मैं दावे के साथ नहीं कह सकती कि दूर दराज के गांवों में या शहरों की बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले लोग आज के भारत के बारे में क्या सोचते हैं। मुझे नहीं मालूम कि वो इस बात से वाक़िफ़ हैं भी कि नहीं कि भारत आज किस दौर से गुज़र रहा है। भारत के धीरे-धीरे लेकिन लगातार हो रहे पतन के बारे में देश के लोगों को कितना मालूम है, यह भी मुझे नहीं मालूम। लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि पिछले 12 सालों में इस देश के लगभग हर वर्ग, हर जाति और समूह ने यह जरूर महसूस किया होगा कि जब भी उन्होंने संगठित होकर सरकार से कुछ माँगा है या कुछ बदलाव करने की माँग की है तो सरकार ने उसे सुनने से इंकार कर दिया है। मेरे विचार से यही भारत का सबसे बड़ा संकट है। मुझे लगता है कि किसी भी ‘प्रतिनिधि लोकतंत्र’ की सबसे बड़ी हार ही इसी में है कि उसके निवासियों को सुनने से ही इंकार कर दिया जाये।
एकतरफ़ा रेडियो प्रसारण कार्यक्रम ‘मन की बात’ और एकतरफ़ा अखबारी कॉलम ‘योगी की पाती’ जिन्हें ‘भाषण’ ही कहा जाना चाहिए, ये रेग्युलर चलते हैं लेकिन जब लोग सरकार से कोई मांग करते हैं, अपनी तकलीफें साझा करते हैं, कुछ समाधान चाहते हैं तो सरकार ‘बहरी’ बन जाती है।
जिसे लोग अपना पसंदीदा नेता समझते हैं, जो हर दिन अख़बारों में समाधानों के दावे के साथ प्रकाशित होता रहता है, जो अपनी सुविधा से ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ लेकर लोगों के सामने फोटो वीडियो और आवाज़ के रूप में प्रस्तुत होता रहता है, जिसका मीडिया में हो रहा गुणगान लोगों में यह भरोसा पैदा कर देता है कि इस नेता की वजह से भारत सुरक्षित है, देश आगे बढ़ रहा है, जो सबको ‘सब चंगा सी’ का हवाई महल देता है, क्या वो अपने नागरिकों को सुनता है? आखिरकार वह नेता कैसा जो लोगों की मांगो को अनसुना कर देता है?
2015 में फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII), पुणे के छात्रों ने बीजेपी नेता गजेंद्र चौहान को संस्थान का अध्यक्ष बनाये जाने का विरोध किया, 139 दिनों तक हड़ताल की लेकिन सरकार बहरी बनी रही और छात्रों को थक के अपनी हड़ताल बंद करनी पड़ी लेकिन गजेंद्र चौहान जैसे अयोग्य व्यक्ति को इतने महत्त्वपूर्ण संस्थान का अध्यक्ष बने रहने दिया गया।
नोटबंदी पर सवाल
8 नवंबर 2016 को बिना किसी संसदीय बहस के 500 और 1000 के नोट अचानक बंद कर दिए गए। देश के विपक्ष और अर्थशास्त्रियों ने विरोध किया, डीमोनेटाईजेशन न करने का आग्रह किया लेकिन हमेशा की तरह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों को भी अनसुना कर दिया, पूरे विपक्ष को अनसुना कर दिया। नतीज़ा यह हुआ कि पूरे देश को बैंकों और ATMs के सामने लाइन लगाकर खड़ा होना पड़ा। बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं सभी अपने ही पैसों के लिए लाइन में थे। 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई और सरकार ने इस मौत पर कभी अफ़सोस नहीं जताया। मौत की भी अनदेखी कर दी गई और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया(RBI) के उस आंकड़े की भी जिसमें कहा गया कि जिस ‘काले धन’ के नाम पर नोटबंदी की गयी और 100 से अधिक लोग मारे गए, वो काला धन असल में अस्तित्व में ही नहीं था।
RBI द्वारा जारी किए गए 500 और 1000 के कुल नोटों का 99.3% लौटकर वापस आ चुका था, और इसके दो ही मतलब थे या तो देश में ‘काला धन’ था ही नहीं या फिर ये कि सरकार ने नोटबंदी की आड़ में कुछ चुनिंदा लोगों का अरबों-खरबों का काला धन सफेद करवा दिया।
नोटबंदी को लेकर सरकार ने इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया, न ही 100 लोगों की मौत का और न ही उसके ‘काले धन’ के दावे का।
तीन कृषि क़ानून
