भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र को चुनाव आयोग से रद्द किए जाने को लेकर किसी भी क़िस्म के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। इस दौरान मीनाक्षी नटराजन के पक्ष और विपक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एम एस गिल (1978), पोन्नुस्वामी (1952) आदि तमाम पुराने निर्णयों को पेश किया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद-329 की अपनी पुरानी व्याख्या पर अडिग रहा और नटराजन को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया।

मैं सुप्रीम कोर्ट की समझ और मंशा पर कोई सवाल नहीं उठा रही हूँ लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार न्यायिक स्तर पर ऐसे फ़ैसले हो रहे हैं जिसने नरेंद्र मोदी सरकार की स्थिति को बहुत मजबूत किया है जबकि यह वो सरकार है जिसके अंतर्गत वैश्विक जगत में भारत को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ अर्थात चुनावी निरंकुशता वाला देश माना जा रहा है।

नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट

2023 के नोटबंदी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2016 की नोटबंदी को 4:1 के बहुमत से वैधता प्रदान कर दी थी। जबकि सरकार ने यह फैसला मनमाने ढंग से लिया था जिसकी वजह से भारत को लगभग 2% विकास दर का नुकसान हुआ था। 2019 में अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 की अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया जिसने फैसले को हिंदूवादी रंग से रंग दिया था। यह बात पूरी दुनिया के सामने है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2024 में प्राण प्रतिष्ठा के नाम पर लोकसभा चुनावों में इस फ़ैसले और राम मंदिर निर्माण का इस्तेमाल किया। 2018 के ‘आधार मामले’ में भी सुप्रीम कोर्ट का झुकाव मोदी सरकार की ओर ही रहा। आरक्षण की सभी पुरानी व्याख्याओं को दरकिनार करके सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में मोदी सरकार के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10% आरक्षण को संवैधानिक मान लिया, जबकि यह स्पष्ट बात है कि आरक्षण ग़रीबी निवारण योजना नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए किया जाने वाला एक संवैधानिक समर्थन और उपाय है। 
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कोविड महामारी पर मोदी सरकार का रवैया

इसी तरह जब पूरा देश कोविड महामारी से जूझ रहा था, हर ओर सिर्फ़ और सिर्फ़ मौतें हो रही थीं, पूरी दुनिया में लोग मर रहे थे उस समय भारत सरकार अपने संसाधनों को बचाने की बजाय उन्हें उड़ाने में लगी थी। जब पहली लहर के दौरान लगभग 1 लाख मामले हर दिन आ रहे थे, और दूसरी लहर के दौरान 4 लाख से भी अधिक मामले हर दिन आ रहे थे उस समय नरेंद्र मोदी 20 हज़ार करोड़ की लागत से सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का निर्माण करने में लगे थे। उन्हें पत्थरों से बनी नई संसद चाहिए थी जबकि जिनके लिए संसद बननी थी वो सड़कों पर मर रहे थे, अस्पतालों में लोग बेड की कमी से मर रहे थे लेकिन सरकार मौतों के आँकड़े छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने में लगी थी। जब सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई तो सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा के समर्थन में अपना फ़ैसला दिया। राफेल विमान सौदा मामला (2018–2019) उठा तो सुप्रीम कोर्ट ने सौदे में न्यायिक जांच की मांग वाली याचिकाएँ खारिज कर दीं। 

पीएमएलए पर सुप्रीम कोर्ट

इसी तरह धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) मामले में (2022) सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की व्यापक शक्तियों को बरकरार रखा। इस तरह एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फ़ैसला दिया जिससे मोदी सरकार को फ़ायदा हुआ, क्योंकि यह बात कई तथ्यों से स्पष्ट है कि ईडी का इस्तेमाल विपक्षी दलों के नेताओं को जेल भेजने, उन्हें डराने और विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने के लिए किया जा रहा है। फैसले में ईडी के पर कतरने का मतलब था मोदी सरकार के हाथ से अलोकतांत्रिक हथियारों को कुंद करना, जिसे करने से सुप्रीम कोर्ट ने परहेज किया।

