ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वतीऔर उनके शिष्यों के साथ मौनी अमावस्या के दिन, प्रयागराज केमाघ मेले में, पुलिस द्वारा हुए बर्बरव्यवहार पर कोई भी बात शुरू करने से पहले यह बताना जरूरी है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती RSS के छात्र संगठन, अखिल भारतीयविद्यार्थी परिषद(ABVP) के कार्यकर्ता रह चुके हैं, और इसकी मदद सेयूनिवर्सिटी चुनाव लड़कर जीत चुके हैं. यह बताना भी जरूरी है कि शंकराचार्य  ने खुलकर 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का समर्थन भी किया था. 
इतना ही नहीं इन्होंने मई 2025 में राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बर्खास्त करने और किसी भी मंदिर में प्रवेश ना दिए जाने की भी घोषणा की थी. उनकी इस घोषणा की आलोचना ना कभी राहुल गांधी ने की और न ही कांग्रेस पार्टी ने. शंकराचार्य की इस घोषणा को कांग्रेस ने साक्षी भाव से सुन लिया. यह जानकारी देना इसलिए जरूरी है क्योंकि वैसे तो शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती किसी भी राजनैतिक दल के नहीं हैं, वो सिर्फ़ हिंदू धर्म के प्रति प्रतिबद्ध हैं. उन्हें किसी भी दल के साथ जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन जो बात स्पष्ट रूप से कहीं जा सकती है वो ये है कि उनको कम से कम कांग्रेस के साथ तो बिल्कुल नहीं जोड़ा जा सकता.लेकिन बीजेपी और उनके तमाम फ्रिंज संगठन/एलिमेंट्स उन्हें विपक्ष के साथ जोड़कर दिखाना चाहते हैं जिससे शंकराचार्य के अपमान और नाराज़गी को एक राजनैतिक रंग मेंतब्दील किया जा सके.
माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरुस्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती, परंपरानुसार, अपने शिष्यों के साथ अपने रथ में संगम की ओर स्नान के लिए बढ़ रहे थे तभी प्रशासन के लोगों ने उनका मार्ग अवरुद्ध किया और उन्हें रथ से उतरने को कहा. शंकराचार्य ने बताया कि जब उन्होंने परंपरा का हवाला दिया और कहा कि वो ऐसे ही जाएँगे तो प्रशासन असभ्यता पर उतारू हो गया. पुलिस और प्रशासन के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में शंकराचार्य के 12-14 साल के शिष्यों को उनकी शिखा पकड़कर शर्मिंदा किया गया, उन बच्चों पर लाठियां चलायी गयीं,उन्हें भद्दे शब्द कहे गए, उन बच्चों को अपमानित करने में पुलिसके अधिकारियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. 
इस प्रशासनिक गुंडागर्दी पर विरोध शुरू हुआ तो उत्तर प्रदेश प्रशासन की ओर से शंकराचार्य को नोटिस भेजकर उनके शंकराचार्य होने को संदिग्ध बताया गया. सभी जानते थे यह सब किसके इशारे पर हो रहा है. पूरे विश्व को पता है कि इस देश में 4 शंकराचार्य हैं और इसके अतिरिक्त चाहे वो रामभद्राचार्य हों, भूत भगाने वाले धीरेंद्र शास्त्री हों या सैकड़ों कथावाचक हों जिनके कार्यक्रम दिन रात टेलीविज़न चैनलों पर आते रहते हैं उनमे से कोई भी व्यक्ति धार्मिक मर्मज्ञता में शंकराचार्यों को नहीं पा सकता.हर एक शंकराचार्य के हिस्से में भारत की लगभग एक चौथाई हिंदू धार्मिक चेतना आती  है. हालांकि संविधान और आधुनिक भारत से उनकी सहमति-असहमति एक अलग मुद्दा है, जिस पर यहाँ अभी चर्चा करना ज़रूरी नहीं है.
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात है, धर्म को राजनीति से स्वतंत्र किए जानेऔर पुलिस का उद्दंड व्यवहार. पुलिस क्या सोचकर किसी पर हाथ उठाती है और लाठियाँ भांजना शुरू कर देती है, कानून में पुलिस द्वारा इस तरह पीटे जाने को लेकर कोई व्यवस्था नहीं की गई है इसके बावजूद आए दिन यह सुनने और देखने कोमिलता है कि पुलिस लंगड़ाते हुए आरोपी को लेकर वीडियो बनवाती है, उसके पैर में गोली मारकर वीडियो बनाती है. उत्तर प्रदेश शासन को लगता है कि बलात्कार या छेड़छाड़ के अपराधी को पीटने से और उसकी परेड करवाने से जनता बहुत खुश होगी वाहवाह करेगी और उनकी व उनके नेता की ‘लॉ एंड ऑर्डर’ वाली ख्याति बढ़ेगी?
सवाल यह है कि न्यायालय तक पहुँच से पहले पुलिसिया न्याय देने के इस तरीके पर न्यायालयों ने आपत्ति क्यों नहीं की? चाहे बलात्कारी हो या क़ातिल उसको सजा देने का काम न्यायपालिका का है पुलिस का नहीं लेकिन उतावलेपन में पुलिस ने इस न्यायिक व्यवस्था को बर्बाद कर दिया है. एक मामला जिसमें एक पुलिस अधिकारी सड़क पर नमाज़ पढ़ने वाले कुछ लोगों को पीछे से लात मार करअपमानित कर रहा था, वह इसी किस्म के उतावलेपन का प्रतीक था. उस समय ग़ैर-मुस्लिमों को बहुत आपत्ति नहीं हुई. लेकिन यह यूपी की ‘नई पुलिस’ का दृष्टिकोण है जिसमें भारतीय नागरिकों को सिर्फ़ इसलिए अपराधी मान लिया जा रहा है क्योंकि पुलिस को ऐसा लगता है कि यह अपराध है. मतलब यूपी में पुलिस ही तय कर रही है कि अपराधी कौन है? यही लॉ एंड ऑर्डर है ना, जिसका विज्ञापन हर अख़बार में किया जाता है? 
इस ख़तरनाक़ सोच को कभी चुनौती क्यों नहीं दी गई? और शायद चुनौती नहीं देने का ख़ामियाज़ा है जो शंकराचार्य और उनके कम उम्र शिष्यों को भुगतना पड़ा. आख़िर पुलिस कौन होती है छोटे छोटे बच्चों के मुँह पर पैर रखकर मारने वाली? उनके नंगे पैरों पर जूते रगड़ने वाली? यह सब देखकर उन बच्चों को कैसा लगा होगा? क्या वे कभी भी इस दृश्य को भूल पाएंगे? उत्तर प्रदेश शासन का यह ‘सबक सिखाने’ वाला नज़रिया पूरी तरह से वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में डाल रहा है और भारतीय लोकतंत्र को शर्मिंदा कर रहा है. लोगों को बुरी तरह पीटना यह पुलिस का मैंडेट नहीं है, लोगों की रक्षा करना और अपराध रोकना यह पुलिस का मैंडेट है. 


