दिल्ली में प्रदूषण पर मोदी सरकार ने क्या किया?
आप सभी को दिवाली बहुत मुबारक़ हो, लेकिन वायु प्रदूषण मुबारक़ नहीं हो सकता, पर दिवाली के साथ ये बड़ी भारी मात्रा में आ जाता है, फिर से दिवाली आयी और साथ में वायु प्रदूषण को लेकर आई। दिवाली के कारण फोड़े जाने वाले पटाखे, ठंडक, पराली, कारों का धुआँ और कुछ अन्य कारक मिलकर आने वाले कुछ महीने तक भारत को कैंसर का गढ़ बनाकर रखेंगे। बहुत लचर, कमजोर और निराशाजनक सरकारी नियंत्रण ने हर लिहाज से वायु प्रदूषण के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई को कमजोर किया है। येल सेंटर फॉर एनवायरमेंटल लॉ एंड पॉलिसी और कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक’ में भारत को 177 देशों में 176वाँ स्थान मिला है। भारत सिर्फ़ लाओस से बेहतर अवस्था में है। इसका मतलब ये है कि जैव-विविधता को नुक़सान, जंगलों की बेशुमार अंधाधुंध कटाई, घटता वन क्षेत्र और बदहाल वायु गुणवत्ता भारत की अब नई पहचान बन रही है। नरेंद्र मोदी सेना के जवानों के साथ दिवाली मनाने कहीं बाहर गए हैं, सुरक्षा कारणों से यह नहीं पता कि पीएम दिवाली कहाँ मनायेंगे लेकिन यह तो तय है कि वो दिल्ली में नहीं रहेंगे।
स्विस शोधकर्ता समूह iQAir के अनुसार, दिवाली से एक दिन पहले शनिवार की सुबह दिल्ली बड़े शहरों में दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था। इसके अनुसार भारत में दिवाली के एक दिन पहले AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 581 था जबकि पड़ोस में स्थित लाहौर में यह 285 यानी आधा था। भारत के अपने मापांकों के अनुसार भी दिल्ली की हवा ‘बहुत ख़राब’ की श्रेणी में थी। सरकार की असफलता इस स्तर पर पहुँच चुकी है कि दिवाली के बाद दिल्ली में स्कूल बंद किए जाने की योजना है। सरकार ने आदेश दिया है कि स्कूल और ऑफिस घर से ही ऑनलाइन संचालित किए जाएँ। इसका मतलब यह है कि भारत सरकार इतनी अधिक लाचार है कि उसके पास देश को ‘ठप’ कर देने के अलावा कोई उपाय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का नाम भी नहीं लेना चाहिए क्योंकि वहाँ देश के सर्वाधिक सम्मानित और विशेषाधिकार वाले लोग बैठते हैं। जो सरकारी सुविधा के लिए सुनवाई आगे बढ़ा देते हैं, सरकार को मौक़ा देते हैं और साल दर साल लोग भारत में वायु प्रदूषण से मरते जा रहे हैं।
'2023 में 20 लाख लोग वायु प्रदूषण से मरे'
FICCI-EY द्वारा किया गया अध्ययन बताता है कि भारत में साल 2023 में 20 लाख लोग वायु प्रदूषण से मरे थे। लगभग यही आंकड़ा ‘स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर रिपोर्ट-2025 का है, इसके अनुसार भारत में हर एक मिनट में 4 लोग वायु प्रदूषण की वजह से मर जाते हैं। भारत का ऐसा हाल इसलिए है क्योंकि यहाँ बातों के वीर ही हैं जो उच्च पदों पर आसीन हैं उच्च अधिकारों से लैस हैं पर जवाबदेही के नाम पर बस ज़ीरो और ज़ीरो है। दूसरी तरफ़ चीन और यूरोप जैसे क्षेत्र हैं जहाँ बहुत तत्परता के साथ इस दिशा में काम किया गया। चीन ने 2013 से 2023 के बीच में अपने यहाँ PM2.5 के स्तर को लगभग 56.6% तक कम कर लिया। जिसकी वजह से लगभग 9 लाख मौतों को टाला जा सका है। यूरोपीय संघ ने भी 2005 से 2023 के बीच में PM2.5 की वजह से होने वाली मौतों को 57% तक घटा लिया।
लेकिन अभी भी दुनियाभर में वायु प्रदूषण से मौतों का सिलसिला रुक नहीं रहा है।