पूजास्थल कानून 1991

जब अयोध्या भूमि विवाद का फैसला देना था तब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने पूजास्थल कानून 1991 की खूब तारीफ़ की और कहा कि यह कानून संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ सामंजस्य बनाता है, उनकी रक्षा करता है, साथ ही यह वादा भी करता है कि किसी धार्मिक स्थल का 15 अगस्त 1947 को जो भी चरित्र था उसे बरकरार भी रखता है। पीठ ने अयोध्या विवाद को एक अपवाद के रूप में देखा और अल्पसंख्यक समुदाय ने इस फ़ैसले को खुले हृदय से स्वीकार किया। लेकिन जल्द ही 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने शब्दों की बाजीगरी करते हुए सबकुछ उलट दिया।

वही जस्टिस चंद्रचूड़ जो अयोध्या मामले वाली संवैधानिक पीठ के सदस्य थे उन्होंने 20 मई 2022 को ज्ञानवापी मामले की सुनवाई करते हुए विवादित मस्जिद के सर्वे की अनुमति दे दी। इस बार उनके पास अलग तर्क था। उन्होंने कहा कि किसी स्थल के धार्मिक चरित्र का पता लगाने और उसके धार्मिक चरित्र को बदलने में अंतर है।

इस तरह उन्होंने ज्ञानवापी, मथुरा, संभल, अजमेर आदि तमाम विवादों के लिए दरवाजा खोल दिया। जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूजास्थल कानून की मूल भावना को ही नष्ट कर दिया। एक्ट की सोच यह थी कि भारत में धार्मिक स्थलों के विवादों को समाप्त कर दिया जाये जिससे देश अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में लग सके, और सांप्रदायिक हिंसा और ऐसी धार्मिक उन्माद वाली राजनीति से देश को बचाया जा सके।

जब पूजास्थल कानून स्पष्ट कह रहा है कि धार्मिक चरित्र नहीं बदला जाएगा तो इसके चरित्र का निर्धारण किए जाने की आवश्यकता क्या है? क्या यह सिर्फ़ जानकारी के लिए किया जाएगा? क्या इस जानकारी का कोई राजनैतिक और सांप्रदायिक फ़ायदा नहीं उठाया जाएगा? क्या जस्टिस चंद्रचूड़ यह समझने में नाकाम रहे कि यदि किसी विवादित स्थल के बारे में हिंदुओं को पता चलता है कि वह एक मंदिर है तो क्या बहुसंख्यक हिंदू इस स्थल के चरित्र का पता लगने के बाद उस चरित्र को बदलने की माँग नहीं करेंगे? ‘और जबतक इसका चरित्र नहीं बदल दिया जाता तबतक इस धार्मिक उन्माद और आंदोलन से सरकारें कैसे निपटेंगी? यह सब सोचने का काम एक न्यायाधीश का है, पूरी न्यायपालिका का है। लेकिन ऊपर दिए हर मामले की तरह इस मामले में भी यह नहीं सोचा गया। कुछ ऐसा किया गया जिसका फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी और इसकी तमाम राज्य सरकारों को होता रहे।

मीनाक्षी नटराजन केस

अब जब मीनाक्षी नटराजन का मामला सामने है तो फिर से यही एहसास हो रहा है। लोकतंत्र में किसी भी संस्था को सुप्रीम ताक़त देने की जरूरत नहीं है। यह सही है कि चुनावों के सफल संचालन के लिए, किसी भी रुकावट से बचने के लिए चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ आए हर मामले को सुनवाई योग्य नहीं समझा जा सकता है। लेकिन जैसा कि मीनाक्षी नटराजन के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यदि चुनाव आयोग कह दे कि 2+2 = 6 है तो भी क्या उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता? तो भी क्या देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले पर हस्तक्षेप नहीं करेगी?

