जब पुलिस ने चाहा, तो दिल्ली में दंगा तीन दिन तक चलता रहा और जब नहीं चाहा तो तीन घंटे में रोक दिया। अब मारे गये लोगों की लाशों में धर्म के आधार पर ‘सफलता’ की पहचान की जा रही है। बहुत सारे लोगों को अभी संतोष नहीं हुआ है। इस दंगे के बाद सामुदायिक बंटवारा और गहरा हो गया है। राजनीति इसकी अच्छी फसल काटेगी। दिल्ली दंगों पर सुनिए, वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का विश्लेषण।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।

