नोएडा में एक डूबते हुए 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर, युवराज मेहता को बचाना यह पुलिस और प्रशासन का काम था, इस काम में वह फेल हो गयी. जब कुछ गुंडे छद्मवेशधारी हिंदू धर्म की आड़ लेकर पार्क में जाकर युवा कपल को धमकाते हैं तो इसे रोकना पुलिस का मैंडेट है, जब किसी इख़लाक़ या पहलू ख़ान को पीट-पीटकर मार दिया जाता है तो उन्हें मरने से बचाना पुलिस का काम है, सेंगरों की धरपकड़ करना पुलिस का काम है, इससे पता चलता है कि पुलिस में स्पाइन है और वो कानून के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध है. लेकिन जब पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रोंको दुश्मनों की तरह पीटती है या सत्ता धारी पार्टी की विचारधारा से इत्तेफाक ना रखने वाले हर व्यक्ति को स्कोल्ड करती है, अपमानित करती है तो ऐसी पुलिस पर शक़ होता है, ऐसी पुलिस को पुलिस मानना ही नहीं चाहिए जो निहत्थों को अपने जूतों से मारते हैं. यह भारतीय नहीं औपनिवेशिक चरित्र है जो सत्ता के सामने तो डरा और कांपता रहता है, लेकिन बाक़ी लोगों का उत्पीड़न करने से बाज़ नहीं आता.

