ये अरावली पहाड़ है, जिसका दोहन कई दशक से हो रहा है। इसके जंगल खत्म किए जा रहे हैं।
भारत समस्याओं का ज़ख़ीरा बन चुका है और नरेंद्र मोदी देश की किसी भी समस्या को ना सुलझाने को लेकर अभ्यस्त हो चुके हैं. समस्या कितनी भी गंभीर हो मोदी ‘चुप्पी’ साध कर बैठे रहते हैं क्योंकि उनके पास देश की किसी समस्या का समाधान नहीं है. प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपरलीक हो रहे हों या राम मंदिर के दानपात्रों से होने वाला ‘चढ़ावा-लीक’, नरेंद्र मोदी हर लीक को रोकने में असमर्थ हैं, असहाय हैं और विपक्ष की मानें तो शायद ‘कंप्रोमाइज्ड’ भी है. जहाँ तक मुझे समझ में आता है, ये ऐसी समस्याएं हैं जिनके समाधान खोजते ही मोदी ख़ुद ही समस्या के रूप में सामने आ जाएँगे.
लेकिन कुछ ऐसी भी समस्याएं हैं जो इतनी बड़ी हैं कि अख़बारों के मुख्यपृष्ठों में स्थान नहीं बना पातीं, उनके लिए हर जगह छोटी पड़ गयी है, ये ऐसी समस्याएं हैं जिनको लेकर ना ही सोशल मीडिया में पोस्ट लिखी जाती है न ही कोई उसपर चर्चा करता हुआ पाया जाता है और मुख्यधारा की मीडिया तो उसे ख़बर की श्रेणी में समझती ही नहीं. ऐसी समस्याएँ जिनका संबंध सीधे आम इन्सान की ज़िन्दगी से जुड़ा है और उसके अस्तित्व से भी जुड़ा है.
वायु प्रदूषण और गर्मी, ऐसी ही समस्याएं है. आज किसी से भी बात करो वह यह कहता हुआ पाया जाएगा कि ‘बहुत गर्मी है’, ‘आग बरस रही है’. कुछ लोग ये भी कहते पाये जाते हैं कि ‘पूरी दुनिया का यही हाल है’. यह बात सही है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया मौसम की चरम घटनाओं से जूझ रही है. लेकिन भारत का मामला बिल्कुल अलग है. भारत को 140 करोड़ लोगों को ज़िंदा रखना है, उनके खाने और पेयजल की व्यवस्था करना है. 140 करोड़ लोग साफ़ हवा में साँस ले सकें इसकी व्यवस्था करना है. अगर करोड़ों की संख्या में लोग बीमार होकर अस्पताल की ओर भागने लगे तो ऐतिहासिक अव्यवस्था फ़ैल सकती है. लेकिन इसके बावजूद भारत में नीतिगत स्तर पर इसके लिए कोई काम नहीं किया जा रहा है, क्योंकि देश के प्रधानमंत्री और उनका पूरा कैबिनेट अमला साल भर चुनावी मोड में रहते हैं. सरकार की प्राथमिकता भारत के सामान्य लोग नहीं हैं बल्कि उनकी प्राथमिकता है कांग्रेस मुक्त भारत और हर विरोधी आवाज़ को सारे संभव असंभव तरीके से दबा देना. हालात ये है कि देश की ज्यादातर आबादी यह तक नहीं जानती कि भारत का पर्यावरण एवं वन मंत्रालय किसके हाथ में है.
यह अनदेखी अब अपना नकारात्मक असर दिखा रही है. पूरे साल में सिर्फ़ जुलाई से सितंबर के बीच अच्छी वायु गुणवत्ता(AQI) मिलती है बाक़ी के 9 महीनों में मिलने वाली हवा, सांस लेने लायक तक नहीं होती. ख़राब वायु गुणवत्ता की वजह से भारत में हर साल लगभग 30 लाख लोगों की मौत हो जाती है. दिल्ली, जहाँ नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन कर पिछले 12 सालों से रह रहे हैं वहाँ की हालत और भी ज़्यादा ख़राब है. लंग फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के अनुसार, दिल्ली के 30% बच्चों में फेफड़ों की समस्या ऐसे स्तर तक पहुँच चुकी है जहाँ से उन्हें वापस सामान्य नहीं किया जा सकता.
दुर्भाग्य यह है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही बीजेपी ने दिल्ली में ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया है जिन्हें AQI अर्थात वायु गुणवत्ता सूचकांक के बारे में कोई जनकारी ही नहीं है. जबकि दिल्ली का AQI अक्टूबर से फ़रवरी के बीच 500 तक भी पहुँच जाता है. सरकार ने 500 पर सीमा निर्धारित कर दी है. सरकार इसके आगे के AQI को दर्ज ही नहीं करती. जबकि कई अनाधिकारिक स्रोतों ने दिल्ली की AQI को 1000 से 1700 तक भी रिकॉर्ड किया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI 5 μg/m³ से अधिक नहीं होना चाहिए. ऐसे में समझा जा सकता है कि भारत और यहाँ के लोग किस विपत्ति से गुज़र रहे हैं. प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर’ में छपे एक शोध के मुताबिक़ प्रत्येक 1μg/m³ AQI बढ़ने से लगभग 12,000 मौतें बढ़ जाती हैं. अगली बार जब अख़बार में AQI बढ़ने का आंकड़ा देखें तो यह जरूर कैलकुलेट कर लें कि कितने लोग मर चुके होंगे.
