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अक्षमता की कहानी लिखी जा चुकी है, अब तीसरी बार क्यों?

लोकसभा के चुनाव होने को है और इस के साथ ही मोदी को प्रधानमंत्री बने दस साल हो जायेंगे । ऐसे में ये वक़्त है उनके सही आकलन का । ये वक्त है देश के लोगों को यह बताया जाए कि तथाकथित सबसे सफल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आजतक अपने किसी प्रमुख दावे या वादे को पूरा नहीं कर सके हैं और न ही वो तब, कभी भी समय पर बोले जब, देश के सबसे वंचित और पीड़ित लोगों को प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की आवश्यकता थी। वो हर गुहार पर चुप थे, हर शोषण को उन्होंने नजरंदाज कर दिया। वो अगर बोले तो सिर्फ अपने लिए, अपनी पार्टी और संगठन के लिए।  

जिस ‘गुजरात मॉडल’ को लेकर उन्होंने हल्ला मचाया वो कोई मॉडल ही नहीं था। बहुत बाद में यह समझ आया कि यह तो एक-दो उद्योगपतियों के लिये संचालित राज्य बन चुका था। वहाँ के नागरिकों के लिए कभी कुछ था ही नहीं। रही बात गुजरात में व्यवसायी कल्चर की तो गुजरात का व्यापारी वर्ग तब(1960s) से सशक्त था जब से नरेंद्र मोदी जी ने ‘राजनीति की ABCD’ भी नहीं सीखी थी।

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आईआईएम-अहमदाबाद के रवींद्र ढोलकिया, जिन्हे नरेंद्र मोदी के प्रशंसक के रूप में भी जाना जाता है; अपने आंकड़ों से स्वयं ही साबित कर देते हैं कि गुजरात में तीव्र औद्योगिक विकास नरेंद्र मोदी की नहीं 90 के दशक में आई उदारवादी आर्थिक नीतियों की देन थी जिसके प्रमुख शिल्पी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे। 

वास्तव में नरेंद्र मोदी की प्रमुख छवि एक सांप्रदायिक नेता की ही रही। गुजरात दंगों के बाद उनका ग्राफ बहुत तेज़ी से बढ़ा। इससे उन्हें राजनीतिक फ़ायदा हुआ। सीएम की कुर्सी में स्थायित्व आया। फिर उनके द्वारा इस स्थायित्व का इस्तेमाल किया गया अपनी पोजीशन को और भी अधिक मज़बूत बनाने के लिए। नये दावे किए गए, नए क़िस्म से हिंदू-मुस्लिम डिवाइड को उभारा गया। भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त (लिंगदोह) तक को धार्मिक आधार पर तौलने से नरेंद्र मोदी नहीं चूके। ये सब शायद इसलिए, ताकि सांप्रदायिक आधार पर उन्हें हर बार वोट अवश्य मिलता रहे। कुर्सी के स्थायित्व का फायदा हमेशा होता है, यही फायदा नरेंद्र मोदी को भी मिला। रीढ़विहीन मीडिया और तमाम प्रॉपगैंडा मशीनों द्वारा तथाकथित गुजरात मॉडल का स्वरूप रचा गया। अगर एक हाईवे बन गया तो बार बार उसी हाईवे को सौ बार जिक्र करके बताया गया मानो सौ हाईवे बने हों। लेकिन जिन चीजों में वास्तव में बिना प्लानिंग के काम नहीं हो सकता था उन क्षेत्रों में सीएम के रूप में नरेंद्र मोदी बुरी तरह विफल रहे। ये वही सामाजिक-पर्यावरणीय और आर्थिक क्षेत्र के संकेतक ही थे।
धीरे धीरे मीडिया द्वारा गुजरात मॉडल को विकास के मॉडल का पर्याय साबित किया जाने लगा। आरएसएस के ज़मीनी कार्यकर्ता आम भारतीयों को उस मॉडल की कहानी बताने में लगे थे। ऐसी छवि बनायी गई मानो गुजरात पूरे भारत से अलग है। गुजरात के विषय में अलग विकास और अलग एहसास सब दिलाने की कोशिश की गई। संभवतया ‘कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में’ भी इसी प्रॉपगैंडा का ही हिस्सा था। गरीब से गरीब राज्य सामाजिक सूचकांकों पर अच्छा कर रहे थे लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात लगातार पिछड़ता जा रहा था। 

पूरे देश में अब यह फैल चुका था कि नरेंद्र मोदी भारत को गुजरात मॉडल में रंग देंगे। अन्ना आंदोलन से और CAG विनोद राय की रिपोर्ट जिस पर उन्हें बाद में स्वयं ‘अफसोस’ हुआ, ने नरेंद्र मोदी के लिये स्थितियाँ और भी अनुकूल कर दीं। सबका राजनीतिक फ़ायदा हो रहा था। अन्ना आंदोलन को भी राजनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जाना था। भविष्य ने यह बता भी दिया जब अरविंद केजरीवाल ने भविष्य के सभी आंदोलनों की हत्या करते हुए अन्ना आंदोलन से पार्टी के जन्म को सुनिश्चित कर दिया।
इधर इन सब घटनाओं का फ़ायदा नरेंद्र मोदी जी को हो गया था।