मीनाक्षी नटराजन पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

चुनाव आयोग, SIR पर सुप्रीम कोर्ट

केंद्रीय निर्वाचन आयोग(ECI) का मामला बहुत ही संवेदनशील मामला है लेकिन अदालत इसे बहुत हल्के ढंग से ले रही है। चुनाव आयोग को यह अधिकार दिया गया है कि वह मतदाता सूची बनाये और उसने SIR के बहाने करोड़ों की संख्या में मतदाताओं को सूची से हटा दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं कहा। SIR के बहाने ECI भारत की नागरिकता का पहरेदार बन बैठा और सुप्रीम कोर्ट उसकी हाँ में हाँ मिला रहा है। अब चुनाव आयोग विपक्षी दलों के नेताओं का नामांकन ही रद्द कर रहा है और जिस आधार पर रद्द कर रहा है उसे लेकर न सिर्फ़ सम्पूर्ण विपक्ष असंतुष्ट है बल्कि इस देश के तमाम बड़े विधिवेत्ता भी असंतुष्ट हैं। ऐसे में यदि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा तो इसका मतलब यह हुआ कि उसने चुनाव आयोग को यह शक्ति भी दे दी है कि वह जब चाहे तब किसी विपक्षी दल के नेता को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से रोक सकता है और इस तरह उसने यह शक्ति भी अर्जित कर ली है जिसके तहत वो यह तय कर सकता है कि संसद में कौन से लोग बैठेंगे और कौन नहीं! इससे एक झूठे प्रतिनिधित्व पर आधारित संसद तैयार हो जाएगी। 

मतलब यह कि चुनाव आयोग को यह भी शक्ति भी मिल गई है जिससे वह संसद का स्वरूप, वहाँ पास होने वाले क़ानून और संवैधानिक संशोधनों तक को तय कर सकता है। और सबसे अहम बात यह कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग में कौन कौन सदस्य होंगे यह बात सिर्फ़ और सिर्फ़ नरेंद्र मोदी सरकार तय करती है। इसका मतलब यह हुआ कि नरेंद्र मोदी सरकार मतलब, कार्यपालिका; संविधान का ग़लत और बेलगाम इस्तेमाल करके संसदीय प्रणाली को नष्ट कर रही है, संसद के औचित्य को समाप्त कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ इसलिए यह सब होने देगा क्योंकि उसे लगता है कि अनुच्छेद-329 के तहत निर्वाचन आयोग को ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त है! यदि निर्वाचन आयोग को वाक़ई इतनी शक्ति देना है कि भारत की नागरिकता तय कर सके, यहाँ का निर्वाचन और नर्वाचक मंडल को तय कर सके तो उसे सरकार से पूरी तरह स्वतंत्र करना होगा अन्यथा संविधान के अभिरक्षक, सुप्रीम कोर्ट, की नाक के नीचे ECI भारत के लोकतंत्र को नष्ट कर देगी और उसे पता भी नहीं चलेगा।

क्या चुनाव आयोग को संविधान इतनी शक्ति देता है कि वो एक ‘फाल्स’ यानी फ़र्जी प्रतिनिधित्व पर आधारित संसद तैयार कर दे? क्या संविधान सुप्रीम कोर्ट को ऐसी शक्ति प्रदान करता है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की ‘व्याख्या’ करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कुछ यूँ करे कि ख़ुद भारत का संविधान भारत के लोकतंत्र के लिए भस्मासुर का काम करने लगे?

चंडीगढ़ के अनिल मसीह ने जिस तरह लोकतंत्र को खुलेआम कैमरे में नोचा था लगभग वैसे ही इसे हर दिन ECI के द्वारा नोचा जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट इसे रोक नहीं रहा है।

