3 मई को NEET-UG की परीक्षा देने के बाद अहमदाबाद के कहान पटेल ने अपने पिता को फ़ोन करके कहा कि “पापा, मैं बहुत खुश हूँ। मैं तनावमुक्त महसूस कर रहा हूँ। मैं अपने दोस्तों के साथ डिनर के लिए जा रहा हूँ।” कहान खुश था क्योंकि उसे लगा कि उसने नीट परीक्षा में शानदार परफॉर्म किया है। लेकिन उसकी यह ख़ुशी बहुत ज़्यादा दिन तक नहीं टिक सकी। उसे पता चला कि पेपर लीक हो गया है और अब परीक्षा दोबारा करवाई जाएगी। वो टूट गया उसने अपने पिता से कहा “मेरी क्या गलती है पापा?”। दोबारा परीक्षा की तारीख़ से 3 दिन पहले 18 जून को 17 साल के कहान ने 6ठी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। कहान पटेल उन 21 छात्रों में शामिल हैं जिन्होंने नीट-2026 के पेपर लीक होने के बाद निराश होकर आत्महत्या की है।

21 भारतीय युवाओं द्वारा की गई यह आत्महत्या नरेंद्र मोदी सरकार की घोर विफलताओं का परिणाम है। अपने खोखले राष्ट्रवाद के नैरेटिव को गले में टांग कर चलने वाली मोदी सरकार इतनी अक्षम, अकर्मण्य और भ्रष्ट है कि यदि इसे नरेंद्र मोदी सरकार की जगह ‘पेपरलीक सरकार’ नाम दे दिया जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

शिक्षा पर ख़र्च बढ़ा

कांग्रेस द्वारा तैयार किए गए एक अनुमान के अनुसार, भारतीय परिवार हर साल अपने बच्चों को नीट समेत तमाम अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाने के लिए 1 लाख 23 हजार करोड़ रुपये खर्च करता है। यह राशि देश के 1 लाख 32 हज़ार करोड़ रुपये के वार्षिक राष्ट्रीय शिक्षा बजट के लगभग बराबर है। भारतीय परिवार शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं और उसके बदले में मोदी सरकार की नाक के नीचे प्रतियोगी पेपर लीक हो रहे हैं और इस वजह से उनके बच्चे छतों से कूदकर, फाँसी लगाकर आत्महत्या कर रहे हैं। इस अनुमान के मुताबिक़, मोदी जब से सत्ता में आए हैं तब से अब तक 152 बड़ी परीक्षाओं के पेपरलीक हो चुके हैं।
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जेन ज़ी में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा

स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही है। भारत में 14 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 38 करोड़ युवा हैं। इन्हीं को Gen Z कहा जा रहा है। इन युवाओं की संख्या भारत में सर्वाधिक है लेकिन इनकी तकलीफ़े भी सर्वाधिक हैं। जब से मोदी सत्ता में आए हैं शिक्षा महंगी हो गई है। लोन लेकर महंगी डिग्रियाँ हासिल करने के बाद भी युवाओं को नौकरियाँ नहीं मिल रही हैं। स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट-2026 के अनुसार, भारत में बेरोजगार युवाओं में दो तिहाई संख्या ऐसे लोगों की हैं जो ग्रेजुएट हैं।

इन मजबूरियों और सरकार की नाकामियों को याद दिलाने के लिए जब युवा छात्र इकट्ठा होकर अपनी मांगों को मनवाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं (जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन, 20 जुलाई), सरकार को याद दिलाते हैं कि उनकी बेरोज़गारी उनके परिवारों को भीतर से खोखला कर रही है तो उन्हें लाठियाँ खाने पर मजबूर होना पड़ता है। एक लंबे समय से बीजेपी-आरएसएस के प्रोपेगंडा का शिकार रहा मजबूर युवा जब सरकार के झाँसे में आने से इनकार कर देता है, मंत्रियों के इस्तीफे माँगता है तो तानाशाही सरकारें उनपर पैलेट गन से हमला करवाती हैं, पुलिस वाले बेरहमी से उन्हें तब तक पीटते हैं जब तक युवा बेहोश ना हो जाएँ या ख़ुद पुलिस वाला थक ना जाये। सरकारी बेशर्मी अपने चरम पर है। 

अपनी गलतियों के लिए जिम्मेदारी लेने के लिए मंत्री सदन से गायब रहते हैं, देश के प्रधानमंत्री तो संसद का रास्ता ही भूल चुके हैं।

