असहमति के अधिकार पर न्यायमूर्ति माधव जमदार का फैसला
एक लंबा अरसा गुज़र गया जब किसी संवैधानिक न्यायालय (उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय) के भीतर से नागरिकों के हित पर कोई टिप्पणी या स्पष्ट आदेश सामने आया हो। जज या तो सरकार की हाँ में हाँ मिलाते पाये गए या फिर नागरिकों के ख़िलाफ़ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करते हुए। यदि किसी संवैधानिक न्यायालय के भीतर बैठा कोई जज युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहे तो इसे असंसदीय भाषा ही कहा जाएगा। यदि ऐसे न्यायालयों के अंदर से कोई जज, सरकारी नीतियों का विरोध और उसको बदलने का दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन करने वालों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ बात करता नजर आए तो इसे असंसदीय ही कहा जाना चाहिए।
बीते लंबे समय से भारत के संवैधानिक न्यायालय ऐसी ही टिप्पणियाँ करते पाये गए हैं। दुर्भाग्य से इनमें से कुछ टिप्पणियाँ भारत के मुख्य न्यायाधीश की तरफ़ से भी आई हैं। जब सरकारें दमन के लिए कानून और पुलिस का सहारा लेती हैं तो आम नागरिक न्यायालय की शरण में जाता है। ये न्यायालय सरकारी तानाशाही से नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है। लेकिन लंबे समय से भारतीय नागरिक अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के हनन के लिए न्यायालयों से उम्मीद करना छोड़ चुके हैं।
भारतीय न्यायपालिका अपनी नागरिकोन्मुखी छवि लगातार खो रही है, उसका यह स्वरूप तमाम रिपोर्ट्स में भी सामने आ रहा है। दुनिया भर में न्यायपालिकाओं की विश्वसनीयता, स्वतंत्रता और ‘कानून के शासन’ (यानी Rule of Law) को मापने के लिए सबसे विश्वसनीय इंडेक्स 'वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (WJP) रूल ऑफ लॉ इंडेक्स' है। 2009 से नियमित रूप से आने वाला यह इंडेक्स वाशिंगटन स्थित संस्था वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (WJP) द्वारा जारी किया जाता है। इस सूचकांक में भारत 143 देशों के मुक़ाबले 86वें स्थान पर है। अगर सिर्फ़ दक्षिण एशिया के देशों की बात की जाए तो भारत इस क्षेत्र में नेपाल और श्रीलंका के बाद तीसरे स्थान पर है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, भ्रष्टाचार, सिविल जस्टिस और क्रिमिनल जस्टिस जैसे 8 प्रमुख मानकों पर देशों को रैंक देने वाली WJP की 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया के उन 68% देशों में शामिल हो चुका है जहाँ ‘न्यायिक स्वतंत्रता में गिरावट’ और नागरिक अधिकारों के सिकुड़ने की प्रवृत्ति देखी गई है।
बिना ट्रायल उमर ख़ालिद जेल में
वर्तमान में भारत में दो किस्म के न्यायाधीश हैं। पहले, सरकार समर्थक और दूसरे, नागरिक समर्थक। स्वाभाविक रूप से दूसरे किस्म के न्यायाधीशों की संख्या विलुप्त होने के कगार पर है। पहले किस्म के न्यायाधीश हर निर्णय ऐसे तरीके से लेते हैं जिससे सरकार को सुकून मिले। ये जज, कानून और संविधान की व्याख्या, सरकारी हितों को ध्यान में रखकर करते हैं। उदाहरण के लिए- उपासना स्थल कानून की व्याख्या, अनुच्छेद-19 और अनुच्छेद-21 की व्याख्या, भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की व्याख्या, ‘बेल इज़ रूल, जेल इज़ एक्सेप्शन’ की व्याख्या, दल-बदल कानून की व्याख्या, चुनाव आयोग के अधिकारों की व्याख्या जैसे महत्वपूर्ण मामलों में ये जज सरकार के रूख के हिसाब से व्याख्या करते है। इसका इन्हें व्यक्तिगत लाभ भी मिलता है। भले ही इनकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा, और कानूनविदों की नजर में इज़्ज़त पूरी तरह धूमिल हो जाये लेकिन इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
