दो दिन पहले अख़बार में एक विज्ञापन छपा था, जो छपा तो था भारत सरकार के नाम से, लेकिन ऐसा लगा जैसे वो नरेंद्र मोदी द्वारा, नरेंद्र मोदी को दिया जाने वाला एक प्रशस्ति पत्र है।

विज्ञापन का टाइटल था ‘राष्ट्र प्रथम की नीति’, लेकिन इस वाक्य से भी पहले नरेंद्र मोदी को खड़ा कर दिया गया था। पूरा विज्ञापन एक मजाक था उसमें जिन भी बातों का जिक्र किया गया था वो सभी खोखली और अधकचरी थीं।

पूरा विज्ञापन कुछ यूँ था कि अख़बार के सबसे पहले पेज पर सबसे ऊपर एक पट्टी में मोटे अक्षरों से लिखा था ‘राष्ट्र प्रथम की नीति’। इसके नीचे छोटे अक्षरों से लिखा था, ‘12 साल विश्वास के, विकास के, जनकल्याण के’। इसके बाद एक फ़ौजी की तस्वीर थी और फिर लिखा गया था- ‘नक्सलमुक्त भारत का सपना साकार। आतंकवाद पर हो रहा कड़ा प्रहार। ग़ुलामी की मानसिकता से मुक्ति, राजपथ बना कर्त्तव्य पथ, छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्रा से प्रेरित नौसेना का नया ध्वज’। और इस तरह यह विज्ञापन ख़त्म हो गया।
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किसी भी विज्ञापन की दो श्रेणियाँ होती हैं। पहली, जिस भी वस्तु या विचार को बेचने के लिए विज्ञापन किया जा रहा है उसकी विशेषताओं को लोगों के सामने रखना जिससे लोग उन विशेषताओं की वजह से उसे ख़रीद लें। दूसरी, यह कि जो वस्तु या विचार बेचा जा रहा है वो असल में एक कोकट माल है अर्थात् मूल्यहीन है लेकिन उसे मूल्यवान बना लिया गया है, यह जानते हुए भी यह गड़बड़ है, और इसलिए उसे बेचना ज़रूरी है। अख़बारों में छपा मोदी सरकार का यह विज्ञापन दूसरी श्रेणी का है।

नरेंद्र मोदी की झूठी उपलब्धियाँ!

नरेंद्र मोदी झूठी उपलब्धियों को बेचकर भारत की आम जनता से वाहवाही लूटना चाहते हैं जबकि वो ख़ुद यह जानते हैं कि वो स्वतंत्र भारत के सबसे कमजोर और नाक़ाबिल प्रधानमंत्री हैं। वो एक ऐसे नेता हैं जो न तो बेहतर योजनाओं का चुनाव कर सके और न ही देश के लिए एक बेहतर ब्यूरोक्रेसी चुन सके। नरेंद्र मोदी भारत में एक ऐसे पीएम के रूप में जाने जाएँगे जिन्होंने जहाँ भी क़दम बढ़ाया वो असफल रहे, उन्होंने जो भी योजना शुरू की वो औंधे मुँह गिर पड़ी। एक रीढ़विहीन मीडिया को ‘मैनेज’ करने के अतिरिक्त उन्हें किसी भी कार्य में सफलता नहीं प्राप्त हुई। यह मीडिया ही है जिसने उन्हें वो बना दिया है जिसके बारे में उन्हें ख़ुद भरोसा नहीं होता होगा।

नरेंद्र मोदी एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने एक तरफ़ ऐसी संस्थाओं को जन्म दिया जो अपनी नाकाबिलियत का उपन्यास ख़ुद ही लिख रही हैं। तो दूसरी तरफ़ आज़ादी के बाद से चली आ रही संस्थाओं के स्वरूप को विद्रूपता के साँचे में ढाल दिया।