अगर (मोदी/योगी) सरकार का विरोध किए जाने पर हिंदू धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य को अपमानित किया जा सकता है तो किस आधार पर बीजेपी ख़ुद को हिंदुओं की पार्टी मानती है? बीजेपी और मोदी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि शंकराचार्य को इस तरह अपमानित क्यों किया गया?

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को औरंगज़ेब की संज्ञा दी क्योंकि उन्हें लगता है कि योगी आदित्यनाथ ने यूपी में बहुत से मंदिरों को तोड़ा है. शंकराचार्य की आपत्ति वाराणसी और अयोध्या में तोड़े गए मंदिरों को लेकर थी. इसके अलावा शंकराचार्य गोरक्षा को लेकर भी प्रतिबद्ध हैं और इसे लेकर पीएम मोदी और सीएम योगी की आलोचना करते रहे हैं. पर यह सब इन दोनों नेताओं को अच्छा नहीं लगता. सोचकर देखिए ख़ुद को हिंदुओं की सबसे बड़ी रक्षक का विज्ञापन करने वाली पार्टी, हिंदू ह्रदय सम्राट का चोला धारण करने वाले इनके लीडर, हिंदुओंके सबसे बड़े धर्माचार्य शंकराचार्य की आलोचना भी सहन नहीं कर सकती. ऐसा क्यों है?
क्या बीजेपी यह चाहती है कि बड़ा-से बड़ा संत भी उनके इशारे पर चले, उनके धार्मिक-राजनैतिक खेल का हिस्सा बने? शायद बीजेपी के इस खेल को 1200 साल पुरानी शंकराचार्यों की संस्था ने समझ लिया है और ऐसे खेलों को नकार भी दिया है. यह सोचने वाली बात है कि जो अखाड़े शंकराचार्यों की सेवा के लिए बने थे, जिनका काम ही था शंकराचार्यों की पालकी उठाना और उनकी सहूलियतों का ख्याल रखना; उन अखाड़ों का पूरी तरह बीजेपीकरण हो चुका है. 50 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अखाड़ा परिषद का निर्माण करवाया था जिससे साधु संतों के बीच सामंजस्य और समरसता बनी रहे लेकिन वर्तमान बीजेपी की राजनीति सिर्फ़ और सिर्फ़ विभाजन पर ही आधारित है. एकजुट और संगठित समाज बीजेपी को डराता है, इसलिए वो हर स्तर पर विभाजन करवाना चाहते हैं, ताज्जुब की बात तो यह है कि बीजेपी ने ऐसे विभाजन हिंदू धर्म में ही करवा डाले.
मेरा सवाल यह है कि जब अखाड़े हिंदू धर्म के सर्वोच्च प्रतिनिधि शंकराचार्यों का सम्मान नहीं कर रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इन अखाड़ों के संतों का सम्मान क्यों किया जाना चाहिए? मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर आदि लोगों को सम्मान की नजर से क्यों देखा जाना चाहिए? किसी कथावाचक के प्रति सम्मान क्यों होना चाहिए? अगर ये सभी मिलकर अपने सबसे उच्च प्रतिनिधि को बीजेपी सत्ता के घमंड से बचा नहीं सकते तो ये सब क्यों और कैसे सम्मान के हक़दार हो गए?

अगला सवाल यह भी है कि अगर हिंदू धर्म के सर्वेसर्वा गुरु, सम्मान के हक़दार नहीं हैं तो ये तथाकथित हिंदू-हित का ढिंढोरा पीटकर सत्ता का मज़ा चखने वाले और हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को क्यों न पूरी तरह से नकार दिया जाय? ऐसे नफरती लोगों को क्यों बर्दाश्त किया जाय, ऐसी पार्टी को क्यों वोट दिया जाय, इसे अस्तित्व में ही क्यों रखा जाय जो राजनीति तो हिंदुओं के नाम की करते हैं लेकिन शंकराचार्यों को सम्मान नहीं दे सकते?

