भारत नक़ली सामानों का हब बनता जा रहा है और सरकार इसे ऐसा बनते हुए देख रही है. न इस नकली भारत की चिंता पीएम मोदी को है और न इसकी चिंता देश के न्यायालयों को है जो स्वतः संज्ञान लेकर सरकार को कार्यवाही का आदेश देते. अभी अप्रैल माह शुरू ही हुआ है कि दो बड़ी घटनाएँ घट गई हैं जो लोगों के स्वास्थ्य पर गहरा असर डालने वाली हैं. पहली घटना दिल्ली की है जहाँ दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने उत्तर-पश्चिम दिल्ली के कंजवाला क्षेत्र में नक़ली टूथपेस्ट बनाने वाली एक कंपनी पर छापा मारा. यहाँ नक़ली सेंसोडाइन टूथपेस्ट बनाया जा रहा था. छापे में 1800 से अधिक पैक्ड ट्यूब,1200 सेंसोडाइन पैक्ड ट्यूब और 10,000 ख़ाली ट्यूब पायी गईं जिनमें टूथपेस्ट भरा जाना था. इतना ही नहीं पुलिस को 130 किग्रा टूथपेस्ट भी मिला जिसे हानिकारक केमिकल्स के साथ मिलाकर बनाया गया था.
दूसरी घटना पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात की है. यहाँ सूरत के पांडेसरा क्षेत्र में नक़ली पनीर बनाने वाली एक यूनिट पकड़ी गई है. यहाँ 1400 किग्रा नक़ली पनीर मिला, जिसे दूध के बजाय पाम तेल और एसिटिक एसिड के माध्यम से बनाया गया था.
यह सब लगातार चल रहा है कोई रोकटोक नहीं है. अगस्त और अक्टूबर 2025 में दिल्ली-एनसीआर में ही नक़ली टूथपेस्ट सेंसोडाइन, इनो और गोल्डफ़्लेक सिगरेट बनाने वाला एक गिरोह पकड़ा गया था. अगर पिछले एक दो महीने की ही बात करें तो जितना नक़ली दूध, घी और पनीर पकड़ा गया है वो डराने वाला है.
मार्च 2026 में उत्तर प्रदेश के झाँसी में 1400 किग्रा नक़ली खोया पकड़ा गया, मार्च में ही धनबाद, झारखंड में 1450 किग्रा नक़ली पनीर पकड़ा गया. फ़रवरी, 2026 में बनासकांठा, गुजरात में 1500 किग्रा नक़ली घी पकड़ा गया, इसके पहले बनासकांठा में ही 5000 किग्रा नक़ली घी पकड़ा जा चुका था. अंदाजा लगाया जा सकता है कि पीएम मोदी के गृहराज्य की स्थिति क्या है.
इसके अलावा दिसंबर 2025 दिल्ली में 1500 किग्रा नक़ली घी पकड़ा गया था. फरवरी 2026 में गुजरात के साबरकांठा में एक फैक्ट्री में छापा मारा गया. यह फैक्ट्री लगभग पाँच सालों से चल रही थी और 300 लीटर असली दूध का उपयोग करके रोज़ाना 1,700 से 1,800 लीटर तक नकली दूध और छाछ तैयार करती थी.
इस दौरान अधिकारियों ने 1,962 लीटर नक़ली दूध, 1,180 लीटर नक़ली छाछ और लगभग ₹71 लाख मूल्य के रसायन जब्त किए, जिनमें डिटर्जेंट पाउडर, यूरिया खाद, कास्टिक सोडा, पाम और सोयाबीनतेल तथा डेयरी पाउडर शामिल थे. इसी तरह फ़रवरी 2026 में भीलवाड़ा, राजस्थान में एक फैक्ट्री पकड़ी गई जो हर दिन 80,000 लीटर नक़ली दूध बना रही थी.
पिछले दो महीने में ही कई ऐसे गिरोह भी पकडे गए हैं जो नक़ली दवा बनाने वाले गिरोह हैं. फरवरी 2026 में बिहार की राजधानी पटना के पास पुलिस ने एक ऐसे अवैध कारखाने में छापा मारा जहाँ नकली दवाइयाँ और नशीले पदार्थ तैयार किए जा रहे थे. जांच में ट्रामाडोल पाउडर और अल्प्राजोलाम जैसे साइकोट्रोपिक पदार्थों के साथ भारी मात्रा में नकली गोलियाँ, सिरप, मशीनें और पैकेजिंग सामग्री बरामद की गई.