नीट पेपर लीक: एनटीए की विफलता

लोगों को विचार करना चाहिए कि 2017 में बनी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी अर्थात एनटीए क्या है? यूपीएससी को छोड़ दें तो 2017 में बनी यह संस्था देश की हर बड़ी और प्रतिष्ठित परीक्षा का आयोजन करवाती है लेकिन मोदी जी द्वारा बनाई गई यह संस्था इतिहास में पेपर करवाने की वजह से नहीं पेपरलीक की वजह से जानी जाएगी। नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसी शिक्षा नीति और एक ऐसा शिक्षा मंत्री इस देश को दिया है जिसे देश की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए जाना जाएगा। प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक मोदी सरकार ने पोर्टल्स और डिजिटाइजेशन का ऐसा जाल बिछाया है कि छात्र, अध्यापक और शिक्षण संस्थान तीनों ही सालों भर कंप्यूटर में डेटा एंट्री करते ही रह जाते हैं और शिक्षा के नाम पर ज़ीरो हासिल होता है। यही हाल नीति आयोग का है जो व्यक्तिगत रूप से अब नरेंद्र मोदी का मुखपत्र बन चुका है। दूसरी तरफ़ चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्थाएं हैं जिन्हें भारतीय लोकतंत्र और भारतीय भरोसे का प्रतीक माना जाता था उन्हें पूरी तरह बुल्डोज़ कर दिया गया है। चुनाव आयोग बीजेपी के सहयोगी दल के रूप में काम कर रहा है तो सर्वोच्च न्यायालय अपने कर्त्तव्यों से विमुख होकर इस लोकतंत्र को क्षत-विक्षत होते देख रहा है। दोनों ही महत्वपूर्ण संस्थाएँ दम्भी और विद्रूप हो चुकी हैं।
पीएम मोदी इतिहास में सिर्फ़ बातें करने के लिए जाने जाएँगे। जब भी काम करने वाले प्रधानमंत्रियों की बात होगी उस जगह पीएम मोदी का नाम नहीं मिलेगा। 2016 में यूपी विधान सभा चुनावों के पहले, बरेली में एक रैली में बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि “जिन राज्यों में कृषि क्षेत्र में कुछ काम किया गया है, वहाँ प्रगति देखने को मिली है। लेकिन जिन राज्यों का रवैया ‘चलता है’ और ‘चुनाव के समय देख लेंगे’ वाला रहा है, वहाँ किसानों की किस्मत भगवान के भरोसे छोड़ दी गई है। भगवान के बाद उनकी मदद करने वाला कोई नहीं है।” सुनकर ऐसा लगेगा जैसे नरेन्द्र मोदी को किसानों की बहुत ज़्यादा फ़िक्र है और कृषि राज्य का विषय होने के कारण उनके हाथ बुरी तरह बंधे हैं वरना वो तो किसानों के लिए भारत का राजकोष ही खोल देते।

किसानों की आय दोगुनी या उनकी दुर्दशा?

संभवतया इसी रैली में पहली बार मोदी जी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य भी रखा था। यह लक्ष्य मोदी कभी पूरा नहीं कर सके और आज जब 22 राज्यों में बीजेपी या उनके सहयोग से सरकारें चल रही हैं तो मोदी के मुँह से किसानों की दुर्दशा पर, उनके भाषण और भाषणों में किसी तरह की किसानों के प्रति चिंता कभी सुनाई नहीं देती। 2022 के बाद उन्होंने कभी भी किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी कोई बात नहीं दोहराई। इस सरकार ने किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। एक साल में 6000 रुपये दे देने के बाद मोदी समझते हैं कि उन्होंने किसानों के हित में पहाड़ खड़ा कर दिया है जबकि असलियत कुछ और ही है। NCRB 2024 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर घंटे एक किसान आत्महत्या कर रहा है। एक साल में 10,546 किसानों ने आत्महत्या की है(2024)। 

भारत में खेती गर्त में जा रही है और उसका दुष्प्रभाव सर्वाधिक उनपर पड़ रहा है जिनकी आजीविका खेती पर आश्रित है। यही कारण है कि आत्महत्या करने वालों में ज़्यादा संख्या उन मज़दूरों की है जो खेतों में काम करते हैं। 2019 के बाद से यह संख्या लगातार बढ़ी है।