मेरी समझ से बाहर है कि अगर किसी व्यक्ति ने गृहमंत्री, प्रधानमंत्री या शिक्षामंत्री की हैसियत से कोई फ़ैसला लिया है तो वह उस फ़ैसले की जिम्मेदारी लेने से क्यों बच रहा है? अगर जिम्मेदारी से बचना था तो भारत की संसदीय प्रणाली में क्यों शामिल हुए? संसदीय प्रणाली का तो मूल ही है ‘जवाबदेही’। यहाँ ग़ैर-जवाबदेह लोगों की जगह तब से ही समाप्त हो चुकी है जबसे गांधी-नेहरू के नेतृत्व में अंग्रेज़ों को भारत से भगा दिया गया था। संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-74 में भारत के प्रधानमंत्री का पद रखा लेकिन अगले अनुच्छेद 75(3) में मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत भी दे दिया। जवाबदेही भारतीय संविधान और संसदीय प्रणाली का मूल है।

ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

लेकिन आरएसएस और बीजेपी इस सिद्धांत को नहीं मान रहे हैं। वे सिर्फ़ कर्त्तव्यबोध का पाठ पढ़ा रहे हैं, वो भी आरएसएस और बीजेपी के लोगों को नहीं; आम जनमानस को। आरएसएस खुद कर्त्तव्य और जिम्मेदारी से विमुख संगठन है। यहाँ सिर्फ़ प्रवचन और मौकापरस्ती है। इसका उदाहरण तब मिला जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जेन-जी युवाओं के लिए एक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में भागवत इस पीढ़ी के युवाओं से बातचीत करते दिखे। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि अगर जेन-जी किसी मुद्दे पर विरोध कर रहा है तो वह देश विरोधी नहीं हो जाता। जंतर मंतर में हुए विरोध प्रदर्शन पर उन्होंने कहा कि ‘प्रदर्शनकारियों की मांगें जायज़ हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि वो हमारी अगली पीढ़ी हैं और मुझे उन पर आँख मूँदकर भरोसा है।
देखा जाए तो भागवत के संवाद कार्यक्रम के दो आयाम हैं। पहला यह कि भागवत झूठ बोलने और किसी बहुत ज़रूरी मुद्दे को ‘डाइल्यूट’ करने आये हैं। दूसरा यह कि जेन-जी के साथ संवाद करना भागवत की दिली मंशा नहीं बल्कि मजबूरी का प्रतीक है। एक ऐसी मजबूरी जिसे नज़रंदाज़ किया तो पूरे संघ का वर्चस्व खतरे में पड़ सकता है।

संघ का असली चरित्र

मोहन भागवत के शब्दों पर गौर करते ही आरएसएस और उससे संबंधित संगठनों का असली चरित्र फिर से सामने आ जाता है और झूठ अपना नृत्य शुरू कर देता है, जैसा कि हर बार होता है। भागवत ने एक बार कहा था कि “अगर कोई हिंदू कहता है कि यहां कोई मुसलमान नहीं रहना चाहिए तो वह व्यक्ति हिंदू नहीं है” इसी भाषण में उन्होंने मॉब लिंचिंग की भी आलोचना की और कहा कि कानून को बिना किसी पक्षपात के अपना काम करना चाहिए। एक जगह भागवत कहते हैं कि “न हिंदुओं का वर्चस्व हो सकता है, न मुसलमानों का, वर्चस्व केवल भारतीयों का हो सकता है।” इसी तरह वो महिलाओं को लेकर कहते हैं कि “महिलाओं को काम करने की स्वतंत्रता और सभी क्षेत्रों में समान अधिकार देना अनिवार्य है।”

क्या भागवत ने इन मामलों पर संवाद किया?

लेकिन जब गौ रक्षक मिलकर किसी को पीट पीटकर मार डालते हैं तो भागवत कोई संवाद नहीं करते। जब बिलकिस बानो के आरोपियों को गुजरात बीजेपी सरकार छोड़ देती है तो भागवत कोई संवाद नहीं करते, जब लव जिहाद की आड़ में तमाम बीजेपी सरकारें मुसलमानों को प्रताड़ित करती हैं तो भागवत चुप रहते हैं। जब बजरंग दल के लोग चर्च के बाहर असभ्यता से हनुमान चालीसा पढ़ते हैं तो भागवत कोई संवाद नहीं करते। बाबरी मस्जिद का इतनी बर्बरता से तोड़ा जाना भागवत के लिए अफ़सोस का कारण नहीं है, इसीलिए वो तब भी संवाद नहीं करते जब गुंडे असभ्य मवालियों का झुंड भगवा पहनकर मस्जिदों की छतों पर चढ़कर अश्लील डांस करता है और सामान्य लोगों में भय फैलाता है, मस्जिदों पर भगवा फहराता है जैसे वो गजनवी और गोरी से लड़ रहा हो। कांग्रेस के काल में तो भागवत रेप को ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बाँट देते हैं, लेकिन जब बात उस सरकार की आती है जिसके काल में हजारों करोड़ रुपये के आरएसएस मुख्यालय बने, पूरे देश में अनगिनत कार्यालय बनाये गए, तो भागवत आनंद लेते हैं और चुप रहते हैं, भारतीय महिला पहलवानों के आरोपी बृजभूषण पर बलात्कार के आरोप की बात हो या तमाम अन्य ‘सेंगरों’ की वे कोई संवाद आयोजित नहीं करते। 