पूरी दुनिया वायु प्रदूषण से परेशान है और जितना संभव है उससे लड़ भी रही है। दुनिया के किसी भी प्रबुद्ध वर्ग में इस बात को लेकर दो राय नहीं है कि वायु प्रदूषण एक ‘डेविल’ है जिससे ना सिर्फ़ बच के रहना ज़रूरी है बल्कि इसे सामूहिक प्रयास से ख़त्म या नियंत्रित किया जाना इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। लेकिन जब भी मैं भारत में नजर दौड़ती हूँ तो मुझे लापरवाह लोगों के अनगिनत समूह दिखाई पड़ते हैं। ये सभी ‘मान्यताप्राप्त बुद्धिजीवी’ हैं। बीते कुछ सालों में भारत में ऐसे मान्यताप्राप्त बुद्धिजीवियों का एक बड़ा समूह उभर गया है जो धर्मजीवी है। ऐसे समूह वैसे तो हर धर्म में है लेकिन इसमें हिंदू धर्म खास इसलिए है क्योंकि भारत में बहुसंख्यक आबादी का धर्म हिंदू है। इसमें हजारों ऐसे हैं जो कथा कर रहे हैं, कोई धर्म के नाम से योग का खेल खेल रहा है, तो भजन-कीर्तन के नाम पर और कोई ऐसा है जो ‘पर्ची’ निकालकर अपने काम को ‘अंजाम’ दे रहा है।
एक ऐसा धर्मजीवी वर्ग है जो अंग्रेजीभाषी है और दार्शनिक के रूप में विख्यात हो रहा है तो कोई ऐसा है जो अमानवीय जाति प्रथा के निचले पायदान पर स्थित भारतीय लोगों को टारगेट कर रहा है। लेकिन मोटे तौर पर सभी का उद्देश्य धर्म की आड़ लेकर दूसरों का शोषण करना है और अपना जीवनयापन करना है। ये लोग मासूम भारतीयों की पवित्र ‘भक्ति भावना’ को अपने निजी जीवन के विलासितापूर्ण उत्थान के लिए ‘हार्वेस्ट’ करने में लगे हुए हैं। इनमें से कोई भी कभी भी प्रदूषण और इसके प्रभावों के बारे में चर्चा करता हुआ नहीं मिलेगा, कोई ऐसा धार्मिक नेता नहीं मिलेगा जो साहस करके दीपावली को सिर्फ़ प्रकाश पर्व के रूप में मनाने की वकालत करे और पटाखों से दूरी बनाने को बोले, कोई यह बोलने वाला नहीं मिलेगा कि नदियाँ बुरी हालत में हैं उन्हें ठीक करने के लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।
प्रदूषण पर धर्म गुरु क्या कर रहे हैं?
मैं किसी धर्मजीवी का नाम नहीं लूँगी लेकिन लोगों को अपने पसंद के धर्म गुरुओं के बारे में विचार करना चाहिए। और सोचना चाहिए कि आख़िरी बार कब उन्होंने भारत के पर्यावरण, भारत की नदियों और भारत की हवा के बारे में बात की थी। उन्होंने कब आख़िरी बार भारत में नक़ली पनीर, नक़ली दूध और ख़राब पानी पर बात की थी और वर्तमान सरकार पर दबाव बनाने का काम किया। आमजन की सेवा, आमजन का कल्याण और उत्थान यही तो संतों और धर्मगुरुओं का काम है लेकिन इन लोगों ने कब अपने इस काम को पूरा किया? आप जिसकी भी कथा सुनते हैं, आप जिस भी व्यक्ति से ‘जीवन जीने की कला’ और ‘योग’ आदि सीखते हैं और उन्हें मानते हैं कभी इनके घरों और कार्यालयों में जाकर देखिए, हर जगह एयर प्यूरीफ़ायर लगे हुए हैं, कभी इनकी कारों में बैठकर देखिए, यहाँ भी कार एयर प्यूरीफ़ायर लगे हुए हैं, उनकी कारों, उनके एयर कंडीशंड तथाकथित आश्रमों में किसी भी सुविधा की कमी नहीं है, कभी इनके द्वारा खाये जाने वाले फल और सब्जियों पर ध्यान दीजिए इनको उपलब्ध घी, दूध और दही का स्तर देखिए आप दंग रह जाएँगे। सब कुछ ‘ऑर्गेनिक’ है।
कोई मिलावट नहीं, पर करोड़ों की संख्या में आम भारतीय रोज़मर्रा के खाने में ज़हर खाने को बाध्य हैं क्योंकि सरकार का नियामक तंत्र बुरी तरह फेल है और सरकार पर सवाल उठाने के लिए मीडिया उसके चरणों में लेटा हुआ है, आम आदमी को न तो सामान्य समझ है और अगर है भी तो उसकी आवाज़ इतनी बुलंद नहीं कि देश के आकाओं की दीवारों में कंपन पैदा कर दे और धर्मगुरु, जिसके पास वो परेशान और लाचार होकर पहुँचता है वह धर्मगुरु उन्हें एक ही कथा को लाखों बार सुनाकर अपना जीवन लक्जरी से भर रहा है। ये धर्मजीवी लोग कभी भी सरकार से आम लोगों के पक्ष में सवाल नहीं पूछते। मैं नहीं कहती कि ये सारे धर्मगुरु पत्रकार बन जाएँ लेकिन जब लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की बात हो तब तो इन्हें आगे बढ़ना ही चाहिए और सरकार पर लोकतांत्रिक दबाव डालना ही चाहिए। आख़िर जब लोग ख़राब हवा से मरेंगे तो कौन आयेगा इनकी बार बार सुनाई जाने वाली कथा को सुनने और मंदिरों में दर्शन करने? इनके बेसुरे भजनों को सुनने कौन आएगा?