सितंबर 2020 में बिना किसी व्यापक विचार विमर्श के संसद से तीन कृषि कानून पारित करवाकर देश के किसानों पर थोप दिए गए। किसानों ने इसे ‘काले कानून’ का नाम दिया और राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू कर दिया। लगभग एक साल तक सर्दी, गर्मी, बरसात में लाखों की संख्या में किसान सड़क पर पड़े रहे। सरकार ने न सिर्फ़ उन्हें अनसुना किया बल्कि किसानों को खालिस्तानी बोला गया, उनके सोशल मीडिया अकाउन्ट्स बंद कर दिए गए, उनके रास्ते में सड़कों पर कीलें बिछाई गईं, इंटरनेट काट दिया गया, बैरिकेड लगाए गए। इस पूरे आंदोलन के दौरान 700 से अधिक किसान मारे गए। पूरी दुनिया में थू-थू होते देख सरकार ने कृषि कानून तो वापस ले लिया लेकिन आजतक MSP पर कानून बनाकर गारंटी नहीं दी गई है। आज तक MSP पर कानून की मांग और किसानों की अन्य समस्याओं को अनसुना किया जा रहा है।
इसी किसान आंदोलन पर खुन्नस खाये गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के लड़के ने लखीमपुर में किसान आंदोलनकारियों पर अपनी थार SUV चढ़ा दी, 4 किसान कुचल दिए गए, कई घायल हो गए। खुलेआम किसानों की हत्या देखने के बावजूद सरकार ने किसानों की तकलीफ़ों को अनदेखा किया। पूरे देश से इस घटना के ख़िलाफ़ आवाजें उठ रही थीं लेकिन सरकार ने सबको अनसुना कर दिया। सरकार इतनी निर्लज्ज थी कि जबतक सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा नहीं तबतक गृहराज्य मंत्री के बेटे पर कार्यवाही शुरू ही नहीं की गयी थी।
जून 2022 में एक बार फिर नरेंद्र मोदी सरकार बिना संसद और विपक्ष को भरोसे में लिए, ‘अग्निपथ’ स्कीम लेकर आ गई। इस स्कीम का मतलब था कि अब सेना में भर्ती 4 साल की संविदा पर होनी थी। देशभर के युवाओं ने इसे नकार दिया। विपक्ष ने इसका भयंकर विरोध किया। मांगों को अनसुना किए जाने पर छात्रों का विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया। बिहार, यूपी, तेलंगाना, राजस्थान आदि में ट्रेनें जलाई गईं, कई बसों में आग लगा दी गई। छात्र अपनी सालों की मेहनत पर पानी फेर देने से बहुत नाराज थे। बिना किसी को विश्वास में लिए ही इतना बड़ा फैसला कर लिया गया था। मोदी सरकार ने किसी को नहीं सुना, युवाओं की मांगें नहीं मानी गईं। छात्र निराश होकर खाली हाथ लौट गये। अगर उनके हाथ कुछ लगा तो वो था FIRs, और सरकारी उत्पीड़न।
हिज़ाब पहनने पर प्रतिबंध
2022 में कर्नाटक में बीजेपी की सरकार थी। वहाँ अचानक से स्कूल-कॉलेजों में हिज़ाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मुस्लिम छात्राओं को क्लास से बाहर किया जाने लगा। कई मुस्लिम छात्राओं को हिज़ाब की वजह से परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया। मुस्कान ख़ान जैसी छात्राओं का अकेले किया गया प्रतिरोध अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गया। लेकिन सरकार ने इसे भी अनसुना कर दिया।
महिला पहलवान यौन उत्पीड़न केस
जनवरी, 2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ महिला पहलवानों, साक्षी मालिक, विनेश फोगाट आदि ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। आरोप बहुत गंभीर और बहुत प्रतिष्ठित महिला खिलाड़ियों की तरफ़ से आए थे। महिला पहलवानों ने पीएम मोदी से निवेदन किया कि इस मामले में दख़ल दें और बृजभूषण शरण सिंह पर मामला चलाया जाये। महीनों तक इसके लिए जंतर-मंतर पर धरना दिया गया, मार्च निकाले गए, पुलिस उत्पीड़न झेला लेकिन आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली इन महिला पहलवानों की किसी भी बात का पीएम मोदी ने कोई भी जवाब नहीं दिया, उन्होंने ऐसे व्यवहार किया जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता हो।