यहाँ तक कि पादरी ग्राहम स्टेंस के परिवार को ज़िंदा जला देने वाले दारा सिंह को बचाने और जेल से बाहर लाने की कोशिश का भी भागवत विरोध नहीं करते, संवाद नहीं करते।

इसके उलट मोहन भागवत ये कहते हैं कि भारत विभाजन इसलिए हुआ क्योंकि हिंदुओं के ‘सेंटीमेंट्स’ का ख़याल नहीं रखा गया। भागवत सर्टिफिकेट बाँटने वाली एजेंसी बनते दिख रहे हैं। असम में एक कार्यक्रम में के दौरान उन्होंने कहा कि “अगर मुस्लिम और ईसाई भारत की पूजा करते हैं तो वो हिंदू हैं”। क्या भारत की पूजा करने वाला भारतीय, सिर्फ़ हिंदू होगा? क्या भारतीय होने के लिए हिंदू होना अनिवार्य है? यह अधिकार उन्हें किसने दिया कि वो धर्म को देशभक्ति से ऊपर खड़ा कर दें? धर्म को संविधान से ऊपर खड़ा कर दें? वो झूठे हैं, उनकी धार्मिक ‘समरसता’ भी झूठी है अन्यथा असम में बैठकर वो पहला सवाल मुस्लिमों और ईसाईयों की देशभक्ति पर नहीं असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की सांप्रदायिक हरकतों पर उठाते।

असल में भागवत सहित पूरा आरएसएस का चुप रहना और संवाद करना उनकी ‘सहूलियत’ का मसला है, कल तक आंबेडकर को बुरा बोला, गांधी को बुरा बोला, संविधान को स्वीकार नहीं किया, ध्वज नहीं स्वीकार किया और आज हर चीज से पलट गए हैं, क्यों? क्योंकि आज इसी में उनकी सहूलियत है।

भागवत ने क्या पेपर लीक पर संवाद किया?

यही बात जेन-जी के मामले में भी सच है। जब लगातार पेपर लीक हो रहे थे, जब छात्र आरएसएस और बीजेपी के नेताओं से मिलकर अपनी बात रख रहे थे, जब छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपना पक्ष रख रहे थे, आग्रह कर रहे थे, तब तक भागवत और पूरे आरएसएस ने उन्हें नज़रंदाज़ किया। जब छात्रों ने जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया तब भी भागवत के मुंह से संवाद के सुर नहीं फूटे, युवाओं ने 20 दिन तक आमरण अनशन किया और भागवत ये सब देख रहे थे, संसद मार्च की घोषणा हुई, मार्च शुरू हुआ तब भी स्वयंसेवी संगठन के मुखिया की चुप्पी बनी हुई थी। यहाँ तक कि दिल्ली पुलिस की बर्बरता के बाद भी, मोहन भागवत का तथाकथित सांस्कृतिक संगठन अपनी विचारधारा वाली सरकार के साथ तटस्थ होकर खड़े रहे, तमाम संघ और बीजेपी के नेता युवा छात्रों को ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ का पाठ पढ़ा रहे थे।
लेकिन अब जब आरएसएस प्रमुख भागवत ने देखा कि देश की जनसंख्या में 38 करोड़ का बल रखने वाला समूह, आरएसएस और उसकी विचारधारा; पीएम नरेंद्र मोदी की महानता के गढ़े हुए मिथक को पूरी तरह नकार चुका है। जब देखा कि अब धर्म के आधार पर बनाई गई खाई पट रही है और ‘सरकारी चुनाव आयोग’ भी शायद युवाओं के इस लोकतांत्रिक आक्रोश से मोदी की सत्ता ना बचा सके, तब आरएसएस मुखिया ने इस जेन-जी घटना को अपने अस्तित्व से जुड़ता हुआ पाया। क्योंकि बीजेपी ने ही उन्हें मालामाल किया है, वो आज जो सुख सुविधाओं का जीवन व्यतीत कर रहे हैं वो सब बीजेपी सरकार की देन है। अगर बीजेपी सत्ता से गई तो भारत को लेकर उनका जो ‘एजेंडा’ है वो कभी पूरा नहीं होगा। इसलिए भागवत को मजबूरीवश इन जेन-जी छात्रों के साथ संवाद शुरू करना पड़ा।

जेन ज़ी संवाद में कौन हुए शामिल?