अपना विरोध दर्ज करने के लिए जब विपक्ष के नेता ECI के पास जाते हैं तो वो मिलने से इनकार कर देता है। ECI को इतनी हिम्मत कहाँ से मिल रही है कि वो भारत में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास का माहौल बनने दे रहा है और अपने जवाबों से विपक्ष को संतुष्ट नहीं कर रहा है? उसे तो अविश्वास के माहौल से डरना चाहिए। उसे तो पता होना चाहिए कि लोकतंत्र सत्ता और विपक्ष नाम के दो पहियों पर चलने वाली साइकिल है, जिसमें एक आगे और एक पीछे हो सकता है लेकिन लोकतंत्र को चलाने के लिए इन दोनों की ज़रूरत होगी। लेकिन ECI जिस तरह का व्यवहार भारत के विपक्ष के साथ कर रहा है, उससे यह साफ़ है कि भारत में लोकतंत्र की समाप्ति की अनौपचारिक घोषणा हो चुकी है।

राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी

राहुल गांधी का 'प्रतिरोध'

अगर सरकार तानाशाही कर रही हो तो यह हमेशा अच्छा होता है कि अन्य प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं ध्यान देकर लोकतंत्र के हित में फ़ैसले लें। जिससे आधे से अधिक मतदाताओं के समर्थन वाला विपक्ष यह न कहने पाये कि ‘स्टेट’ निष्पक्ष नहीं है और न ही उसे स्टेट की निष्पक्षता से अब कोई फ़र्क़ पड़ता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और ECI ने मिलकर जो माहौल बनाया है उसने देश के सबसे बड़े विपक्षी नेता राहुल गांधी को कहने पर बाध्य कर दिया है कि “कांग्रेस को स्टेट की निष्पक्षता की ज़रूरत नहीं है”। राहुल गांधी अब खुलकर कह रहे हैं कि “कांग्रेस संघर्ष और प्रतिरोध की पार्टी है… भारतीय राज्य की संस्थाओं का जितना अधिक गला घोंटा जाएगा, कांग्रेस संविधान की रक्षा के लिए उतनी ही अधिक आक्रामकता और दृढ़ता से संघर्ष करेगी।" वो कहते हैं कि “अगर राजनीतिक दलों को काम नहीं करने दिया जाता तो फिर क्या काम करता है? प्रतिरोध काम करता है। संघर्ष काम करता है… अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि प्रतिरोध और संघर्ष हमेशा असरदार साबित होते हैं।"
विमर्श से और
एक बड़े नेता द्वारा कहने में यह सकारात्मक बात है, इसमें आशा दिखाई पड़ रही है लेकिन असल में यह देश की संस्थाओं के नकारात्मक रवैये से उत्पन्न हुआ गुस्सा है। 21वीं सदी के इस दौर में जब सभी ने यह सोचा कि संविधान को बने हुए 75 सालों से भी अधिक समय गुज़र गया है और अब भारत को संवैधानिक संकट, और लोकतांत्रिक अस्तित्व जैसे सवालों से नहीं जूझना पड़ेगा; जब यह लगा कि चुनाव, सत्ता और सत्ता हस्तांतरण अब भारत में बिल्कुल एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के नियम में ही होगा और इसमें किसी अन्य ‘संघर्ष’ की जरूरत नहीं पड़ेगी, तब यह पता चला कि सबकुछ इसका उल्टा हो रहा है। देश के लोकसभा नेता, विपक्ष राहुल गांधी को कहना पड़ रहा है कि इस देश की संस्थाएं ‘न्यूट्रल’ नहीं है और ‘प्रतिरोध’ हमेशा असरदार साबित होता है। मुझे ऐसे आह्वानों में सकारात्मकता नज़र आती है पर थोड़ी कम नज़र आती है, मुझे इसमें संस्थाओं के बेईमान रवैये से उत्पन्न सार्वजनिक हताशा को रोकने की कोशिश ज्यादा नजर आती है। एक ऐसी कोशिश जिसमें भले प्रतिरोध और संघर्ष का रास्ता अपनाया जाये, लेकिन सार्वजनिक निराशा को भारत के लोकतान्त्रिक पतन का रास्ता न बनने दिया जाये। ‘स्वदेशी जस्टिस’ के इस दौर में सबसे बड़ी ज़रूरत संविधान के पहरेदारों पर भारत के लोगों का पहरा है।