उदाहरण के लिए, आज भारत और दुनिया का कोई भी ऐसा कानूनविद नहीं जो यह नहीं जानता हो कि उमर ख़ालिद और सहयोगियों को 6 सालों तक बिना ट्रायल के जेल में रखना ना सिर्फ़ ग़ैर-कानूनी, असंवैधानिक है बल्कि ऐसा न्यायिक कार्य, असल में मध्यकालीन बर्बर मानसिकता का परिचायक भी है। दोनों में सबसे अहम फ़र्क़ ही यह है कि आधुनिकता मानव अधिकारों को सबसे आगे रखती है जबकि मध्यकालीन बर्बरता एक राजा के आदेश पर किसी भी नागरिक अधिकार के स्वरूप को कानून की आड़ में ‘ज़ीरो’ घोषित कर सकती है।
दूसरे किस्म के वो जज हैं जो नागरिक अधिकारों के साथ पूरी तरह खड़े हैं। इन न्यायाधीशों ने संविधान की व्याख्या संविधान सभा के मूल्यों के आधार पर की है। ये जज सरकार से सवाल पूछते हैं, सरकार की ज़िम्मेदारी तय करते हैं और मौलिक अधिकारों के हनन को बर्दाश्त नहीं करते। बॉम्बे उच्च न्यायालय में ऐसे ही एक न्यायाधीश है, जस्टिस माधव जामदार।
जस्टिस जामदार ने हाल में एक मामले की सुनवाई करते हुए सख़्त टिप्पणी की और सरकार से पूछा “क्या भारत के सभी नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? क्या लोग अब विरोध प्रदर्शन या आंदोलन भी नहीं कर सकते?" बहुत वक़्त बीत गया और मुझे किसी संवैधानिक न्यायालय के जज के मुँह से ऐसी टिप्पणी सुनने को नहीं मिली।
विरोध-प्रदर्शन के लिए तड़ीपार?
असल में जस्टिस जामदार, सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के मामले की सुनवाई कर रहे थे। सईद अहमद को मुंबई पुलिस (जोन 6 के डीसीपी) ने दिसंबर 2025 में एक साल के लिए शहर से 'तड़ीपार' करने का आदेश दिया था जिसे बाद में मार्च 2026 में कोंकण डिविज़नल कमिश्नर ने भी बरकरार रखा। सईद अहमद इसके ख़िलाफ़ बॉम्बे उच्च न्यायालय पहुँचे। पुलिस ने कहा कि सईद के खिलाफ 2019 से 2024 के बीच 5 FIR दर्ज हैं, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए उसे तड़ीपार करना जरूरी है। लेकिन सईद का कहना था कि उसने शांतिपूर्ण तरीके से केंद्र सरकार के फैसलों (जैसे CAA-NRC और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद आदि) के खिलाफ धरने और प्रदर्शन आयोजित किए जिसकी वजह से उसके ख़िलाफ़ FIR दर्ज हुई।
यह जानते ही जस्टिस जामदार की सख्ती बढ़ गई। उन्होंने पूछा, "आजकल इतने सारे पेपर लीक हो रहे हैं। अगर लोग इन मुद्दों पर आवाज उठाएंगे, तो क्या आप उन पर केस दर्ज कर देंगे? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है।" पुलिस से सवाल करते हुए उन्होंने पूछा कि अगर याचिकाकर्ता ने 'बीजेपी सरकार मुर्दाबाद' या 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे राजनीतिक नारे लगाए, तो क्या सिर्फ इसी आधार पर किसी को शहर से बाहर निकाला जा सकता है? लोकतंत्र में यह कोई अपराध नहीं है। जस्टिस जामदार ने पुलिस को उनके कर्तव्यों की याद दिलाते हुए साफ कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के सेवक हैं, वे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के निजी नौकर नहीं हैं।
'वाशिंग मशीन' की टिप्पणी भी की
महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीतिक स्थिति (विधायकों की खरीद-फरोख्त यानी Horse Trading) पर कटाक्ष करते हुए जस्टिस जामदार ने हल्के-फुल्के अंदाज में याचिकाकर्ता से यह भी कहा कि अगर वे राजनीतिक 'वाशिंग मशीन' का इस्तेमाल करने के लिए दूसरी तरफ चले जाते, तो शायद उनके खिलाफ लगी ये सारी FIR साफ हो जातीं। संविधान के मूल को याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन करना और अपनी असहमति जताना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है तड़ीपार जैसी कड़ी कार्रवाई का इस्तेमाल गंभीर अपराधियों को रोकने के लिए किया जाना चाहिए, न कि लोकतांत्रिक आवाजों और विरोध को दबाने के लिए।