पर दुनिया तो बहरी नहीं थी। यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग(UWW) और इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी(IOC) ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। जब 28 मई 2023 को दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कर रही महिला पहलवानों और अन्य पहलवानों को गिरफ्तार किया और उनसे बदसलूकी की तो IOC को भी लगा कि यह बहुत ‘डिस्टर्बिंग’ था लेकिन पीएम मोदी को कुछ भी डिस्टर्बिंग नहीं लगा! निष्पक्ष जांच के अभाव में UWW ने 2023 की एशियन कुश्ती चैंपियनशिप की मेजबानी भारत से छीनकर क़ज़ाकिस्तान को दे दी। पूरी दुनिया के महत्वपूर्ण खेल संस्थानों ने इसे एक व्यक्ति के ‘राजनैतिक प्रभाव’ और ‘सिस्टम की विफलता’ के तौर पर देखा। चारों ओर चल रही इस गंभीर आलोचना और देश के अपमान को भी पीएम मोदी ने अनसुना कर दिया।
मणिपुर हिंसा
महिला पहलवानों का मामला ख़त्म नहीं हुआ था कि मई 2023 में मणिपुर जल उठा। महिलाओं के साथ वीभत्स बलात्कार हुए, उनकी नग्न परेड करवाई गई, मैतेई और कुकी एक दूसरे के जान के दुश्मन बन गए। एक शांत और पर्यटन प्रेमी राज्य जल रहा था, अब 3 साल हो चुके हैं और आज भी जल रहा है लेकिन पीएम मोदी ने इसे भी अनसुना कर दिया। दंगे शुरू होने के 28 महीनों तक पीएम ने इस अशांत मणिपुर का दौरा ही नहीं किया, कभी विपक्ष से सलाह-मशविरा नहीं किया, जो मन में आया वो करते रहे और मणिपुर के लोगों की आवाज़ अनसुनी करते रहे। आज भी वही सब जारी है। पीएम ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे मणिपुर भारत के लिए कोई मुद्दा ही ना हो जबकि सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और 60,000 से अधिक लोग अस्थायी तम्बुओं में रह रहे हैं।
संसद में सुरक्षा चूक
2023 में संसद में सुरक्षा चूक की वजह से कुछ शरारती तत्व संसद में घुस आए और उन्होंने धुँआ बम छोड़ दिया। किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ, कोई हताहत नहीं हुआ क्योंकि वो सिर्फ़ धुआँ उड़ाने वाला बम था। लेकिन सबसे जरूरी बात थी ‘सुरक्षा में चूक’। जब विपक्ष ने इस मुद्दे पर संसद में गृहमंत्री का बयान मांगा तो गृहमंत्री ने बयान ही नहीं दिया। 143 विपक्षी सांसदों को सिर्फ़ इसलिए निलंबित करवा दिया गया क्योंकि गृहमंत्री के पास संसद में जवाब देने के लिए कुछ नहीं था। देश के 14 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले इन सांसदों को जब संसद से निलंबित किया गया तभी ‘आपदा में अवसर’ देखते हुए सरकार ने 3 क्रिमिनल लॉ कानून भी पारित करवा लिए। अंत तक पीएम और गृहमंत्री ने इस घातक चूक पर कोई जवाब नहीं दिया। सबकुछ अनसुना कर दिया गया।
2024 में हुए NEET पेपर लीक मामले में प्रतियोगी छात्रों के विरोध और प्रदर्शन को अनसुना कर दिया गया। जिम्मेदारी तय नहीं की गई और धर्मेंद्र प्रधान मंत्री पद पर बने रहे।
हाल में लगभग 200 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर के पास मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने संबंधी प्रस्ताव दिया था जिसे बिना किसी स्पष्टीकरण के अस्वीकार कर दिया गया। यानी देश के 200 सांसद मिलकर भी कुछ कहें तो उन्हें नहीं सुना जा रहा है, फिर आम लोगों की क्या मजाल?
तो क्या असल मसला सरकार का नहीं है, न्यायपालिका का है? क्योंकि एक उच्छृंखल कार्यपालिका तभी बनती है जब न्यायपालिका न्याय के लिए दरवाज़े बंद कर देती है। दिल्ली दंगों के मामलों में देखा जाए तो, उमर ख़ालिद और शरजील इमाम 5 सालों से बिना ट्रायल के जेल में बंद हैं। लेकिन उन्हें जमानत नहीं मिल रही है। क्या यह समझना इतना मुश्किल है कि सरकार नहीं चाहती कि उमर ख़ालिद जेल से बाहर आए? लेकिन क्या सरकार तय करेगी कि किसको ‘जीवन का अधिकार’ दिया जाएगा? एक ऐसा अधिकार जो हर परिस्थिति पर भारी पड़ना चाहिए। क्या अनिश्चित और अनंत समय तक ‘देश की सुरक्षा’ का बहाना लेकर किसी को जेल के भीतर रोका जा सकता है?
ट्रायल शुरू ना करना सरकार की कमी है, उमर ख़ालिद की नहीं। वह कौन सा न्यायिक सिद्धांत है जिसमें अपनी कमियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ा जाता है?
