरी की खाई को ख़तरनाक मुकाम तक पहुँचा दिया। राजनैतिक नतीजा यह निकला कि झूठे भरोसे देकर पनपे, तानाशाही लादने को तत्पर और लोकतंत्र को धता बताने वाले नेताओं का उभार होता नज़र आ रहा है। रिटायर्ड आईएएस राजू शर्मा से यही सवाल पूछ रहे हैं शीतल पी सिंह।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।
















.jpg&w=3840&q=75)