मुट्ठीभर आवाज़ें ही हैं जो मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आ रही हैं। ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का है। यहाँ जस्टिस अमितेंद्र प्रसाद किशोर की एकल पीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 12 जून को जारी किए गए उस सर्कुलर के ख़िलाफ़ कठोर आदेश दिया है, जिसमें सभी सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसे धार्मिक पाठों को अनिवार्य किया गया था। न्यायालय ने कहा कि किसी भी छात्र को कोई भी हिंदू प्रार्थना पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है और अगर सरकार फिर भी जबरदस्ती करती है तो याची कभी भी न्यायालय आकर राहत प्राप्त कर सकते हैं। न्यायालय ने सरकार को बताया कि धर्म-निरपेक्षता संविधान के आधारिक ढांचे का हिस्सा है और इसलिए इसे बायपास नहीं किया जा सकता। संविधान की रक्षा और नागरिकों की चिंता
इस समय देश में संविधान की रक्षा और नागरिकों की चिंता करने वाले ऐसे न्यायाधीशों की संख्या बहुत कम है। क्योंकि सरकार का रवैया विंडिक्टिव है और जो भी जज बीजेपी के प्रोपेगंडा को आगे नहीं बढ़ाता, संविधान और कानून की व्याख्या बीजेपी के हितों की रक्षा के लिए नहीं करता, बीजेपी के राजनैतिक विरोधियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही नहीं करता, आराजक और कट्टर तत्वों के ख़िलाफ़ कठोर कार्यवाही करता है उसका न्यायिक करियर बर्बाद कर दिया जाता है। जस्टिस मुरलीधर से लेकर जस्टिस अतुल श्रीधरन इसके उदाहरण हैं। इस सरकारी मनमानी के ख़िलाफ़ चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय खड़ा हो सकता है, कानून और संविधान सम्मत कार्यवाही कर सकता है और इस काम में उसे भारत की बहुसंख्य आबादी का पूरा सहयोग भी मिलेगा, लेकिन दुर्भाग्य से न्यायालय ऐसा नहीं कर रहे हैं। यही कारण है कि मूल अधिकारों की बात हो या मानव अधिकारों की, जंगलों के उजाड़ने की बात हो या चुनाव-चोरी की, भारत का सर्वोच्च न्यायालय सरकार के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।
जस्टिस अमितेंद्र हों या जस्टिस जामदार इनकी संख्या इतनी कम और नाकाफ़ी है कि न्याय में एक उम्मीद तो बँधती है लेकिन न्यायप्रिय माहौल नहीं बन पा रहा है, कानून और संविधान के शासन की व्यवस्था नहीं स्थापित हो पा रही है। चुनाव आयोग द्वारा करोड़ों भारतीयों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया। आयोग के इस क़दम ने आज़ाद भारत के वर्चस्व को चुनौती दे दी है और सर्वोच्च न्यायालय एक आलसी अजगर की तरह चुपचाप लेटा हुआ है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय अपनी ‘मौखिक’ टिप्पणियों से यह बताने की कोशिश कर रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में पुलिस इतनी निर्लज्ज और नाकाम हो चुकी है कि कानून और संविधान की सुनने के बजाय, राजनैतिक जी-हुजूरी करने में व्यस्त है, अनगिनत एनकाउंटर किए जा रहे हैं और आवाज़ उठाने वालों के घरों पर बुलडोज़र चल रहे हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यवहार कर रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं! न्यायपालिका भूल गई है कि संविधान निर्माताओं ने भविष्य में ‘बीजेपी सरीखे शासन करने वाले राजनैतिक दलों से’ देश बचाने के लिए उस पर भरोसा किया था। दुनियाभर के विश्वविद्यालयों में जाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश ‘संविधान’ को बचाए रखने की प्राथमिकता पर ज़ोर देते हैं लेकिन भारत में यह ज़ोर नज़र नहीं आता। भारत में न्यायपलिका का झुकाव स्पष्ट रूप से सत्ता के पक्ष में है जिसे ठीक किया जाना जरुरी है। क्योंकि सत्ता की ओर झुकती हुई न्यायपलिका कब अपने साथ भारत के 75 सालों के लोकतान्त्रिक प्रयासों को ले डूबेगी, पता नहीं चलेगा।