भागवत जिस तरह का संवाद कर रहे हैं वह दिखावा ही है। क़ायदे से इसमें वो छात्र और युवा शामिल होने चाहिए थे जिन्होंने मोदी सरकार की नीतियों के विरोध में अनशन किया था, जिन युवाओं ने मोदी को लेकर विभिन्न क्रिएटिव मीम बनाये थे। और अगर हो सके तो उन लड़कियों को भी शामिल किया जाना चाहिए था जिनकी वजह से पीएम मोदी को देर रात ‘कल्चरल शॉक’ लग गया था। पर भागवत संवाद में ऐसे आन्दोलनकारी युवा शामिल नहीं थे।
 
अपने पसंदीदा युवाओं को सामने बिठाकर लापरवाह और तानशाही अंदाज़ में कुरते की बाजू को हिलाते हुए जेश्चर में संवाद करना वही शैली है जो पीएम मोदी पिछले 12 सालों से करते आए हैं। अगर मोहन भागवत सच में गंभीर हैं जिसे लेकर मुझे संदेह है, तो उन्हें किसानों, मुसलमानों, ईसाइयों, भारत की विविधता, और विपक्ष के ख़िलाफ़ तैयार किए गए दुश्मनी वाले वातावरण के ख़िलाफ़ बोलना चाहिए। और यदि वाक़ई भागवत की पकड़ उनके संगठन, आरएसएस में अभी भी बाक़ी है और यदि वो सच में ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ और ‘वी’ के विचारों से आगे बढ़ गए हैं तो बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों पर लगाम लगाएं। यदि मोहन भागवत अपनी गंभीरता असल में साबित करना चाहते हैं, जोकि उन्हें करनी भी चाहिए वरना आरएसएस का पतन निश्चित है, तो उन्हें राम मंदिर में हुए चढ़ावा चोरी की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और आरएसएस को पूरी तरह से राम मंदिर प्रशासन से अलग हो जाना चाहिए क्योंकि पूरा राम मंदिर प्रशासन आरएसएस के दिशा निर्देशों पर काम करता है, उसी के लोग राम मंदिर की देखरेख करते हैं।
विमर्श से और
भागवत जब तक इस किस्म की नैतिकता और ईमानदारी नहीं दिखायेंगे तब तक वर्तमान पीढ़ी उनसे न प्रभावित होगी और न ही उनके झाँसे में आएगी। भारत बदल रहा है अब उन्हें भी बदलना होगा जो भारत को धर्म के नाम पर लामबंद करने का काम करते आए हैं।

भागवत से सवाल?

नीट-2026 के बाद जिस तरह युवा छात्रों ने आत्महत्या की और पीएम मोदी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, भागवत हों या कोई अन्य सांस्कृतिक संगठन कोई साथ देने नहीं आया। सभी अपने ‘निर्भीक’ कार्यकर्ता धर्मेंद्र प्रधान को बचाते रहे। अब युवा किसी बहकावे में नहीं आयेगा। वैसे तो मोहन भागवत कोई नहीं हैं, उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए लेकिन जब केंद्र सरकार, पूरी बीजेपी बिना आरएसएस के एक क़दम भी नहीं चलती तो सवाल तो बनता है। सवाल यह भी है कि भारत में चल रही अथाह लूट की समाप्ति कब होगी? इस लूट ने ही तो युवाओं को बेरोजगार बनाकर रखा है। डीप टेक स्टार्टअप के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली 62% सहायता उन लोगों के स्टार्टअप के पास क्यों गई जो उस कमेटी में शामिल थे, जिन्हें ऐसी सहायता की आकांक्षा रखने वाले स्टार्टअप का चुनाव करना था। हजारों करोड़ रुपये से बनी सड़कें अगले दिन धँस रही हैं, मिड डे मिल में पानी में आलू और नमक और पूड़ी जैसे भोजन दिए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के परीक्षा परिणामों में नक़ली नाम (जैसे- ‘भक्त प्रहलाद’ हे राम’,’ स्पेस रानी’,’न्यूज़’) का चयन हो रहा है और भ्रष्टाचार से भारत बेहाल है तमाम बीजेपी सरकारें और मोहन भागवत इस पर संवाद आयोजित नहीं करते, आवश्यक नीतियां नहीं बनाते।

इसलिए अब मोहन भगवत समझ गए हैं कि जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के बाद युवा आत्महत्या नहीं करेंगे। वो अब सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं और अगर सरकार ने अपना रवैया बहुत जल्दी नहीं बदला तो नरेंद्र मोदी सरकार, बीजेपी और आरएसएस सभी गुजरे जमाने का हिस्सा बन जाएँगे। भागवत द्वारा किया जा रहा संवाद ‘युवा शक्ति’, ‘युवा उत्थान’ आदि के लिए नहीं आरएसएस की सांस्कृतिक और राजनैतिक हेजेमनी को रोकने का अंतिम और असफल प्रयास है।