इसी तरह फरवरी 2026 में दिल्ली में भी पुलिस ने छापा मार के 27 किलो पैरासिटामोल, 40,000से अधिक नकली एंटीबायोटिक गोलियाँ (जैसे फर्जी एजिथ्रोमाइसिन),1,19,800 नकली जिंक टैबलेट्स और बड़े पैमाने पर उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी भी जब्त की गयी. नक़ली उत्पादों के कारोबार में कॉस्मेटिक्स भी पीछे नहीं हैं. जनवरी 2026 में सूरत पुलिस ने एक अवैध फैक्ट्री को चिन्हित किया, फैक्ट्री में छापा मारा गया, पता चला कि इस फैक्ट्री में नामी ब्रांड्स के नकली कॉस्मेटिक्स बन रहे थे. दिल्ली पुलिस ने भी ‘फ़ेयर एंड लवली’ और ‘वीट’ जैसे ब्रांडों के नकली संस्करण बनाने वाले गिरोह को पकड़ा था.
ये सारी घटनाएँ पिछले कुछ महीनों की हैं. यदि और पीछे जाकर देखें तो ऐसी ही और घटनाएँ मिलेंगी. रिसर्च बताती है कि भारत में ‘नक़ली’ का कारोबार लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
ASPA-CRISIL के सहयोग से मार्च, 2026 में जारी ‘भारत में नकली उत्पादों की स्थिति 2025’ रिपोर्ट यह बताती है कि भारत में नक़ली सामानों का कारोबार हर साल लगभग 3.4% की दर से बढ़ रहा है जो कि खतरनाक है. भारत के 35% उपभोक्ता यह मानते हैं कि उन्होंने पिछले साल कम से कम एक बार तो निश्चित ही नक़ली उत्पाद ख़रीदा है. जबकि 89% शहरी उपभोक्ताओं का मानना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कम से कम एक बार नक़ली समान जरूर ख़रीदा है.
नक़ली कृषि उत्पादों की शिकायत की है. रिपोर्ट बताती है कि भारत का 28% दवा बाज़ार नक़ली दवाओं से भरा हुआ है. मतलब हर चार में से एक दवा निश्चित रूप से नक़ली है. रिपोर्ट में एक बात और निकलकर समाने आई कि कुल नक़ली सामानों की ख़रीददारी का 53% सीधे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से आया जबकि 75% नक़ली कृषि उत्पाद और 63% नक़ली दवाएं लोकल दुकानों से खरीदे गए. ऐसा नहीं है कि देश के लोगों को कुछ समझ नहीं आता है. रिपोर्ट के अनुसार, 74% उपभोक्ताओं का मानना है कि पिछले 12 महीनों के दौरान नक़ली सामानों की आमद बाजार में बढ़ गई है.
क्या इन नक़ली सामानों से भारत सशक्त होगा? मुझे तो लगता है ये बहुत कमजोर होगा. नकली सामानों की बिक्री से होने वाला फ़ायदा दलालों को मिलेगा जिन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त रहता है. नक़ली सामान ‘जीवन के अधिकार’ को चुनौती है, इस पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए.
वैसे तो लगभग हर चीज नक़ली मिल रही है लेकिन सबसे ज़्यादा परेशानी उन वस्तुओं से है जो खाने-पीने से संबंधित हैं. हर दिन भोजन में इस्तेमाल किये जाने वाले उत्पादों का नक़ली निकलना, शरीर को नुकसान पहुँचा रहा है, यह पूरे भारत को धीरे धीरे बीमार कर रहा है. नक़ली घी, दूध और पनीर का कारोबार अपने चरम पर है जो कि चिंता की बात है. मार्च 2026 में हैदराबाद में 3000 किग्रा नक़ली पनीर पकड़ा गया. नोएडा में 2024-25 के दौरान लिए गए पनीर के 83% नमूने फेल पाये गए.