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने गोरक्षा का आह्वान किया है जिसके लिए वो प्रतिबद्ध हैं और सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर हैं इसके बाद भी यूपी में बीफ का व्यापार फल-फूल रहा है.
गायों को काटा न जा सके इसके लिए भी जो कानून है वो जवाहरलाल नेहरू के काल का है. इस सरकार ने तो कुछ किया ही नहीं सिवाय अल्पसंख्यकों की दुकानों को ध्वस्त करने के. आंकड़े बताते हैं कि यूपी बीफ एक्सपोर्ट के मामले में देश में पहले नंबर पर है. देश का लगभग 50% गाय का मांस यूपी से ही निर्यात होता है. यूपी में लगभग 74 बूचड़खाने और प्रसंस्करण संयंत्र हैं. बीजेपी नेता संगीत सिंह सोम तमाम ऐसी कंपनियों में डायरेक्टर रहे हैं जो बीफ निर्यात का काम करती हैं. जनवरी 2026 में, सरधना से समाजवादी पार्टी के विधायक अतुल प्रधान ने सार्वजनिक रूप से नए दस्तावेज़ पेश करते हुए दावा किया कि पूर्व भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम और उनकी पत्नी सिमरन ठाकुर अभी भी परोक्ष रूप से मांस आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी कंपनियों से सम्बद्ध हैं. बीजेपी ने ऐसी ही एक कंपनी अल्लाना ग्रुप से इलेक्टोरल बांड के माध्यम से चंदा लिया है.

बीजेपी में सब कुछ बहुत घालमेल है. किसी भी वादे की कोई पूर्ति नहीं है. 2014 में काला धन वापस लाने के लिए पीएम मोदी ने एक कमेटी का वादा किया थाऔर सत्ता में आए थे. भारतीय रुपया, अमेरिकी डॉलर से मजबूत होगा यह भी वादा किया था, गाय को माँ की तरह पूजने के अभिनय और मंचन किये गए थे, लेकिन बीफ निर्यात और भी बढ़ता गया. किसी भी वादे को पूरा नहीं किया गया.
लेकिन भारत के शंकराचार्य ऐसे नहीं होते. जो कहते हैं वो करते हैं. वो बात आधुनिक है या नहीं यह अलग बात है लेकिन उनकी ईमानदारी और सादगी व धर्म के प्रति दार्शनिकता और पूर्ण निष्ठा पर किसी प्रकार का शक नहीं किया जा सकता.

आदि शंकराचार्य से लेकर शंकराचार्यों की पूरी परंपरा स्वभाव में सिर्फ़ धार्मिक नहीं है बल्कि इसका महत्व बौद्धिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता से भी है. ये शंकराचार्य ही हैं जो भारत को एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में समझते हैं, जहाँ भिन्न भिन्न भाषाओं और मतों के होने के बावजूद एक किस्म की राष्ट्रीय एकता है. यही सांस्कृतिक एकता आज़ादी के संघर्ष के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के ख़िलाफ़ हथियार के रूप में भी काम आई. शंकराचार्य धर्म की तर्कशीलता पर ज़ोर देते हैं, आडंबरों को किनारे करते हैं और पूर्वराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मानें तो शंकराचार्यों ने भारत का धार्मिक-दार्शनिक मानचित्र खींच दिया है. 
यह सब किसी कथावाचक या पोर्श (Porsche) कार से घूमने वाले रंगीन बाबाओं के बस की बात नहीं है. शंकराचार्यों का स्वभाव ही है जो धर्म विरुद्ध होगा उसे मुँह पर कहेंगे, उसके लिए किसी का मुँह नहीं देखेंगे. लेकिन संभवतः यह सब घमंड में चूर सत्ता और लालच से मजबूर पोर्श वाले बाबाओं को पसंद नहीं आ रहा है. शंकराचार्यों को सरकार का पद्म विभूषण नहीं चाहिए उनके लिए धर्म की सेवा करना ही सबसे बड़ा पुरस्कार है. ऐसे लोगों का तिरस्कार यह बताता है कि आम हिंदू नागरिक कितना असुरक्षित और दयनीय अवस्था में है और यह भी बताता है कि ऐसे शासन के अंतर्गत उन लोगों के हालात क्या होंगे जो ग़ैर-हिंदू हैं. लोकतंत्र में आलोचना का स्वागत सिर झुकाकर किया जाना चाहिए,लाठियाँ भांजकर नहीं. आज जो दल सत्ता पर काबिज़ है उसे भारतीय और संवैधानिक तरीकों को सीखना पड़ेगा, नहीं सीख सकती तो सत्ता से उतर जाए.