जिसके राज्य में 6 करोड़ जनता का एक बड़ा वर्ग शिक्षा, आमदनी और स्वास्थ्य की बुरी हालत झेल रहा था, जिसके राज्य में वनों की संरक्षित भूमि उद्योगपतियों को लगभग दान में दी जा रही थी, जिसके राज्य में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की संख्या उच्च स्तर पर थी(2015,NCRB), जिसके राज्य में आम जनता से पहले उद्योग और उदयोगपतियों को खुश करने का काम किया जा रहा था, जिसके राज्य में उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपये का बिक्री कर माफ कर दिया गया था, जिसका राज्य बच्चों के बौनेपन के मामले में देश में 26वें स्थान पर था, जिसके राज्य के हजारों गाँव टैंकर से पानी पीने के लिए अभिशप्त थे(2016-17 बजट), जिसने 2003 में ऐसी औद्योगिक नीति बनाई जिसकी वजह से औद्योगिक इकाइयों को प्रदूषण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की जरूरत को लगभग खत्म कर दिया, जिसके राज्य में प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात 28:1 था (देश में चौथा सबसे कम) और राज्य में प्रति 100,000 लोगों पर मात्र 28 कॉलेज थे, जिसके राज्य में शिशु मृत्यु दर (33 प्रति 1,000) झारखंड से भी बदतर थी(2015), जिसके राज्य में गरीबी दर राजस्थान, उत्तराखंड और यहां तक कि अशांत जम्मू और कश्मीर से भी बदतर थी(2011), जिसके राज्य में स्वास्थ्य पर अपनी जीएसडीपी(GSDP) का 1% से भी कम खर्च किया जा रहा था, जिसके राज्य के विषय में विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना था कि वहाँ खराब पोषण की वजह से बच्चों का विकास अवरुद्ध और बिगड़ा हुआ है, जिसके राज्य में साक्षरता, देश की सबसे बदतर साक्षरता दरों में से एक थी, जिसके राज्य में शहरी श्रमिकों के लिए औसत दैनिक वेतन राष्ट्रीय औसत के 449 के मुकाबले मात्र 320 रुपये (2011) था, वो अब देश का प्रधानमंत्री बन चुका था। 

आज केंद्र में नरेंद्र मोदी हैं तब भी MSME की हालत खराब है जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी इस क्षेत्र की हालत बुरी थी। केंद्रीय MSME मंत्रालय के अनुसार, गुजरात में बीमार इकाइयों की संख्या 2010-11 में 4,321 से बढ़कर 2012-13 में 20,615 और 2014-15 में 49,382 हो गई है। नरेंद्र मोदी के सीएम काल के दौरान 2004 और 2014 के बीच, गुजरात में 60,000 MSME बंद हो गए। जबकि इसी बीच गुजरात औद्योगिक विकास निगम (जीआईडीसी) औद्योगिक इकाइयों को 99 सालों के लिए पट्टे पर जमीन दे रहा था और अधिक SEZ बनाने में लगा था। बड़े उद्योगों की कीमत पर छोटे उद्योग मारे जा रहे थे। बेतहाशा जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा था। 1990-2001 में जहां 4,620 हेक्टेयर का अधिग्रहण किया गया वहीं, यह आंकड़ा नरेंद्र मोदी के सत्ता में आते ही, 2001 और 2011 के बीच बढ़कर 21,308 हेक्टेयर हो गया। ताज्जुब की बात तो यह कि ज्यादातर अधिग्रहण राज्य की कृषि क्षमताओं की कीमत पर किया जा रहा था। ज़मीन आमतौर पर उद्योगपतियों को बाज़ार मूल्य से कम पर बेची जारही थी।
टाटा समेत तमाम उद्योगों को हजारों करोड़ रुपये की बिक्री कर की सब्सिडी प्रदान कर दी गई। लेकिन क्या उद्योगों को प्रोत्साहन देने से रोजगार बढ़ रहा था? नहीं, बिल्कुल नहीं! हालत बहुत गंभीर थी। शिक्षित-बेरोजगारों की संख्या - 2016 में 6.12 लाख - बढ़ चुकी थी और किसानों का तर्क था कि उनकी दैनिक आय - 2016 में 264 रुपये - राष्ट्रीय औसत से 77 रुपये कम थी। गुजरात की 40% आबादी यानि लगभग 80 लाख लोग बहुआयामी गरीबी में जीवन जी रहे हैं। क्या यह स्पष्ट नहीं है कि गुजरात मॉडल को लेकर बनायागया प्रचार खोखला और नकली था?