शोध यह बताते हैं कि वायु प्रदूषण से होने वाली प्रतिवर्ष मौतों की संख्या कोविड-19 से प्रतिवर्ष हुई मौतों से 16 गुना अधिक हैं. क्या यह बात पाठकों को पता थी? क्या पीएम मोदी, गृहमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री का ‘तेजस्वी’ और ज़ोरदार भाषण सुनते हुए किसी को वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं के बारे में कुछ भी सुनने को मिला? कभी वायु प्रदूषण और इससे होने वाली मौतें या बीमारियाँ और इसके समाधान को लेकर चिंता दिखी? उनके भाषणों में अक्सर राम और अयोध्या की चिंता ज्यादा रही है. वही राम जिनके अभी अभी बनाये गए मंदिर से हजारों करोड़ रुपये की लूट चलती रही और ये तीनो महानुभावों को पता भी नहीं चला?
सरकार वास्तव में असंवेदनशील और भ्रष्ट है और इन्हें किसी की भी चिंता नहीं, सिवाय अपनी कुर्सी के. इसलिए जब अयोध्या मंदिर में लूट का खुलासा हुआ तो बजाय अपनी गिरेबान में झाँकने के इनका ध्यान उन लोगों की आवाजों को चुप कराने और उन्हें धमकी देने पर गया जो इस लूट को जनता के सामने ला रहे थे.
असंवेदनशीलता या संवेदनहीनता एक चरित्र है और वो हर स्तर पर दिखाई पड़ता है. फिर बात भ्रष्टाचार की हो या लोगों द्वारा सहन की जा रही जटिल और कठिन जीवन शैली की.
यह खबर बहुत कम लोगों के सामने आई होगी कि बीच में एक ऐसा दिन भी आया जब दुनिया के सबसे गर्म शहरों में सभी 50 शहर भारत से थे. इसमें से 50% शहर अकेले उत्तर प्रदेश में स्थित थे. उत्तर भारत का तापमान लगातार 45°C से 48°C के बीच बना हुआ है. क्या सरकार के पास कोई प्लानिंग है कोई जवाब है जिससे लोगों को राहत मिल सके?
मुझे तो नहीं लगता सरकार के पास कोई प्लान है भी! दिन का तापमान लगातार बढ़ रहा है और रातें और गर्म होती जा रही हैं. WHO के अनुसार घरों के भीतर का तापमान बहुत ज़्यादा देर तक 24°C से अधिक नहीं होना चाहिए वरना इसका असर हृदय के स्वास्थ्य पर पड़ता है और नींद पर भी पड़ता है. लेकिन सोचने वाली बात है कि भारत में क्या हालात हैं? पिछले दो महीनों से उत्तर भारत ‘हीट वेव’ की चपेट में है. विश्व बैंक के अनुसार भारत के 75% श्रमिक, कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं जहाँ उन्हें सीधे ‘हीट’ का सामना करना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि रात में उन्हें बेहतर माहौल मिल जाता है. सोचने की बात है कि उन श्रमिकों के ह्रदय और मस्तिष्क के क्या हालात होंगे.
पूरा भारत गर्म हो रहा है और यह बेहद चिंता की बात है. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 35 में रात के तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव शहरी क्षेत्रों में और भी अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है. जर्नल ‘नेचर सिटीज़’ में प्रकाशित 141 भारतीय शहरों पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया कि देशभर में रात का तापमान औसतन 0.26°C प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। शहरों की बात करें तो यह बढ़ोत्तरी लगभग दोगुनी और तेज़ है, जहाँ रातें 0.53°C प्रति दशक की दर से गर्म हो रही हैं.
इसका असर वैसे तो पूरे देश पर पड़ेगा लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे ग़रीब और वंचित वर्ग के लोग. विश्व बैंक ने सतर्क किया है कि अगर हीट वेव पर भारत सरकार ने काम नहीं किया, इसके उपाय नहीं खोजे गए और लोगों को इन्ही परिस्थितियों में काम करने को बाध्य होना पड़ा तो श्रमिकों की उत्पादकता पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, नौकरियां जायेंगी और इसकी पूरी संभावना है कि 2030 तक भारत की 4.5% जीडीपी विलुप्त ही हो जाये.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया में ख़त्म होने वाली कुल नौकरियों का आधे से अधिक हिस्सा अकेले भारत में हो सकता है. यह सब तब और डरावना हो जाता है जब ‘एल नीनो’ जैसी प्राकृतिक घटनाओं का आगमन होता है. यह एल नीनो तब अस्तित्व में आती है, जैसा कि 2026 में इसका आना तय है, जब प्रशांत महासागर के गर्म हो जाने से हवा और बारिश का चक्र बाधित हो जाता है. ‘एल नीनो’ का शाब्दिक अर्थ है छोटा बच्चा(छोटे यीशु). लेकिन यह न ही यीशु हैं ना ही कोई छोटा बच्चा! यह बेहद खतरनाक प्रभाव उत्पन्न करने वाली घटना है इसकी वजह से भारतीय उपमहाद्वीप में बारिश करने वाले दक्षिण पश्चिम और दक्षिण पूर्व मानसून सुस्त पड़ जाते हैं और बारिश बहुत कम हो जाती है.