मैं तो नहीं जानती वह कौन सा सिद्धांत है लेकिन यह तो जानती हूँ कि यह एक बीमारी है। चाहे बिहार SIR का मामला हो या पश्चिम बंगाल SIR का, न्यायालय ने ऐसा कोई फ़ैसला ही नहीं दिया जिसकी कीमत सरकार और ECI को चुकानी पड़े। बिहार के मामले में तो अभी फैसला तक नहीं आया और SIR लागू करके 38 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए, जिसमें 60% से अधिक महिलाएं थीं। यही हाल पश्चिम बंगाल का है अभी भी 27 लाख लोगों का मामला ट्रिब्यूनल्स में लंबित है लेकिन चुनाव नहीं रोके गए। सवाल यह है कि जब अभी तक फैसला ही नहीं आया तो चुनाव क्यों करवाया गया? जो भी सरकार चुनकर बिहार में आई क्या वह बिहार के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है? बिल्कुल नहीं करती। तो वह एक जायज़ सरकार कैसे हुई? निर्वाचन करवाना, मतदाता सूची बनाना, उसे अपडेट करना निर्वाचन आयोग का काम है लेकिन क्या सरकार चुनने में मदद करना, किसी राजनैतिक दल को विशेष मदद करना यह भी चुनाव आयोग का काम है? चुनाव आयोग की मदद से पश्चिम बंगाल में जो भी सरकार आयेगी वो वहां के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा। सरकार और चुनाव आयोग अपना काम समय पर नहीं कर पाये तो इसका भुगतान राज्य की जनता क्यों करे? इसका भुगतान सरकार और चुनाव आयोग मिलकर क्यों नहीं करते? यह कैसी न्याय प्रणाली है? यह कैसा न्याय है?
बंगाल मतदाता सूची से नाम काटे जाने पर विवाद
‘जीवन का अधिकार’-अनुच्छेद 21 को नकार के, आधी अधूरी मतदाता सूची से चुनाव आयोजन को हरी झंडी देकर असल में भारत के संविधान को ही अनसुना किया जा रहा है। भारत का संविधान भारत के लोगों का दस्तावेज है, भारत सरकार का नहीं। भारत सरकार मुट्ठी भर कार्यपालिका का समूह है, वह पूरा भारत नहीं है। पूरा भारत बनाने के लिए सम्पूर्ण विपक्ष के साथ साथ हर नागरिक को समाहित करना पड़ेगा।
सरकार द्वारा पैदा किए गए खतरे के आधार पर देश के युवाओं को 5 सालों तक जेल में ठूँसे रखने से, एक भेदभावपूर्ण चुनाव आयोग को अपनी मर्जी चलाने और सम्पूर्ण लोकतंत्र को ‘हाईजैक’ करने का अधिकार देने से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है। जो आगे लोकतंत्र को और भी कमजोर कर देगा। यह बिल्कुल साफ़ है कि एक खास किस्म की, एक खास विचारधारा और एक खास दल की सरकार बने इसकी कोशिश हो रही है और यह रास्ता तानाशाही की ओर ही जाता है।
असल में तानाशाही का रास्ता बाक़ी संस्थानों के रीढ़विहीन या फिर आज्ञाकारी होने से गुज़रता है। न्यायपालिका लोकतंत्र की सबसे पवित्र जगह होती है, जिस पर नागरिक आँख बन्द करके भरोसा करते हैं। तो क्या इसी भरोसे की आड़ में एकाधिकारवादी सरकारें मनमानी चला रही हैं? ऐसे में देश में ‘आज़ादी का स्तर’ कम होने लगता है, नागरिकों के ऊपर ‘राष्ट्र’ को हावी किया जाता है, प्रतिरोध को कुचल दिया जाता है, आज़ादी और कम होने लगती है और इस वजह से लोकतंत्र हाँफने लगता है और एक समय के बाद ग़श खाकर पूरा लोकतंत्र औंधे मुँह गिर पड़ता है।
न्यायाधीशों का तो रिटायरमेंट हो जाता है, पेंशन मिलती है और रिटायरमेंट के बाद के अन्य ‘लाभ’ भी मिलते हैं, कोई जस्टिस वाई. वर्मा बनता है, कोई जस्टिस यादव, कोई राज्यसभा पहुँच जाता है, कोई बागेश्वर धाम पहुँच जाता है, तो किसी के घर ख़ुद पीएम पूजा करने पहुँच जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र ‘एक्सपायर’ हो चुका होता है। अब किसी बीती बात के कोई मायने नहीं रहते। फ़िलहाल भारत इस दशा को पहुंचा तो नहीं है लेकिन जिस तरह भारत सरकार देश की सर्वोच्च अदालत में निर्लज्जता कर रही है और उसे अनदेखा किया जा रहा है भारत में यह दिन देखने को मिल सकता है। संविधान और भारत के लोगों को अनसुना करने की कीमत सम्पूर्ण भारत भुगत सकता है इसलिए इससे बचना चाहिए।