क्यों? इसके बीज भी ‘गुजरात मॉडल’ में ही छिपे होंगे। अगर सरकार से सवाल पूछने वालों को जेल में डालने की आदत में थोड़ा सुधार हो तो इसे गुजरात मॉडल के ‘अविष्कारक’ से ही पूछा जाना चाहिए।


वाराणसी को क्योटो बनाने का सपना दिखाने वाले पीएम मोदी असल में भारत को धर्मालय बनाने में लग गये। अयोध्या, वाराणसी, उज्जैन आदि में मंदिरों के विस्तार किए जाने लगे। इलेक्टोरल बॉन्ड और विमुद्रीकरण के नाम पर अपने ही दल को फ़ायदा पहुँचाने की अलोकतांत्रिक कोशिश भी जारी रही (सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई से स्पष्ट है)। उनके गुजरात से मित्र रहे गौतम अडानी जो अमीरों की लिस्ट में कहीं नहीं थे कोरोना काल में वो दुनिया के दूसरे नंबर के अमीर बन गये थे।
वहीं दूसरी तरफ़ विपक्षी दलों या यह कहें कि सिर्फ़ विपक्षी दलों के नेताओं और उनके क़रीबियों पर ED के छापे मारे गये, विरोधियों को जेल में डाला जाने लगा। सरकार ने कुछ इस तरह कार्य करना शुरू कर दिया और कुछ इस तरह मुक़दमों की पैरवी शुरू कर दी कि अदालतें भी यह भूल गई कि ‘जमानत नियम है और क़ैद अपवाद’! एक जबरदस्त लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए यह सब नया था, सब कुछ उल्टा हो रहा था।
पुलवामा में अपने ही देश के सैनिकों पर हुए हमलों के कारण को दबाने की कोशिश की गई, उसका राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश की गई (पूर्व राज्यपाल, सत्यपाल मलिक)। लगातार नरेंद्र मोदी के नाम को ब्रांड बनाने की कोशिश होती रही।एक-एक करके तथाकथित मेन-स्ट्रीम मीडिया से सवाल पूछने वाले पत्रकारों को हटाया जाने लगा, टीवी डिबेट्स सरकारी प्रॉपगैंडा के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचा। बेशर्मी की हद पार करते हुए आम जनता तक ‘महंगाई के फ़ायदे’ इसी मेन-स्ट्रीममीडिया द्वारा फैलाए गए। महंगाई के लिए सरकार को दोषी ना माना जाए इसकी कोशिश में सभी टीवी चैनल लगातार 24 घंटे लगे गए। 

इतनी घोर असफलताओं और अक्षमताओं के बावजूद सबसे बड़ा यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि देश में कोई विकल्प नहीं है इसलिए मोदी ही प्रधानमंत्री बनने लायक हैं।


हकीकत क्या है ? घरेलू मोर्चे से लेकर विदेश नीति तक, आंतरिक सुरक्षा से लेकर आतंकवाद तक पीएम मोदी हर जगह असफल दिखते हैं। अर्थनीति की बदहाली और बेरोजगारी तो 1947 की अवस्था में पहुँच चुके हैं(कौशिक बासु)। फिर भी उन्हे मीडिया द्वारा एक ईमानदार नेता के रूप में पेश करने की कोशिश लगातार जारी है जबकि उनके अन्तर्गत एक से बढ़कर एक स्कैम हो रहे हैं। हिंडनबर्ग  और फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट बता रही है कि अडानी के खिलाफ जाँच होनी चाहिये जैसे कि तमाम विपक्षी नेताओं की हो रही है मालूम आरोप लगने पर लेकिन उनके ख़िलाफ़ जाँच नहीं होती ? क्यों ?
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किसी एक ही व्यक्ति को पीएम पद के लिए फिर से (तीसरी बार) चुनना भारत के नागरिकों की बाध्यता तो नहीं है? आखिर किसे पीएम चुनना चाहिए? कम से कम ऐसे व्यक्ति को चुना जा सकता है जो अपने वादों पर खरा उतरता हो। पीएम मोदी ने ‘नोटबंदी से काला धन खत्म’ करने की बात कही थी, ऐसा नहीं हो पाया, काला धन बनना और पलना लगातार जारी है। कहा गया कि 15 लाख रुपया सबके खाते में डाला जाएगा, बाद में ‘जुमला’ कहकर खुद के नेता की ही बेइज्जती कर दी गई। ‘रुपया’ की कीमत गिरने पर पीएम मनमोहन सिंह को सीएम मोदी ने खूब ललकारा था, आज जब रुपये की कीमत अब तक के सबसे निचले स्तर पर है, कोई जवाब नहीं है उनके पास, क्यों? 2022 तक गंगा साफ होनी थी, सबको पेयजल मिलना था, 100 स्मार्ट सिटी बननी थी, बुलेट ट्रेन आनी थी, किसानों की आय दोगुनी होनी थी, सिलिन्डर सस्ता होना था, पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने थे और भारत को 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनना था। कुछ हुआ? कोई वादा पूरा हुआ? नहीं हुआ! दो बार भारत जैसे विशाल देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी, इतना बड़ा मौका मिलने के बाद भी पीएम मोदी भारत के लिए अपना कोई वादा पूरा नहीं कर पाए। भारत के नागरिकों ने उनका और उनके दल और विचारधारा को ‘सहने’ का प्रण नहीं लिया है।

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वंदिता मिश्रा
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