ये धर्मजीवी जीवन से जुड़े मुद्दों पर चुप क्यों रहते हैं, क्या इनकी कोई मजबूरी है? क्या ये लोग वर्तमान सरकार पर दबाव डालने से डरते हैं, क्या इनके आश्रमों की ज़मीनें ख़तरे में आ सकती हैं या इनकी लग्ज़री छीनी जा सकती है? कोई तो बात है।
जब भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान का घर बुलडोज़र से गिराया जा सकता है तो क्या पता किसी रामकथा कहने वाले कवि की ‘कुटीर’ भी अवैध हो, क्या पता उत्तराखंड में हजारों एकड़ ज़मीन पर योगाश्रम बनाने वालों की ज़मीन भी अवैध निकले, हो सकता है कोई साधु और तथाकथित दार्शनिक वाक़ई अपनी पत्नी का हत्यारा निकल आए और उसे जेल हो जाये? मेरा अटल मानना है कि दबाव सिर्फ़ वही डालता है जो ईमानदार, निश्छल और वाक़ई संत स्वभाव का हो जैसे- महात्मा गांधी और संत रविदास जैसे लोग!
साफ हवा जीवन का अधिकार
भारत के लोगों के लिए यहाँ का संविधान बनाया गया, यहाँ की व्यवस्थाएं विकसित की गईं जिससे यहाँ के आम लोगों का जीवन बेहतर हो सके। लेकिन सबसे बुरा जीवन आम लोगों का ही है। यहाँ साम्यवादी व्यवस्था स्थापित नहीं की गई थी, सभी को कमाने की छूट थी। व्यवस्था की गई कि जो जितना कमाये उतना बेहतर जीवन जी सके। लेकिन कुछ बातें थीं जिनकी जिम्मेदारी सरकारों पर थी, जैसे- अवसर की समानता, स्वच्छ पर्यावरण, कानून के समक्ष समता आदि। स्वच्छ पर्यावरण जिसमें साफ़ पानी, साफ़ वायु और भोजन सभी आते हैं, इसे ‘जीवन का अधिकार’ (अनुच्छेद-21) माना गया जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती है।
इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 47 और 48A में स्वच्छ पर्यावरण और बेहतर पोषण स्तर की बात प्रमुखता से की गई। लेकिन जिन्हें इस अवहेलना को मॉनिटर करना था वो सिर्फ़ ‘सुनवाई’ कर रहे हैं, ‘कार्यवाही’ नहीं कर पाते, जिन्हें इस अधिकार को अमल में लाना था, यानी सरकार और कार्यपालिका, वो अपनी और ‘अपनों’ की जेबें भर रहे हैं, चुनाव चोरी कर रहे हैं और सत्ता में सभी अधिकार प्राप्त करने के बावजूद, सब कुछ नियंत्रण में लेने के बावजूद सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। लोगों की आँखों में धूल झोंक रहे हैं और उन्हें संदेह के घेरे में खड़ा करके भ्रमित करने में लगे हैं।
मोदी सरकार की ‘पॉलिसी पैरालिसिस’!
सच्चाई ये है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ से गुज़र रहा है। अपनी कमियाँ छिपाने के लिए मोदी कभी जवानों से मिलते हैं, कभी जवानों की बातें करते हैं। कभी मन्दिर जाते हैं तो कभी धीरेंद्र शास्त्री जैसों से मिलकर पीएम पद की गरिमा को गिराते हैं तो कभी फ़िल्मी और खेल सेलिब्रिटी के साथ वक़्त गुजारते हैं लेकिन देश के लोगों को साफ़-सुथरी हवा मिल सके, स्कूल कॉलेज सुचारू रूप से चल सकें, इस पर उनका कोई ध्यान नहीं है। भारत पूरी तरह से वायु प्रदूषण की गिरफ्त में है, जीवन का अधिकार होते हुए भी भारत में जीवन सबसे सस्ता है जिसके चले जाने पर सरकार को कोई ख़ामियाजा नहीं भुगतना पड़ता और देश का धार्मिक ढाँचा इस तरह से निर्मित हुआ है कि वो भी आम लोगों के हितों के लिए नहीं सिर्फ़ अपने हितों के लिए काम कर रहा है। धर्म दिवाली मनाने की ज़िद तो पैदा करता है, पटाखे को भारतीय संस्कृति से भी जोड़ डालता है लेकिन जब लोग साँस की बीमारियों से मर रहे होते हैं तब वो इसे ‘प्रभुकृपा’ कहकर पल्ला झाड़ लेता है। अब लोगों को अपनी मदद ख़ुद करनी होगी और सड़कों पर निकलकर अपने जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करवाना होगा।