न कभी देखा था न सुना था पर अब देख भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं। गोरखपुर की ट्रेन राउरकेला पहुँचती है और सिवान की आसनसोल, और ऐसा एक-दो नहीं चालीस ट्रेनें करके दिखाती हैं! रेलवे बिना पानी दिये बिना खाना दिये अस्सी-अस्सी घंटे सवारियों को भारत भ्रमण कराता रहता है। भूख-प्यास से दम तोड़ते बच्चे, औरतें, वयस्क रोगी ठहरा दिये जाते हैं और देश में सब कुछ सामान्य बना रहता है! इस पर रोयें कि हँसे? पूछ रहे हैं शीतल पी सिंह।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।













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