मोदी सरकार के विज्ञापन में दिए गए नक्सलमुक्त भारत की गारंटी पर मैं ज्यादा नहीं लिख सकती क्योंकि ये सरकार अपने किसी भी दावे पर आजतक खरी नहीं उतरी।

भारत में जिस तरह नशा लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है उससे यह तो तय है कि मोदी सरकार और उनका गृहमंत्रालय या तो गहरी नींद सोने में लगा है, या जानबूझकर सोने की ऐक्टिंग कर रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग ड्रग्स की लत के शिकार हैं। यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम(UNODC) के अनुसार दुनिया की ड्रग्स की धुरी, दक्षिण एशिया, मुख्य रूप से भारत की ओर झुकती जा रही है जोकि बहुत ही खतरनाक है।

आतंकी हमलों पर दावों का सच!

गुरदासपुर आतंकी हमला (2015, 10 मौतें), मणिपुर अंबुश (2015, 20+ सुरक्षा कर्मी शहीद), पठानकोट एयरबेस आतंकी हमला (2016, 7 सुरक्षा कर्मी शहीद), उरी आतंकी हमला (2016, 19-23 सैनिक शहीद), अमरनाथ यात्रा आतंकी हमला (2017, 8 तीर्थयात्री मारे गए), सुंजवान आर्मी कैंप आतंकी हमला (2018, 11 मौतें), पुलवामा आतंकी हमला (2019, 40 CRPF जवान शहीद), रियासी आतंकी हमला (2024, 9 तीर्थयात्री मारे गए), पहलगाम आतंकी हमला (2025, 26 पर्यटक मारे गए), दिल्ली रेड फोर्ट के पास कार ब्लास्ट आतंकी हमला (10 नवंबर 2025, 15 मौतें)। इन हमलों को क्या समझा जाये? क्या यही है आतंकवाद पर प्रहार? इसके अलावा पूरा मणिपुर पिछले 3 सालों से जल रहा है, सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। बजाय इसके कि अपनी असफलताओं पर माफ़ी मांगी जाए और हर समस्या को समय रहते ठीक किया जाए, पर मोदी सरकार को शर्म नहीं आती, मोदी सरकार तो बेशर्मी की हदें पार कर चुकी है।
विमर्श से और

ट्रंप के दावों पर पीएम की चुप्पी!

विज्ञापन में एक और बात पर जोर दिया गया है- ‘ग़ुलामी की मानसिकता से मुक्ति’। पर सच्चाई कुछ और है। यह सरकार दो काम करने में लगी है। पहला 21वीं सदी में जब देश को विज्ञान और तकनीकी पर आगे बढ़ना चाहिए था तब मोदी सरकार भारत को अंधविश्वास की ओर ले जा रही है, दूसरा, यह कि शोर इस बात का मचाया जा रहा है कि ब्रिटिश कालीन क़ानूनों को समाप्त किया जा रहा है जबकि असलियत यह है कि भारत को मोदी, अमेरिकी ग़ुलामी की ओर धकेल रहे हैं। मुझे नहीं पता कि नरेंद्र मोदी की क्या मजबूरी है कि वो देश को अमेरिकी गुलामी की तरफ़ धकेल रहे हैं? नरेन्द्र मोदी जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति, ट्रम्प के साथ पेश आते हैं वो एक बेहद कमजोर नेता की बॉडी लैंग्वेज है। जब इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ट्रम्प को उनकी बदसलूकी का जवाब दे सकती हैं तो मोदी में ऐसी क्या कमी है जो वो ट्रम्प के अपमानजनक शब्दों का जवाब नहीं दे पाते। इटली ही क्यों, स्पेन, कनाडा, फ्रांस और इंग्लैंड जैसे तमाम देशों ने ट्रम्प को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया है लेकिन मोदी ‘कायरतापूर्ण’ चुप्पी को अपना हथियार मान बैठे हैं। हाल ही में फ्रांस में जी7 बैठक के दौरान ट्रम्प के साथ मोदी की द्विपक्षीय चर्चा हुई। उम्मीद की जा रही थी कि मोदी 3 भारतीय नागरिकों के अमरीकी हमले में मारे जाने को लेकर ट्रम्प से सख्ती से बात करेंगे लेकिन हुआ इसका उलटा। मोदी ने इस मुद्दे पर बात ही नहीं की। मोदी भारत के क़द को वैश्विक स्तर पर लगातार कमजोर करते जा रहे हैं। भारत में, भारत के विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़, नेहरू जैसे स्टेट्समैन के ख़िलाफ़ लगभग धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल करने वाले मोदी ट्रम्प के सामने भारतीय नागरिकों की मौत का विरोध तक नहीं कर सके। यह कहीं से ‘राष्ट्र प्रथम’ का रवैया नहीं है।