दूध और उसके उत्पादों में मिलावट बहुत तेज हो चुकी है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा 2024-25 में लिए गए दूध और डेयरी उत्पादों के 33,405 नमूनों में से 12,780 नमूने (लगभग 38%)फेल रहे. खाने पीने के उत्पादों में कहानी सिर्फ़ अपराधी और गिरोहों तक ही सीमित नहीं है इसमें आयुर्वेदिक दवाएं/उत्पाद बनाने वाले उद्योगपति रामदेव की कंपनी पतंजलि और अमूल और मदर डेयरी जैसे ब्रांड भी शामिल हैं. अक्टूबर 2020 में एक वरिष्ठ खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने पतंजलि गाय के घी का एक सैंपल लिया जो राज्य और केंद्र सरकार दोनों की प्रयोगशालाओं में अशुद्ध और खाने के लिए अनुपयुक्त पाया गया था.
अभी एक साल पहले ही FSSAI ने पाया कि पतंजलि फूड्स के लाल मिर्च पाउडर के एक विशेष बैच में कीटनाशक अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक हैं जो 2011 के नियमों का उल्लंघन है. इसलिए पतंजलि को आदेश दिया गया कि 4 टन लाल मिर्च पाउडर बाजार से वापस मंगाये, क्योंकि यह सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करता है। इसके अलावा अप्रैल 2025 में अधिकारियों ने गोरखपुर के एक गोदाम से पतंजलि का 1260 लीटर तेल और 3600 बोतल पानी FSSAI ने सीज कर दिया था और इसका कारण गुणवत्ता की कमी बताया था.
इसी तरह दिसंबर 2020 में सेंटर फॉरसाइंस एंड एनवायरनमेंट ने बाजार में उपलब्ध शहद के 13 ब्रैंड्स के 22 नमूने लेकर उन्हें दुनिया की सबसे बेहतरीन जर्मन लैब में टेस्ट करने को दिया. परिणाम चौंकाने वाले थे, सिर्फ़ तीन ब्रांड ही शुद्ध शहद दे रहे थे, पतंजलि समेत 10 ब्रांड नक़ली शहद बेच रहे थे. पतंजलि के शहद में गन्ने और चावल से बने शुगर सिरप का इस्तेमाल किया गया था जो आसानी से जांच में पकड़ा नहीं जाता.
भारत के लोगों को सोचना पड़ेगा वे क्या खा रहे हैं? सोचना इसलिए पड़ेगा क्योंकि अगर यह भारत के जनमानस के लिए मुद्दा नहीं है, तो सरकार इसे लेकर कोई क़दम नहीं उठाएगी. अगर यह मुद्दा चुनावी हार का कारण बने तो शायद सरकार इस दिशा में अभी से सोचे. शायद सरकार को मालूम है कि देश धर्म के नशे में चूर है, लोगों को यह समझा दिया गया है कि भारत का डंका बज़ रहा है, भारत विश्वगुरु बन रहा है और आने वाले समय में विकसित भारत भी बनेगा इसलिए कोई चिंता की बात नहीं है. मुख्यधारा का मीडिया कभी भी इस मामले में शो नहीं करेगा, कोई बहस नहीं होगी और वैकल्पिक मीडिया अगर बहस करता पाया गया तो उसकी आवाज़ बंद कर दी जाएगी.
क्या यह उचित बात है? क्या भारत के लोगों को यह स्वीकार है कि उनके बच्चे, उनके अपने, नक़ली टूथपेस्ट का इस्तेमाल करते रहें, नक़ली दूध पियें, नक़ली पनीर की सब्जी खायें, नक़ली शहद और नक़ली दवाओं का सेवन करें? अगर आप यानी भारत के लोगों को यह सब स्वीकार है तो इसका मतलब है कि अब आप यानी भारत के लोग इंसान नहीं एक टूल बनकर रह गए हैं. जबकि आपको जानना चाहिए कि सरकार की लापरवाही और अक्षमता आपको और आपके अपनों को क्या दे रही है.
नक़ली दूध शरीर के अन्दर जाने से गैस्ट्रोएन्टराइटिस, फूड प्वाइजनिंग, दस्त, पेट में जलन औरआंतों को गंभीर नुकसान हो सकता है. लंबे समय में यह किडनी और लिवर को भी क्षति पहुँचाता है, मेटाबॉलिक गड़बड़ियाँ, हृदय रोग और यहाँ तक कि कैंसर का खतरा भी बढ़ाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, ये रसायन शरीर के अंगों के कार्य करने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर देते हैं और गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं.