जिस देश की 90% खेती आज भी बारिश और मौसम पर निर्भर हो, जिस देश के 90% किसान आज भी छोटी जोतों वाले हों जो बारिश के पानी पर ही निर्भर हैं, ऐसे गरीब और कमजोर लोग इस एल नीनो की मार को झेल नहीं पाते और आर्थिक व मानसिक रूप से बुरी तरह प्रभावित होते हैं.
इन किसानों पर पड़ने वाली मार भारत की कुल उत्पादकता पर भी पड़ती है. इस मार से अंततः भारत में खाद्य संकट पैदा हो जाने की संभावना बनी रहती है. इस खाद्य संकट से पहले से बढ़ रही खाद्य पदार्थों की महंगाई और भी बढ़ने की संभावना है. यह महंगाई गरीबों तक दालों और तेल जैसी जरूरी खाद्य पदार्थों की पहुँच को सीमित कर देगा जिससे कुपोषण आदि का प्रभाव बढ़ने लगेगा. जिस देश की 90% आबादी ‘वल्नरेबल’ हो उसकी कमान किसी ऐसे व्यक्ति के पास होनी चाहिए जिसे आमजन और सबसे गरीब लोगों से प्रेम हो, देश से प्रेम हो जिसे आम लोगों की चिंता हो ना कि मुट्ठी भर सेठों की.
भारत हीट वेव से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है. लेकिन इसके पीछे के कारण सिर्फ़ वैश्विक नहीं बल्कि स्थानीय भी है. जंगलों को बर्बाद करने की नीति ने 90% आबादी को खतरे में डाल दिया है. वनों के कटने से ना सिर्फ़ कार्बन सिंक बर्बाद हुए बल्कि इसने जल संरक्षण के प्रयासों को भी तबाह किया है इसने अंततः भारत के प्रमुख ‘हीट सिंक’ यानी यहाँ के ‘जल निकायों’ को बर्बाद कर दिया है. पिछले 10-12 सालों में कितने पेड़ काटे गए इसकी आधिकारिक संख्या तो नहीं है लेकिन कुछ ऐसी संख्याएं जरूर हैं जिनसे यह पता चल सकता है कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल में कितने जंगलों का सर्वनाश हुआ है.
जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच ‘डाउन टू अर्थ’ में छपा, आँकड़ा देखें तो पता चलता है कि घने जंगलों में स्थित 28 लाख पेड़ काट दिए गए. मध्य भारत का फेफड़ा कहे जाने वाले हसदेव अरण्य को बुरी तरह नष्ट किया गया है. यहाँ की कांता बेसिन कोयला खदानों के लिए अडानी ने पूरा घना जंगल तबाह कर दिया है. ‘हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति’ के अनुसार, अब तक 7 लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं और आगे भी 5 लाख पेड़ों को काटे जाने की योजना है. हसदेव अरण्य में 2013 में जो ख़नन क्षेत्र मात्र 218 हेक्टेयर था वो अब बढ़कर लगभग 1400 हेक्टेयर हो चुका है. मोदी सरकार का अगला निशाना ग्रेट निकोबार में है जहाँ, विशेषज्ञों की माने तो, अनछुए वनों के 1 करोड़ पेड़ों को काटा जाना है.
जिन लोगों के लिए ये वन काटे जा रहे हैं, जिन लोगों को इनसे फ़ायदा होगा, जो इससे धन कमाएंगे वो पहले से ही धनाड्य हैं, सक्षम हैं और समृद्ध भी हैं लेकिन वनों के काटे जाने से और जल निकायों की अनदेखी से जिस तरह प्राकृतिक ‘हीट सिंक’ बर्बाद किए जा रहे हैं उसका दुष्प्रभाव अब सामने है. लेकिन हमेशा की तरह नरेंद्र मोदी को जितना प्यार अपनी चालाक चुप्पी से है उतना किसी और चीज से नहीं.
क्या यह सब भयावह नहीं है? लेकिन सरकार को यह भयावह नहीं लगता है. अगर सरकार को यह भयावह लगता तो उसके पास कोई सकारात्मक प्लान होता, लेकिन जब भी कोई समस्या आती है तो मोदी सरकार कहीं छिपकर बैठ जाती है. यही इस समय भी हो रहा है. भारत में गर्मी का प्रकोप सिर्फ़ ‘जलवायु परिवर्तन’ का प्रभाव नहीं है यह असल में 2014 में हुए ‘सत्ता परिवर्तन’ का प्रभाव भी है जिसने पूरे भारत के लोगों के स्वास्थ्य को अपनी पर्यावरण विरोधी और जन विरोधी नीतियों के चलते खतरे में डाल दिया है.