मोदी जिस तरह भारत को चला रहे हैं उससे साफ़ लगता है कि उनके लिए किसी भी भारतीय विरासत की कोई अहमियत नहीं है। चाहे वो विरासत सदियों पुराने मंदिरों की हो या लाखों की शहादत के बाद बनी संसद और संसदीय प्रणाली की, यहाँ के लोकतंत्र और यहाँ की संस्थाओं की।

‘राष्ट्र प्रथम’ का दावा तो पीएम की तस्वीर क्यों?

असल में उस मानसिक अवस्था को समझना ज़रूरी है जिसमें मोदी ‘राष्ट्र प्रथम’ का दावा करते हैं और राष्ट्र के पहले ख़ुद को ही खड़ा कर देते हैं। चाहते तो भारत का नक़्शा लगा दिया जाता, भारत का संविधान या भारतीय ध्वज लगा दिया जाता लेकिन इन सभी को नकारते हुए नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगा दी गई, इसका मतलब ही यह था कि यहाँ भारत कुछ नहीं, राष्ट्र कुछ नहीं सिर्फ़ नरेंद्र मोदी ही सबकुछ हैं। यह विज्ञापन नहीं विडंबना है जिसे सहने के लिए भारत अभिशप्त नज़र आ रहा है।

नरेंद्र मोदी ने पहले देश की जनता से 60 महीने मांगे थे, लेकिन जनता ने उन्हें इससे ज़्यादा दिया। उन्होंने राज्यों की समस्या गिनाईं तो उन्हें 22 राज्यों में सरकारें मिल गईं। लेकिन काम आज भी नहीं हो रहा है।

भारत और भारत के लोग आज भी ‘प्रथम’ नहीं हैं, भारत के अन्नदाता, किसान, आज भी प्रथम नहीं हैं; भारत के भविष्य, छात्र, आज भी प्रथम नहीं हैं; भारत के प्रहरी, सैनिक, आज भी प्रथम नहीं हैं। तो फिर प्रथम कौन है?
 
भारत में प्रथम हैं अडानी जैसे लोग जिन्हें भारत के सबसे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट दिए जा रहे हैं, लाखों करोड़ों साल पुराने जंगलों को काटने का लाइसेंस दिया जा रहा है, दुनिया भर के देशों में जाकर अडानी के हितों की रक्षा की जा रही है, तमाम देशों में उसके ख़िलाफ़ चल रही कानूनी कार्यवाहियों को रुकवाया जा रहा है। भारत में नियामक सस्थाएँ अडानी के साथ खड़ी हैं, कानून और व्यवस्था उनकी बंधक बनी हुई है, उन्हें किसी भी अदालत में खड़ा नहीं किया जा सकता, उनके लिए भारत का संविधान और लोकतंत्र बौना बना दिया गया है वही असल में ‘प्रथम’ है।

इस प्रथम को बदले जाने की जरूरत है ताकि भारत प्रथम आ सके, यहाँ के लोग प्राथमिक बन सकें।