इसी तरह, मिलावटी घी में सस्ता पाम ऑयल, वनस्पति घी या जानवरों की चर्बी मिलाकर इसकी गुणवत्ता घटा दी जाती है. इसका तुरंत असर पाचन तंत्र पर पड़ता है. लंबे समय में इसमें मौजूद ट्रांस फैट शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को बढ़ाते हैं, जिससे हृदय रोग, सूजन, वजन बढ़ना और लिवर पर दबाव बढ़ता है. लगातार सेवन से शरीर की लिपिड मेटाबॉलिज्म प्रणाली प्रभावित होती है और असली घी के पोषक लाभ भी खत्म हो जाते हैं.
नकली टूथपेस्ट भी एक बड़ा खतरा है, जिसे अक्सर अस्वच्छ परिस्थितियों में सस्ते और हानिकारक रसायनों के साथ बनाया जाता है. इसके उपयोग से तुरंत मसूड़ों और दाँतों में जलन, एलर्जी या गलती से निगलने पर पेट की समस्या हो सकती है. लंबे समय में यह दाँतों की सड़न, मसूड़ों की बीमारी और मुंह के संक्रमण का कारण बनता है।
कई मामलों में भारी धातुओं जैसे लेड की मौजूदगी पाई गई है, जो किडनी, हृदय और बच्चोंके मानसिक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है. कुछ मामलों में जहरीले रसायन जैसे डाइएथिलीन ग्लाइकोल के कारण विषाक्तता तक देखी गई है.
सबसे खतरनाक श्रेणी में नकली दवाइयाँ आती हैं, जिनमें या तो सक्रिय तत्व नहीं होते, या गलत मात्रा में होते हैं या फिर उनमें जहरीले पदार्थ मिले होते हैं. इनके सेवन से तुरंत कोई इलाज का लाभ नहीं मिलता, बीमारी बढ़ जाती है, एलर्जी या ओवरडोज जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है. लंबे समय में यह उपचार विफलता, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस, अंगों को स्थायी नुकसान और मृत्यु तक का कारण बन सकता है. विशेष रूप से नकली एंटीबायोटिक दवाएँ बैक्टीरिया को और मजबूत बना देती हैं, जिससे भविष्य में इलाज कठिन हो जाता है. विशेषज्ञों और वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार, नकली दवाइयाँ हर साल लाखों लोगों कीजान के लिए खतरा बनती हैं, खासकर भारत जैसे देशों में.
ग्रीनविच मीन टाइम की जगह ‘महाकाल स्टैण्डर्ड टाइम’ बनाने से देश नहीं बदलेगा, जैसा की शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान, की चाहत है. देश बढ़ेगा और बदलेगा तब, जब यहाँ के लोग सशक्त, स्वस्थ और शिक्षित होंगे. लेकिन दुर्भाग्य से इसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है.
इस बात को समझना ज़रूरी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत में नकलीपन के ज़हर को जानबूझकर घोला जा रहा है? अगर ऐसा हुआ तो यह सरकार पर भरोसे का ख़तरा है औरआस्था और विश्वास के नाम के बाज़ार को चलाने वाले व्यापारियों से ख़तरा है और बात सिर्फ़ नक़ली उत्पादों की नहीं है. नक़ली नेता, नक़ली व्यापारी, नक़ली PMO अधिकारी, नक़ली पुलिसअधिकारी, नक़ली व्यापार डील, नक़ली MoUs बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत की मजबूत छवि को नुकसान पहुँचा रहा है. लेकिन इसके पीछे कोई ‘विदेशी ताक़त’ नहीं बल्कि इसी देश का कमजोर, लचर/लाचार और लापरवाह नेतृत्व है. जिसे बदलकर ही भारत में बदलाव लाया जा सकता है. यह देश धार्मिक और भाषण-फटीग से गुज़र रहा है, इसे एक विजनरी नेतृत्व चाहिए जिसे अमूर्त देश की नहीं मूर्तरूप जनता और उसके स्वास्थ्य व जीवन स्तर की फ़िक्र हो.